
इस साल गुरुवार, 2 अक्टूबर को पूरे देश में दशहरा मनाया जाएगा। यह पर्व असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक माना जाता है। रावण को दशानन कहा जाता है, जिसका अर्थ है “दस सिर वाला।” आपने रावण की चित्रकथाओं में उसके 10 सिर अवश्य देखे होंगे। रावण के 10 सिर होने के पीछे केवल एक कारण नहीं, बल्कि कई पौराणिक कथाएँ और मान्यताएँ जुड़ी हैं। ये सिर उसके विभिन्न मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक शक्तियों का प्रतीक माने जाते हैं। आइए जानते हैं रावण को दस सिर कैसे मिले और प्रत्येक सिर का क्या महत्व है।
रावण के 10 सिर के नाम
रावण के 10 सिर के नाम - 10 सिर का मतलब
काम - वासनाओं और अनैतिक इच्छाओं का असंयम
क्रोध - बिना सोचे-समझे गुस्सा होना
लोभ - असीमित इच्छाओं और लालच का प्रभाव
मोह - भौतिक वस्तुओं और मायाजाल में फंसना
मद - अहंकार और घमंड
मत्सर - दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करना
घृणा - नफरत और वितृष्णा
भय - डर
अहंकार - स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझना और आत्ममोह
भ्रष्टाचार - सत्य और नैतिकता से दूर रहना
रावण को दस सिर कैसे मिले?
भगवान शिव को प्रसन्न करने की कथा:
एक प्राचीन कथा के अनुसार, लंका के राजा रावण ने भगवान शिव की भक्ति की। जब भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुए, तो रावण ने उन्हें प्रसन्न करने के लिए अपने सिर काटने शुरू किए। हर बार जब रावण ने सिर काटा, तो उसकी जगह नया सिर उग आया। नौ बार ऐसा करने के बाद दसवें प्रयास पर स्वयं महादेव प्रकट हुए। भगवान शिव रावण की भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे दस सिरों का वरदान दिया, जिससे वह दशानन कहलाया।
ब्रह्माजी को प्रसन्न करने की कथा:
रामायण के अनुसार, रावण ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए अपनी तपस्या में दस बार अपना सिर काटकर भेंट किया। ब्रह्माजी प्रसन्न होकर रावण को दस सिरों का वरदान देते हैं, जो उसकी विद्वत्ता और ज्ञान का प्रतीक बनते हैं। रावण ने अमरता का वरदान भी मांगा, जो सीधे तौर पर उसे नहीं मिला, लेकिन अमृत की शक्ति उसे उसकी नाभि में दी गई।
ज्ञान का प्रतीक:
रावण चारों वेदों (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद) और छह शास्त्रों (धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र, मोक्षशास्त्र, धनुर्वेद, संगीतशास्त्र) का ज्ञाता था। उसके दस सिर उसके गहन ज्ञान और विद्वत्ता का प्रतीक हैं।
माया और शक्ति:
कुछ कथाओं में रावण की दस सिरों की उपस्थिति उसकी मायावी शक्तियों का हिस्सा मानी जाती है। वह अपनी अद्भुत शक्ति से दस सिर होने का भ्रम उत्पन्न कर सकता था।
नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक:
रावण के दस सिर दस बुरी प्रवृत्तियों—काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, घृणा, पक्षपात, धोखा, द्वेष और व्यभिचार—का प्रतीक माने जाते हैं। यही दस बुरी आदतें हैं जिन्हें दशहरा के पर्व पर रावण के पुतले को जलाकर नष्ट करने का संदेश दिया जाता है।














