
सिनेमा के इस दौर में जहाँ एक तरफ़ परिवारिक मनोरंजन और हल्की-फुल्की कॉमेडी का बोलबाला है, वहीं “एक दीवाने की दीवानियत” जैसी फिल्म ने यह साबित कर दिया कि दर्शक गहराई, संवेदना और सच्चे इमोशन से जुड़ी कहानियों को अब भी दिल से अपनाते हैं — चाहे वह एडल्ट सर्टिफिकेट के तहत ही क्यों न आती हो। यह फिल्म एक मनोवैज्ञानिक प्रेमकहानी है जो प्रेम और जुनून के बीच की महीन रेखा को बड़ी बारीकी से दर्शाती है।
निर्देशक ने इसे महज़ एक रोमांटिक ड्रामा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया है — जिसमें प्रेम, पछतावा और पुनरुत्थान का संगम दिखाई देता है।
दर्शकों ने क्यों किया इसे स्वीकार?
फिल्म को एडल्ट सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद दर्शकों ने इसे दिल खोलकर स्वीकार किया। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि “एक दीवाने की दीवानियत” में वयस्कता केवल दृश्यात्मक नहीं, बल्कि भावनात्मक स्तर पर है। यह कहानी उन लोगों के लिए है जिन्होंने प्रेम में अपनी सीमाएं तोड़ी हैं, गलतियां की हैं और फिर खुद को माफ करने की कोशिश की है।
फिल्म में संवादों की गहराई, सिनेमाटोग्राफी का सौंदर्य और संगीत की आत्मीयता ने दर्शकों को भीतर तक प्रभावित किया। यहाँ प्रेम को भोग नहीं, बल्कि आत्मदर्शन की यात्रा के रूप में दिखाया गया है — यही कारण है कि यह फिल्म सीमित सर्टिफिकेट के बावजूद जनभावना में उतर गई।
हर्षवर्धन राणे: असफलता से वापसी की मिसाल
फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण हर्षवर्धन राणे हैं। उनका अभिनय इस फिल्म में न केवल प्रौढ़ हुआ है बल्कि भावनात्मक स्तर पर भी गहराई लिए हुए है। राणे के करियर का सफर आसान नहीं रहा। उनकी पिछली चर्चित फिल्म “सनम तेरी कसम” (2016) ने रिलीज़ के समय बॉक्स ऑफिस पर औसत प्रदर्शन किया था, लेकिन इसने अपने पुन: प्रदर्शन में बॉक्स ऑफिस पर जो सफलता प्राप्त की वह अपने आप में एक मिसाल बन गई। अपने पुन: प्रदर्शन में इसने न सिर्फ अपनी लागत निकालने में सफलता पाई अपितु इसने हिट फिल्म का टैग भी हासिल किया। बाद में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर वह एक कल्ट लव स्टोरी बन गई। दर्शकों ने उस फिल्म को दोबारा खोजा, और वहीं से राणे के अभिनय का एक नया मूल्यांकन शुरू हुआ।
“सनम तेरी कसम” का असर इतना गहरा था कि जब “एक दीवाने की दीवानियत” रिलीज़ हुई, तो दर्शक पहले से ही उनके भीतर के उस टूटे और संवेदनशील प्रेमी को देखने के लिए तैयार थे। इस बार उन्होंने खुद को और अधिक जटिल किरदार में ढाला — एक ऐसा व्यक्ति जो प्रेम के लिए दीवानगी की हद तक जाता है, लेकिन अपने भीतर की पीड़ा और अपराधबोध से भी जूझता है।
कहानी जो सिर्फ़ प्रेम नहीं, मानसिक द्वंद्व भी कहती है
फिल्म का दूसरा पहलू इसका मनोवैज्ञानिक आयाम है। निर्देशक ने यहाँ प्रेम को एक मानसिक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया है। फिल्म में यह दिखाया गया है कि जब व्यक्ति अपने भीतर के शून्य को प्रेम से भरना चाहता है, तो वह किन-किन अंधेरों से गुजरता है। यही संघर्ष दर्शकों को अपने जीवन से जोड़ देता है।
हर्षवर्धन के साथ नवोदित अभिनेत्री ने भी एक परिपक्व और संवेदनशील किरदार निभाया है। दोनों के बीच की केमिस्ट्री अतिरिक्त नहीं, बल्कि गहन और यथार्थवादी लगती है।
