
हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को ब्रह्मांड का प्रथम शिल्पकार माना जाता है। मान्यता है कि देवताओं के भव्य महल, अद्वितीय रथ और दिव्य अस्त्र-शस्त्र उन्हीं की रचना हैं। इसी कारण से हर वर्ष भाद्रपद मास के अंत में, जब सूर्य देव कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो विश्वकर्मा पूजा एवं जयंती का आयोजन किया जाता है। यह दिन विशेष रूप से मजदूरों, तकनीशियनों, कलाकारों, कारीगरों और उद्योग से जुड़े लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन मशीनों, उपकरणों और कार्यस्थलों की विशेष पूजा की जाती है ताकि कार्य में निरंतर प्रगति और सुख-समृद्धि बनी रहे।
विश्वकर्मा पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2025 में विश्वकर्मा पूजा का श्रेष्ठ समय प्रातः 8:15 बजे से लेकर दोपहर 12:50 बजे तक निर्धारित है। इस अवधि में पूजा-अर्चना करने से विशेष पुण्यफल की प्राप्ति होती है और इसे अत्यंत शुभ माना गया है।
पूजा विधि – इन चरणों का पालन करें
विश्वकर्मा पूजा का अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए विधिवत पूजा करना आवश्यक है। आइए जानते हैं चरणबद्ध विधि—
1. शुद्धिकरण और तैयारी: सबसे पहले अपने कार्यस्थल, औजारों, मशीनों और उपकरणों की पूरी तरह सफाई करें। इसके बाद उन्हें गंगाजल से पवित्र करें।
2. चौकी की स्थापना: एक चौकी पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें।
3. कलश स्थापना: भगवान गणेश का स्मरण करते हुए जल से भरा हुआ एक कलश रखें। इसमें सुपारी, सिक्का और पुष्प डालें।
4. पूजन सामग्री की व्यवस्था: थाली में अक्षत, रोली, फूल, धूप, दीप, फल और मिठाई सजाकर रखें।
5. आरती और पूजन: भगवान विश्वकर्मा की आरती उतारें, उन्हें नैवेद्य अर्पित करें। इसके पश्चात अपने औजारों और मशीनों पर रोली व अक्षत लगाकर उनकी भी पूजा करें।
6. मंत्र जाप: पूजा के दौरान "ॐ विश्वकर्मणे नमः" मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
पूजा का महत्व और लाभ
ऐसी मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की आराधना से कार्य में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होती हैं और जीवन में सफलता के नए अवसर मिलते हैं। यह पूजा न केवल व्यवसाय में प्रगति का मार्ग प्रशस्त करती है बल्कि घर और कार्यक्षेत्र में धन-धान्य और समृद्धि का वास भी कराती है।














