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कृष्ण जन्माष्टमी 2025: क्यों कान्हा के मुकुट में सदा रहता है मोरपंख? जानें तीन अद्भुत कथाएं और छिपे आध्यात्मिक रहस्य

कृष्ण जन्माष्टमी 2025 पर जानें क्यों भगवान श्रीकृष्ण के मुकुट में सदैव मोरपंख सुशोभित रहता है। तीन पौराणिक कथाएं, राहु दोष से जुड़ी मान्यता और मोरपंख का गहरा आध्यात्मिक महत्व, जो इसे भक्ति और शुभता का प्रतीक बनाता है।

Posts by : Kratika Maheshwari | Updated on: Sat, 16 Aug 2025 09:12:03

कृष्ण जन्माष्टमी 2025: क्यों कान्हा के मुकुट में सदा रहता है मोरपंख? जानें तीन अद्भुत कथाएं और छिपे आध्यात्मिक रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण का मुकुट केवल उनके सौंदर्य का आभूषण नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं और गहन आध्यात्मिक संकेतों का प्रतीक है। जिस तरह बांसुरी और श्रीकृष्ण का नाम अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार मोरपंख भी उनके श्रृंगार का स्थायी हिस्सा बन चुका है। आखिर यह परंपरा कैसे आरंभ हुई और इसका क्या महत्व है? आइए जानते हैं तीन प्रमुख कथाएं और उनसे जुड़ा आध्यात्मिक रहस्य।

पहली कथा: राहु दोष और मां यशोदा की ममता

कहा जाता है कि जन्म के कुछ समय बाद जब नन्हे कान्हा की जन्मकुंडली एक ज्योतिषी ने देखी, तो उन्होंने बताया कि उन पर राहु दोष है। यह सुनकर मां यशोदा चिंतित हो गईं और तुरंत उपाय पूछा। ज्योतिषी ने कहा – “यदि मोरपंख सदा कृष्ण के साथ रहेगा तो दोष का प्रभाव समाप्त हो जाएगा।” उसी दिन से मां ने उनके मुकुट में मोरपंख सजाना शुरू किया। कान्हा की छवि इतनी मनमोहक लगी कि फिर यह श्रृंगार उनका स्थायी रूप बन गया।

दूसरी कथा: श्रृंगार की अनुपम छवि


एक अन्य प्रसंग में वर्णन मिलता है कि मां यशोदा कान्हा को प्रतिदिन नए-नए श्रृंगार से सजाती थीं। एक दिन उन्होंने मोरपंख धारण कराया। उस पल कान्हा की अद्भुत मोहकता देखकर नंदगांव के सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए। तभी से मोरपंख उनके मुकुट की स्थायी शोभा बन गया।

तीसरी कथा: मोरों का अनुपम उपहार

भागवत कथाओं में एक और प्रसंग आता है। एक बार श्रीकृष्ण वन में अपनी बांसुरी बजा रहे थे। उनकी मधुर तान पर मोरों का एक झुंड नृत्य करने लगा। नृत्य के बाद मोरों के राजा ने सबसे सुंदर पंख कान्हा के चरणों में अर्पित किया। कृष्ण ने स्नेहपूर्वक उसे अपने मुकुट में धारण कर लिया। तभी से मोरपंख उनके श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा बन गया।

मोरपंख का आध्यात्मिक महत्व

हिंदू शास्त्रों में मोरपंख को शुभता, प्रेम, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में कहा गया है कि मोरपंख के रंग – नीला, हरा और सुनहरा – सृष्टि के संतुलन और ब्रह्मांड की विविधता को दर्शाते हैं। भागवत पुराण में इसका उल्लेख कृष्ण की लीलाओं और प्रकृति से उनके अटूट संबंध का प्रतीक माना गया है। साथ ही इसे “तमस का नाशक” कहा गया है, जो नकारात्मक ऊर्जा और राहु-केतु के दोष को शांत करता है। घर में मोरपंख रखने से मानसिक शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

भक्ति में मोरपंख की अनिवार्यता

इन्हीं पौराणिक कथाओं और गहन आध्यात्मिक रहस्यों के कारण आज भी कृष्ण भक्ति मोरपंख के बिना अधूरी मानी जाती है। भक्तों का विश्वास है कि मोरपंख केवल सजावट नहीं, बल्कि भगवान की करुणा, रक्षा और आनंदमयी लीलाओं का प्रतीक है। यही वजह है कि जन्माष्टमी जैसे पर्व से लेकर दैनिक पूजन तक, मोरपंख कान्हा की पहचान का स्थायी प्रतीक बना हुआ है।

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