
उत्तराखंड की पावन वादियों में बसा केदारनाथ ज्योतिर्लिंग, जहां हर पत्थर में शिवत्व की गूंज महसूस होती है, न केवल चारधामों का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, बल्कि करोड़ों शिवभक्तों की आस्था और भक्ति का प्रतीक भी है। रुद्रप्रयाग जिले में स्थित यह दिव्य स्थल पंच केदार में भी शामिल है और 12 ज्योतिर्लिंगों में इसकी विशेष मान्यता है। हर साल हजारों श्रद्धालु कठिन यात्रा कर गौरीकुंड से लगभग 16 किलोमीटर का रास्ता तय करते हैं, बस एक झलक पाने के लिए – अपने भोले बाबा के।
यह स्थल न केवल अध्यात्मिक शांति देता है, बल्कि जीवन की उथल-पुथल के बीच एक दिव्य सुकून का अनुभव भी कराता है। और इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी पौराणिक गाथा भी बेहद भावुक करने वाली है, जो पांडवों, उनके पश्चाताप और भगवान शिव की करुणा से जुड़ी है।
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की कथा – पांडवों से क्यों खफा हुए भोलेनाथ?
महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन पांडवों के मन में युद्ध से उपजे पापों का बोझ अब भी भारी था। वे अपने कृत्यों के प्रायश्चित हेतु भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे। लेकिन भोलेनाथ—जो त्रिकालदर्शी हैं—पांडवों की मंशा को भांप गए और उनसे नाराज़ हो गए। वे नहीं चाहते थे कि पांडव उन्हें पा सकें, इसलिए जैसे ही पांडव कैलाश पहुंचे, शिवजी ने उन्हें दर्शन नहीं दिए और वहां से अंतर्धान हो गए।
लेकिन पांडव कहां हार मानने वाले थे। वे भटकते हुए केदार तक पहुंचे, उम्मीद और भक्ति के साथ। यह वो पल था जब मनुष्य की सच्ची भावना, उसके संकल्प से टकरा रही थी भगवान की परीक्षा से।
भैंस का रूप धरकर शिव हुए अदृश्य – भीम की चतुराई ने खोला रहस्य
शिवजी ने भैंस का रूप धारण कर बाकी पशुओं में जा छिपे। लेकिन जब सच्चे भक्त खोज में जुट जाएं तो ईश्वर भी कहां छुप सकते हैं? भीम को संदेह हुआ, तो उसने अपनी विशालता का प्रयोग किया—पहाड़ पर पैर फैला दिए, जिससे कोई पशु बाहर ना जा सके। सभी पशु निकल गए, लेकिन एक भैंस ज़मीन में समाने लगा।
भीम ने झट उसकी पीठ पकड़ ली। तभी शिवजी प्रकट हुए—उस भैंस के रूप में उनका पिंड धरती पर स्थिर रह गया, जिसे आज केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में पूजा जाता है। ये वो क्षण था, जब ईश्वर ने अपने भक्त की दृढ़ता के सामने झुक कर उसे दर्शन दिए।
जब पिघला भोलेनाथ का हृदय – पांडवों को मिला मोक्ष
शिवजी के प्रकट होते ही पांडवों की आंखों में ग्लानि और भक्ति के आंसू थे। भगवान का हृदय भी द्रवित हुआ और उन्होंने वहीं पर पांडवों को उनके सारे पापों से मुक्त कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि उस भैंस की पीठ वाला हिस्सा ही पिंड के रूप में रूपांतरित हुआ और आज केदारनाथ के रूप में पूजा जाता है।
नर और नारायण की तपस्या – एक और दिव्य कथा
केदारनाथ की एक अन्य मान्यता भी उतनी ही प्रेरणादायक है। कहा जाता है कि महातपस्वी नर और नारायण ने वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी ताकि शिवजी प्रसन्न हों। जब भगवान ने उन्हें दर्शन दिए तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की कि शिवजी इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो जाएं। शिवजी ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उनकी बात मान ली।
दर्शन-आरती और टिकट से जुड़ी अहम जानकारी
केदारनाथ मंदिर हर साल मई में श्रद्धालुओं के लिए खुलता है और नवंबर तक खुले रहता है। इसके बाद प्रतिकूल मौसम के कारण मंदिर बंद हो जाता है।
महाअभिषेक आरती: सुबह 4 बजे
शयन आरती: शाम 7 बजे
दर्शन का समय: सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक (दोपहर 3 से 5 बजे तक मंदिर बंद)
टिकट की व्यवस्था: सामान्य दर्शन के लिए टिकट नहीं है, लेकिन VIP और शीघ्रदर्शन टिकट 1100 से 5100 रुपये तक होते हैं, जो आप आधिकारिक वेबसाइट या मंदिर के पास काउंटर से प्राप्त कर सकते हैं।














