
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी किसी महाकाव्यात्मक प्रस्तुति की बात होती है, ‘बाहुबली’ का नाम स्वतः स्मरण हो आता है। अब इसी कथा को नये रूप में प्रस्तुत करने जा रहे हैं निर्देशक एस. एस. राजामौली और उनकी टीम — ‘बाहुबली : द एपिक’ के माध्यम से। तीन घंटे चालीस मिनट लंबी इस फिल्म का ट्रेलर हाल ही में जारी किया गया है, जिसने सोशल मीडिया और दर्शकों के बीच भारी उत्साह के साथ-साथ जिज्ञासा भी पैदा की है।
ट्रेलर में दिखी अतिशय भव्यता और तकनीकी उत्कृष्टता
ट्रेलर के पहले ही दृश्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि फिल्म का पैमाना भारतीय सिनेमा के सामान्य ढाँचों से बहुत आगे है। विशाल युद्ध-स्थल, झीलों पर फैले महल, कवचों से चमकते योद्धा, और संगीत की गूंज—सब कुछ ‘एपिक’ शब्द को सार्थक करता है। दृश्य-प्रभाव (VFX) निःसंदेह अत्याधुनिक हैं, और हर फ्रेम में राजामौली की तकनीकी समझ झलकती है।
कलाकारों के चेहरे पर भावनात्मक तीव्रता है, संवाद गूंजते हैं और छायांकन (Cinematography) इतना सटीक है कि हर दृश्य एक जीवंत चित्र-सा प्रतीत होता है। ट्रेलर देखकर स्पष्ट है कि यह फिल्म सिर्फ दृश्य वैभव नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कथा का पुनर्निर्माण भी करने जा रही है।
पर सवाल यह भी – क्या 3 घंटे 40 मिनट की लंबाई दर्शकों के धैर्य की परीक्षा नहीं?
यह वह बिंदु है जहाँ फिल्म को लेकर पहला बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। आज के समय में जब दर्शक दो घंटे से अधिक की फिल्म देखने में झिझकते हैं, तब तीन घंटे चालीस मिनट की अवधि किसी चुनौती से कम नहीं।
सिनेमाघर मालिकों की चिंता भी यहीं से शुरू होती है — इतनी लंबी फिल्म का मतलब है दिनभर में सीमित शो। जहाँ एक मल्टीप्लेक्स औसतन चार शो चला सकता है, वहीं ‘बाहुबली : द एपिक’ जैसे लंबे प्रारूप में केवल दो शो ही संभव होंगे। इससे व्यावसायिक लाभ पर असर पड़ना तय है। यही कारण है कि कई सिनेमाघर इसके प्रदर्शन को लेकर असमंजस में हैं।
दूसरा पहलू है दर्शक-मन। नई पीढ़ी, जो OTT के छोटे फॉर्मेट्स की आदी हो चुकी है, क्या वह इतना लंबा सिनेमाई अनुभव झेल पाएगी? यही वह प्रश्न है, जो इस भव्य प्रोजेक्ट की सफलता या असफलता तय कर सकता है।
कहानी और संगीत – पुरानी आत्मा, नया विस्तार
हालाँकि ट्रेलर पूर्ण कहानी नहीं बताता, पर संकेत देता है कि फिल्म पहले दोनों भागों से आगे जाकर बाहुबली की कथा को ‘मिथक’ से ‘इतिहास’ में बदलने का प्रयास करती है। संवादों में भारतीय महाकाव्यों का आभास है — शक्ति, विरासत, और न्याय जैसे शाश्वत विषयों पर पुनः बल दिया गया है।
संगीतकार एम. एम. कीरवाणी का संगीत एक बार फिर कथा का प्राण बनता दिखता है। ट्रेलर के पृष्ठभूमि संगीत में जो गूंज है, वह फिल्म के दार्शनिक भावों को उभारती है। परंतु कुछ आलोचकों का मानना है कि इस बार संगीत में नया पुट कम है — वह पहले जैसी आत्मा को छूने वाली ऊर्जा नहीं जगा पाता।
फिल्म की ताकत – अद्भुत विजुअल्स और भावनात्मक गहराई
‘बाहुबली : द एपिक’ का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी तकनीकी गुणवत्ता है। प्रत्येक दृश्य, परिधान और सेट डिज़ाइन भारतीय संस्कृति की गहराई को विश्वस्तरीय प्रस्तुतिकरण में लाता है। ट्रेलर में यह दिखता है कि राजामौली केवल कथा नहीं सुना रहे, बल्कि एक सांस्कृतिक परंपरा को दृश्य भाषा में ढाल रहे हैं।
दूसरी ओर, फिल्म का भावनात्मक पक्ष—माँ-बेटे का संबंध, शक्ति और त्याग की कथा—दर्शकों को फिर से उसी अनुभूति से जोड़ सकता है, जो उन्होंने ‘बाहुबली: द कन्क्लूजन’ में महसूस की थी।
कमज़ोर कड़ी – गति और दोहराव का खतरा
परंतु इस भव्यता के बीच सबसे बड़ा खतरा है धीमी गति और दोहराव का। ट्रेलर में कुछ ऐसे पल हैं जहाँ दृश्य प्रभावों का अत्यधिक प्रयोग कथा से ध्यान हटाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तकनीकी कौशल कहानी से आगे निकल रहा है।
यदि निर्देशक इस संतुलन को साध नहीं पाए, तो यह फिल्म एक दृश्य महाकाव्य तो बन सकती है, लेकिन भावनात्मक जुड़ाव में पिछड़ जाएगी।
सिनेमाघरों की दुविधा और निर्माता की शर्तें
सूत्रों के अनुसार, निर्माताओं ने फिल्म को इंटरमिशन सहित पूरे फॉर्मेट में दिखाने की शर्त रखी है, अर्थात किसी भी सिनेमाघर को फिल्म काटने की अनुमति नहीं होगी। यह शर्त सिंगल स्क्रीन थिएटरों के लिए चुनौती बन गई है, जहाँ शो-टाइम और सीटिंग शेड्यूल सीमित हैं।
कई मल्टीप्लेक्स श्रृंखलाओं ने भी प्रारंभिक चरण में प्रदर्शन की संख्या घटाने का संकेत दिया है। इसका सीधा असर बॉक्स ऑफिस ओपनिंग पर पड़ सकता है।
आख़िरी विचार – ‘बाहुबली : द एपिक’ एक अनुभव है, परीक्षा भी
ट्रेलर यह स्पष्ट करता है कि ‘बाहुबली : द एपिक’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है—भारत की पौराणिकता, भव्यता और तकनीकी प्रगति का संगम। यह भारतीय सिनेमा की सीमाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास है।
पर साथ ही, यह फिल्म दर्शकों की सहनशीलता और सिनेमाघरों की व्यावसायिक रणनीति – दोनों की परीक्षा लेने जा रही है। तीन घंटे चालीस मिनट का यह महाकाव्य हर दर्शक के लिए नहीं है, पर जो सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, एक कला-यात्रा की तरह देखते हैं—उनके लिए यह फिल्म अवश्य देखने योग्य प्रतीत होती है।