संगीत और संवादों का असर
फिल्म का संगीत इसकी आत्मा है। “तेरा नाम अधूरा रह गया”, “दिल के उस पार” और “क्यों मैं तुझसे हार गया” जैसे गीतों ने युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल की। संवाद भी सीधे दिल पर चोट करते हैं, जैसे — “प्रेम अगर सहज हो जाए तो दीवानगी मर जाती है।” ऐसे संवाद दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं, और यही इसकी सफलता का असली रहस्य है।
वयस्क सिनेमा की नई परिभाषा
“एक दीवाने की दीवानियत” ने भारतीय सिनेमा में वयस्क फिल्मों की धारणा को बदला है। इसने साबित किया कि ‘एडल्ट सर्टिफिकेट’ का अर्थ केवल भौतिक अंतरंगता नहीं, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता भी हो सकता है।
इस फिल्म ने भारतीय दर्शकों को एक नई दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया — कि वयस्कता का मतलब केवल सीमाओं को तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई में उतरना भी है।
सफलता के आँकड़े और दर्शकों की प्रतिक्रिया
25 करोड़ के सीमित बजट में बनी यह फिल्म बॉक्स आफिस पर अपने अब तक के प्रदर्शन के आधार पर हिट का टैग हासिल कर चुकी है। प्रथम सप्ताह में इसने 55 करोड़ से ज्यादा का कारोबार करने में सफलता प्राप्त की है और उम्मीद की जा रही है कि यह अपने दूसरे वीकेंड में बॉक्स ऑफिस पर 70 करोड़ के आंकड़े को छूने में सफल हो जाएगी। मल्टीप्लेक्स दर्शकों के साथ-साथ युवा वर्ग और महिलाओं ने भी इसे विशेष रूप से सराहा। सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर भारी प्रतिक्रियाएँ आईं — #EkDeewaneKiDeewaniyat और #HarshvardhanRane ट्रेंड में बने रहे।
फिल्म की कुछ कमियां भी रहीं
हालांकि एक दीवाने की दीवानियत ने अपने परिपक्व कथानक, उत्कृष्ट अभिनय और संवेदनशील फिल्मनिर्माण के कारण दर्शकों का दिल जीता, फिर भी फिल्म कुछ कमियों से मुक्त नहीं है। सबसे पहले, फिल्म का मध्य भाग थोड़ा लंबा और भावनात्मक रूप से थका देने वाला लगता है। निर्देशक ने कई जगह प्रतीकात्मक और कलात्मक दृश्य संरचना का प्रयोग किया है, जिससे कहानी का प्रवाह बीच-बीच में रुक जाता है। कुछ दृश्यों में संवाद इतने आत्ममंथनशील हो जाते हैं कि साधारण दर्शक उनसे दूरी महसूस करता है। यही नहीं, क्लाइमेक्स में पात्रों की भावनात्मक परिणति जितनी सशक्त होनी चाहिए थी, उतनी नहीं बन पाई। कई समीक्षकों ने यह भी कहा कि फिल्म का संगीत भले सुंदर है, पर कुछ जगहों पर वह भावनात्मक तनाव को तोड़ देता है। कुल मिलाकर, एक दीवाने की दीवानियत एक संवेदनशील और साहसी प्रयास है, मगर इसकी कलात्मक जटिलता और धीमी गति इसे सीमित वर्ग तक सीमित कर सकती है।
“एक दीवाने की दीवानियत” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है — जो दर्शकों को प्रेम के उस आयाम से मिलाता है जहाँ सीमाएं टूटती नहीं, बल्कि परिपक्व होती हैं। हर्षवर्धन राणे ने इसमें साबित किया कि सच्चा अभिनय चेहरे की अभिव्यक्ति से नहीं, आत्मा के दर्द से झलकता है।
और शायद यही कारण है कि यह फिल्म न केवल वयस्क सिनेमा की श्रेणी में नई मिसाल बनी, बल्कि 2025 के भारतीय सिनेमा की सबसे भावनात्मक रूप से प्रभावशाली फिल्मों में से एक मानी जा रही है।














