
श्रावण मास का शुभारंभ इस वर्ष 11 जुलाई से हो चुका है। अब तक तीन सोमवार बीत चुके हैं और अंतिम व अत्यंत पावन सावन सोमवार 4 अगस्त को पड़ रहा है। हिंदू पंचांग में सावन का महीना विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना के लिए जाना जाता है। इस पूरे महीने शिवभक्त जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजन विधियों से महादेव को प्रसन्न करते हैं। ऐसे में महामृत्युंजय मंत्र का जाप इस माह में विशेष महत्व रखता है। यह मंत्र सिर्फ एक धार्मिक उच्चारण नहीं, बल्कि एक दिव्य ऊर्जा का स्रोत माना जाता है। माना जाता है कि सावन में इस मंत्र का विधिवत जाप करने से रोग, कष्ट और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है।
कब करें महामृत्युंजय मंत्र का जाप?
हालांकि श्रावण मास का प्रत्येक दिन पुण्यदायी और शिवपूजन के लिए अनुकूल होता है, लेकिन महामृत्युंजय मंत्र के जाप के लिए दिन का एक विशेष समय और विधि मानी गई है। ज्योतिषीय मत के अनुसार, इस मंत्र का जाप सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले के बीच के किसी भी शांत समय में करना सर्वश्रेष्ठ होता है। यह समय सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है और जाप के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है।
इस पवित्र मंत्र का नियमित जाप न केवल मानसिक और शारीरिक कष्टों से राहत देता है, बल्कि अकाल मृत्यु से भी रक्षा करता है। कई श्रद्धालु मानते हैं कि सावन में यदि इस मंत्र का जाप श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाए, तो जीवन में जल्द ही सकारात्मक बदलाव अनुभव होने लगते हैं।
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यह मंत्र ऋग्वेद से लिया गया है और इसका अर्थ है — हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की उपासना करते हैं, जो सुगंधित हैं और जीवन को पोषण प्रदान करते हैं। वे हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करें और अमरत्व की ओर ले जाएं।
महामृत्युंजय मंत्र के जाप की विधि
महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना लाभकारी होता है। अगर आप इन नियमों के साथ जाप करें तो इसके शुभ फल शीघ्र प्राप्त होते हैं।
- सबसे पहले प्रातःकाल स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- शांत वातावरण में पूर्व दिशा की ओर मुख करके किसी ऊनी या कुश के आसन पर बैठें।
- भगवान शिव के सामने दीपक जलाएं और वातावरण को पवित्र करें।
- रुद्राक्ष की माला का उपयोग करते हुए 108 बार मंत्र का जाप करें।
- जाप करते समय एकाग्रचित रहें और भगवान शिव के स्वरूप का ध्यान करें।
इस जाप के दौरान मन को स्थिर रखना और श्रद्धा बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। नियमित रूप से यह साधना करने से मन शांत होता है, रोगों से रक्षा होती है और आत्मबल में वृद्धि होती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और पंचांग आधारित जानकारी पर आधारित है। किसी विशेष निर्णय या अनुष्ठान से पहले योग्य पंडित या ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें।














