
भगवान शिव को यूं ही भोलेनाथ नहीं कहा जाता है। उनकी सादगी, सरलता और अपने भक्तों के प्रति करुणा भाव उन्हें देवों में अलग बनाता है। मान्यता है कि भगवान शंकर एक लोटे जल के अभिषेक भर से ही प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त के सभी दुख दूर कर देते हैं। यही कारण है कि श्रावण मास में शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। आपने देखा होगा कि शिव जी के गले में नाग, एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। भगवान शिव की जटा में गंगा और अर्ध चंद्रमा भी सुशोभित हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान शिव के पास ये दिव्य चिन्ह कैसे आए? सावन के इस पावन महीने में आइए जानें उनसे जुड़ी कुछ अद्भुत और भावनात्मक पौराणिक कथाएं—
भगवान शिव को कैसे मिला त्रिशूल?
पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब ब्रह्मनाद से भगवान शिव प्रकट हुए, तो उनके साथ रज, तम और सत—ये तीनों गुण भी प्रकट हुए। लेकिन इन तीनों के संतुलन के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं था। देवों के देव महादेव ने इन तीनों गुणों का सामंजस्य बनाए रखने के लिए उन्हें त्रिशूल के रूप में अपने हाथों में धारण कर लिया। यह त्रिशूल केवल अस्त्र नहीं बल्कि सृष्टि की ऊर्जा का प्रतीक बन गया। भक्तों के लिए ये सीख है कि जीवन में संतुलन आवश्यक है।
भगवान शंकर को कैसे मिला डमरू?
भगवान शिव के हाथों में डमरू आने की कहानी भी बड़ी रोचक और भावनात्मक है। कहते हैं कि जब सृष्टि की शुरुआत हुई और देवी सरस्वती प्रकट हुईं, तो उन्होंने अपनी वीणा से ध्वनि तो उत्पन्न की लेकिन उसमें कोई लय नहीं थी। उस समय भगवान शिव ने अपने आनंद तांडव में 14 बार डमरू बजाया। इस डमरू से निकली ध्वनि से सुर-ताल उत्पन्न हुए और सृष्टि में संगीत और लय का जन्म हुआ। शिव महापुराण में डमरू को ब्रह्मा जी का स्वरूप माना गया है। यह दर्शाता है कि सृजन के साथ-साथ विनाश में भी एक सुंदर तालमेल होता है।
भगवान शिव के गले में कैसे आया नाग?
भगवान शिव के गले में लिपटा हुआ नाग केवल एक सजावट नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपे वात्सल्य का प्रतीक है। शिव महापुराण में वर्णन मिलता है कि ये नागों के राजा वासुकी हैं। सागर मंथन के समय वासुकी ने रस्सी का कार्य किया था और तब भगवान शिव की भक्ति में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उनकी इस अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें अपने गले में स्थान दिया और उन्हें अमरता का वरदान दिया। वासुकी अब न सिर्फ नागों के राजा हैं, बल्कि भगवान शिव के सबसे प्रिय आभूषण भी हैं।













