
श्रावण मास इस बार 11 जुलाई से आरंभ हो रहा है, जो भगवान शिव के भक्तों के लिए एक अत्यंत पावन अवसर होता है। ऐसे में कांवड़ यात्रा भी उसी दिन से शुरू होगी। अक्सर देखा गया है कि कुछ श्रद्धालु सावन लगने से पहले ही दो-तीन दिन पूर्व कांवड़ लेने निकल जाते हैं ताकि सावन की शुरुआत होते ही भगवान शिव को जल अर्पित कर सकें।
कांवड़ यात्रा इस बार 11 जुलाई से शुरू होकर 22 जुलाई तक चलेगी, यानी सावन के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तक कांवड़ चढ़ाने का विशेष महत्व रहेगा।
इस बार का सावन बहुत ही खास और शुभ है क्योंकि यह प्रीति योग और शिववास योग में आरंभ हो रहा है। मान्यता है कि शिववास योग में भगवान शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
कांवड़ यात्रा के शुभ मुहूर्त – ध्यान से देखें ये विशेष तिथियां
धार्मिक पंचांग के अनुसार कांवड़ यात्रा की शुरुआत 11 जुलाई से होगी। अगर आप चाहते हैं कि आपकी यात्रा पूर्ण रूप से शुभ और फलदायक हो, तो इन विशेष तारीखों पर कांवड़ लेना उत्तम रहेगा — 11, 14, 17, 18, 21 और 22 जुलाई।
हालांकि 13 जुलाई से पंचक शुरू हो रहा है, जो कि परंपरागत रूप से शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है। लेकिन एक भक्त के लिए संतोषजनक बात यह है कि कांवड़ यात्रा पर पंचक का प्रभाव नहीं माना जाता।
पंचक का प्रभाव 13 जुलाई शाम 6:50 बजे से 18 जुलाई सुबह 3:38 बजे तक रहेगा। लेकिन शिवभक्तों का यह दृढ़ विश्वास है कि कालों के भी काल महादेव के सामने पंचक का नियम भी महत्व नहीं रखता। इसलिए इस अवधि में भी कांवड़ यात्रा की जा सकती है।
कांवड़ कैसे चढ़ाएं – जानिए पूरी विधि
कांवड़ चढ़ाने के लिए सबसे पहले आपको किसी पवित्र नदी या स्रोत से जल लाकर, उसे पैदल यात्रा करके शिवलिंग पर अर्पित करना होता है। यह यात्रा केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक साधना और भक्ति की अनुभूति भी होती है।
ध्यान रखें कि सावन के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से लेकर शिवरात्रि तिथि तक ही जल चढ़ाने की परंपरा मानी जाती है। जब तक आप वह जल भगवान शिव के मंदिर में जाकर अर्पित नहीं करते, तब तक यह यात्रा अधूरी मानी जाती है। इसलिए जब आप अपने घर लौटें, तो सीधे पहले मंदिर जाएं और भगवान शिव को जल चढ़ाएं, यही इस यात्रा की पूर्णता मानी जाती है।
कांवड़ यात्रा के नियम – आस्था के साथ अनुशासन भी ज़रूरी है
कांवड़ यात्रा में कुछ नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है, जिनका उद्देश्य आपकी भक्ति को और अधिक शुद्ध और फलदायक बनाना है:
कांवड़ को कभी भी ज़मीन पर नहीं रखना चाहिए। यह नियम श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है। यदि थकान हो तो उसे कांवड़ स्टैंड या किसी ऊँचाई पर टांग सकते हैं।
यात्रा के दौरान नंगे पांव चलना होता है, जिससे भक्ति की तपस्या पूर्ण होती है।
भगवान शिव के भजन, कीर्तन और जयघोष यात्रा का हिस्सा होते हैं — ये मन को भक्तिभाव से भर देते हैं।
मानसिक और शारीरिक पवित्रता बनाए रखना जरूरी है — यानी गुस्से, अपशब्दों, अशुद्ध खानपान से बचें।
पूरे समय सात्विक भोजन का सेवन करें और संयम रखें।
जब आप जल लेकर लौटें, तो सीधे घर न जाएं, बल्कि पहले शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करें, यही नियम यात्रा की सफलता का प्रतीक माना गया है।














