
हर साल सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी का पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है। इस बार यह शुभ तिथि 29 जुलाई, मंगलवार यानी आज पड़ रही है। यह दिन विशेष रूप से नाग देवता की पूजा, कालसर्प दोष से मुक्ति और सांप के भय से सुरक्षा पाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। कई क्षेत्रों में यह पर्व "गुड़िया पंचमी" के नाम से भी लोकप्रिय है। इस अवसर पर नाग देवता की मूर्ति या मिट्टी से निर्मित प्रतीक को दूध और लावा से पूजने की परंपरा है। इस वर्ष नाग पंचमी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि करीब 44 साल बाद इस दिन मंगला गौरी व्रत का विशेष योग बन रहा है। यह संयोग न केवल पूजन को अधिक प्रभावशाली बनाता है बल्कि साधकों को माता पार्वती और शिव शक्ति के विशेष आशीर्वाद की प्राप्ति भी कराता है।
नाग पंचमी पर बना विशेष मंगला गौरी योग
इस वर्ष नाग पंचमी पर मंगला गौरी योग का संयोग अत्यंत दुर्लभ है, जो पूरे 44 वर्षों के बाद बना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए सबसे शुभ दिन होता है। इस दिन विधिपूर्वक पूजन करने वाले को भगवान शिव, माता पार्वती, नाग देवता और देवी शक्ति का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। जो जातक सर्पदोष, भय या बाधाओं से पीड़ित हैं, उनके लिए यह अवसर अत्यंत लाभकारी साबित हो सकता है।
पूजा का शुभ मुहूर्त और मंत्र जाप का महत्व
इस वर्ष नाग पंचमी के दिन पूजा का सबसे उत्तम मुहूर्त सुबह 5:40 से 8:20 बजे तक का रहेगा। इसी समय के भीतर नाग देवता की पूजा करना फलदायक माना गया है। इस दौरान भगवान शिव के मंत्रों के साथ नाग गायत्री मंत्र का जाप करना विशेष पुण्यदायक होता है। भक्तों को चाहिए कि वे इस अवधि में नाग देवता की मिट्टी की प्रतिमा को दूध, लावा, पुष्प और कुशा से पूजें।
नाग पंचमी के पूजन मंत्र
1. सर्वनाग वंदना मंत्र:
सर्वे नागा प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।
ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिता॥
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन।
ये च वापीतडगेषु तेषु सर्वेषु वै नम॥
2. नव नाग स्मरण मंत्र:
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शंखपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायं पठेन्नित्यं प्रातःकाले विशेषतः।
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत॥
3. नाग गायत्री मंत्र:
ॐ भुजंगेशाय विद्महे, सर्पराजाय धीमहि,
तन्नो नागः प्रचोदयात्॥
4. संक्षिप्त स्तुति:
ॐ सर्पाय नमः॥














