
सावन का महीना भगवान शिव की उपासना के लिए अत्यंत विशेष होता है। इस माह में भक्तगण जलाभिषेक, बेलपत्र, भांग, धतूरा और आक जैसे पुष्प-फल अर्पित कर महादेव को प्रसन्न करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा है कि भगवान शिव को यह तीखी, विषैली और औषधीय वनस्पतियां क्यों प्रिय हैं? इसके पीछे सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गहरे पौराणिक और आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। इसका संबंध स्वयं महादेव के नीलकंठ स्वरूप से जुड़ा है।
महादेव की प्रिय वस्तुएं: साधारण से भी होते हैं प्रसन्न
भगवान शिव को प्रसन्न करना जितना सरल है, उतना ही गहरा है उनकी पूजा का भाव। न उन्हें मिठाई चाहिए, न कीमती धूप-दीप या श्रृंगार। केवल बेलपत्र, गंगाजल, और भांग-धतूरा जैसे वनस्पति उनके लिए अर्पण योग्य माने जाते हैं। यह भक्ति का वह रूप है जिसमें सादगी में भी परमेश्वर की कृपा मिल जाती है।
समाज से तिरस्कृत चीजों को अपनाते हैं शिव
शिव का स्वरूप सामाजिक मर्यादाओं के परे है। वे भस्म लपेटे, शव पर विराजमान और सर्पों से सुशोभित हैं। यही कारण है कि उन्हें आदियोगी और औघड़ कहा गया है। शिव वे हैं जो समाज से उपेक्षित, त्याज्य और भयावह माने जाने वाली वस्तुओं को अपनाते हैं—चाहे वह भस्म हो, भांग हो या धतूरा।
यह केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि व्यवहारिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। शिव के उपासक यह समझते हैं कि जो वस्तुएं मानव जीवन के लिए हानिकारक हो सकती हैं, उन्हें भगवान को अर्पण कर त्याग देना ही उचित है।
‘नीलकंठ’ से जुड़ा गहरा पौराणिक कारण
समुद्र मंथन की कथा सभी को ज्ञात है, जिसमें देवता और असुर मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए मंथन करते हैं। उसी मंथन से सबसे पहले निकला ‘हलाहल विष’। यह विष इतना तीव्र और घातक था कि संपूर्ण सृष्टि को भस्म कर सकता था। संकट की घड़ी में भगवान शिव ने विषपान कर लिया ताकि सृष्टि की रक्षा हो सके।
विष का प्रभाव उनके कंठ में सिमट गया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। किंतु विष का ताप असहनीय था। तब माता पार्वती और अन्य देवी-देवताओं ने उन्हें शीतलता प्रदान करने हेतु भांग, धतूरा, आक और जल का प्रयोग किया। इन औषधीय वनस्पतियों ने उनके मस्तिष्क और शरीर की गर्मी को शांत किया।
भगवती पुराण और शिव पुराण का उल्लेख
भगवती पुराण और शिव पुराण दोनों में इन घटनाओं का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, देवी शक्ति ने स्वयं महादेव को भांग और धतूरा लेपित किया ताकि उनका मानसिक ताप कम हो सके। यह औषधीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत वैज्ञानिक रहा है। इन वनस्पतियों में ठंडक देने वाले गुण होते हैं और वे विष के प्रभाव को नियंत्रित कर सकते हैं।
पूजा में भांग-धतूरा चढ़ाने की परंपरा
सावन में शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, भांग, आक और धतूरा चढ़ाना न केवल धार्मिक विधि है बल्कि भावनात्मक आस्था का भी प्रतीक है। यह दर्शाता है कि भक्त अपने आराध्य के लिए वह सब कुछ अर्पित करता है, जो उसके लिए सर्वश्रेष्ठ हो या जिसे वह स्वयं त्याग कर दे। यह परंपरा आज भी जीवित है और हर सावन में शिवालयों में भक्तगण भांग और धतूरा अर्पित करते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ वैज्ञानिक पक्ष भी
भांग, धतूरा और आक जैसी वनस्पतियां औषधीय गुणों से भरपूर होती हैं। इनका नियंत्रित प्रयोग दर्द निवारण, मानसिक शांति और औषधीय लेप के रूप में भी किया जाता रहा है। आयुर्वेद में भी इनका प्रयोग विशेष प्रकार की औषधियों में होता है। इसलिए जब भक्त शिव को इन वस्तुओं को अर्पित करते हैं, तो यह न केवल धार्मिक बल्कि एक औषधीय परंपरा को भी जीवित रखता है।
मिलती है यह सीख
भांग, धतूरा और आक जैसी वस्तुएं महादेव को क्यों प्रिय हैं, यह केवल परंपरा नहीं बल्कि गहन पौराणिक, सामाजिक और वैज्ञानिक समझ का विषय है। भगवान शिव उन तमाम चीजों को अपनाते हैं, जिन्हें समाज त्याग देता है—वे हर त्याग की चीज़ को अपनी भक्ति का आधार बना लेते हैं। सावन में इन वस्तुओं का प्रयोग शिवभक्ति का वह रूप है, जिसमें त्याग, तप और त्राण का समावेश है। नीलकंठ की यह महागाथा हमें सिखाती है कि संसार की भलाई के लिए विष पीना भी तपस्या का एक रूप है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं, पुराणों और लोकश्रुतियों पर आधारित है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक ज्ञानवर्धन है, किसी प्रकार की अंधश्रद्धा या अनुचित प्रयोग का समर्थन नहीं करता।














