
भाद्रपद मास की पूर्णिमा पर इस बार खग्रास चंद्र ग्रहण के साथ पितृपक्ष की शुरुआत हो रही है। यह दुर्लभ संयोग लगभग 100 साल बाद बना है, जब श्राद्ध पक्ष का प्रारंभ चंद्र ग्रहण से और समापन सूर्य ग्रहण के साथ होगा। इस बार पितृपक्ष 7 सितंबर से शुरू होकर 21 सितंबर तक चलेगा, लेकिन विशेष स्थिति के कारण इसमें 16 के बजाय केवल 15 दिन ही श्राद्ध होंगे, क्योंकि तृतीया और चतुर्थी तिथि एक ही दिन पड़ रही है।
कब और कैसा रहेगा चंद्र ग्रहण
खग्रास चंद्र ग्रहण पूरे भारत में दिखाई देगा। ग्रहण का सूतक दोपहर 12:57 बजे लगेगा, जबकि रात 9:57 बजे से इसका पूर्ण चरण आरंभ होगा। यह ग्रहण रात 11:41 बजे समाप्ति की ओर बढ़ेगा और रात 12:30 बजे मोक्ष प्राप्त करेगा। कुल मिलाकर इसकी अवधि करीब 3 घंटे 30 मिनट की होगी। ग्रहण काल के दौरान शयन काल रहने के कारण खाने-पीने की वस्तुओं में कुशा या डाभ रखना शुभ माना जाता है।
ग्रहण के दौरान क्या करें और क्या न करें
ग्रहण काल में जप और हवन करना अत्यंत फलदायी होता है। इस दौरान किए गए धार्मिक कार्य शीघ्र फल प्रदान करते हैं। हालांकि, सूतक काल में आरती और पूजा निषिद्ध मानी जाती है, यहां तक कि बड़े मंदिरों के पट भी बंद हो जाते हैं। भोजन केवल बालकों और रोगियों को ही ग्रहण करने की अनुमति होती है। जो लोग पूर्णिमा पर श्राद्ध करते हैं, उन्हें सूतक आरंभ होने से पहले यानी 12:57 बजे तक श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान पूरा कर लेना चाहिए।
15 दिन का रहेगा श्राद्ध पक्ष
इस बार पितृपक्ष 16 दिनों के बजाय केवल 15 दिनों का रहेगा। 10 सितंबर को तृतीया और चतुर्थी तिथियां एक साथ होने के कारण एक दिन कम हो जाएगा। पितृपक्ष के दौरान हर व्यक्ति को अपने पूर्वजों की तिथि पर श्राद्ध और तर्पण करना चाहिए। मान्यता है कि इस दौरान चींटी, कौआ, श्वान, गाय और ब्राह्मण को अन्नदान करना विशेष महत्व रखता है। ब्राह्मणों को घर में बना भोजन कराना सबसे श्रेष्ठ माना गया है, जबकि होटल या हलवाई से मंगाए गए भोजन को उचित नहीं माना जाता।
पितृपक्ष का धार्मिक महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। यह अपने पितरों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का प्रतीक है। माना जाता है कि पितृपक्ष में किए गए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध से न केवल पितरों की आत्मा को शांति मिलती है, बल्कि कर्ता को भी पितृ ऋण से मुक्ति प्राप्त होती है। विशेष रूप से रोहिणी मुहूर्त में किया गया श्राद्ध अत्यंत शुभ माना गया है।
पूर्वजों के आशीर्वाद से सुख-समृद्धि
शास्त्रों के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान पूर्वज धरती पर आते हैं और श्रद्धापूर्वक किए गए तर्पण से प्रसन्न होकर परिवार को सुख, समृद्धि और वैभव का आशीर्वाद देते हैं। आचार्यों का मानना है कि श्राद्ध केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा भी है, जो पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम बनती है।














