
हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और अनगिनत किरदारों से दर्शकों को हँसाने वाले गोवर्धन असरानी अब इस दुनिया में नहीं रहे। सोमवार, 20 अक्टूबर को दोपहर के समय मुंबई के जुहू इलाके में स्थित आरोग्य निधि अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। 84 वर्ष के असरानी लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनके मैनेजर बाबुभाई थीबा ने इस दुखद खबर की पुष्टि की और बताया कि पिछले कुछ महीनों से असरानी का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था।
लेकिन जिस तरह से वह अपने जीवन को सादगी और शांति से जीते रहे, ठीक उसी तरह उन्होंने अपनी विदाई भी बेहद शांतिपूर्ण ढंग से चाही थी। उनके निधन के बाद परिवार ने किसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणा नहीं की। शाम को सांताक्रुज के शास्त्री नगर श्मशानभूमि में असरानी का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें सिर्फ परिवार के सदस्य और करीबी मित्र ही शामिल हुए।
परिवार ने बताया कि यह असरानी की अंतिम इच्छा थी कि उनकी मृत्यु के बाद किसी तरह का शोर-शराबा न हो। उन्होंने अपनी पत्नी मंजू असरानी से पहले ही कह दिया था कि उनकी मृत्यु की सूचना सार्वजनिक न की जाए और अंतिम संस्कार को सादगीपूर्ण ढंग से संपन्न किया जाए। परिवार ने उनकी इस इच्छा का सम्मान करते हुए पूरे कार्यक्रम को निजी रखा।
एक अभिनेता जिसने हर पीढ़ी को हँसाया
गोवर्धन असरानी का नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। अपने शानदार हास्य अभिनय और संवाद अदायगी के अनूठे अंदाज़ के लिए असरानी को याद किया जाएगा। उन्होंने सैकड़ों फिल्मों में काम किया, लेकिन 1975 की फिल्म शोले में जेलर के उनके किरदार को एक आइकॉनिक भूमिका के रूप में याद किया जाता है।
इसके अलावा चुपके चुपके, छोटी सी बात, रफू चक्कर, बावर्ची, कोशिश, मेरे अपने, परिचय, आ अब लौट चलें और हेरा फेरी जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हर पीढ़ी को प्रभावित किया।
उनकी कॉमिक टाइमिंग और चुलबुला अंदाज़ हमेशा दर्शकों को बांधे रखता था। असरानी उन चंद कलाकारों में से थे, जो बिना किसी ग्लैमर के भी दर्शकों के दिलों में जगह बना लेते थे।
राजस्थान से मुंबई तक का सफर
असरानी का जन्म राजस्थान की राजधानी जयपुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा सेंट जेवियर्स स्कूल, जयपुर में हुई। अभिनय की दुनिया में उनका आकर्षण उन्हें पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) तक ले गया, जहाँ उन्होंने औपचारिक अभिनय प्रशिक्षण लिया।
इसके बाद उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ, जो पाँच दशकों से भी अधिक समय तक चला। इस दौरान उन्होंने 350 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और सिनेमा के हर दौर का हिस्सा बने। वह न केवल हास्य कलाकार के रूप में बल्कि एक संवेदनशील सहायक अभिनेता के रूप में भी यादगार भूमिकाएँ निभाते रहे।
1970 का दशक असरानी के करियर का सुनहरा दौर रहा। तब वे लगभग हर दूसरी फिल्म में दिखाई देते थे, और उनका नाम ही दर्शकों के लिए एक गारंटी बन चुका था कि फिल्म में हास्य का पुट ज़रूर मिलेगा।
हिंदी सिनेमा का एक सच्चा कलाकार खो गया
असरानी का जाना एक युग के अंत जैसा है। आज जब बड़े-बड़े सितारे अपने स्टारडम को लेकर व्यस्त रहते हैं, असरानी जैसा अभिनेता हमें सिखा जाता है कि सच्चा कलाकार वह होता है, जो अपने काम के प्रति ईमानदार हो और जीवन को सहजता से जिए।
उनकी विदाई भी उसी सादगी और गरिमा के साथ हुई, जैसे उनका जीवन रहा। अब जब वे हमारे बीच नहीं हैं, उनकी फिल्मों के संवाद, उनका हँसता चेहरा और उनका अभिनय हमेशा दर्शकों के दिलों में जीवित रहेगा।
श्रद्धांजलि, असरानी साहब। हिंदी सिनेमा आपको कभी नहीं भुला पाएगा।














