
गुप्त नवरात्रि का नवम दिन यानी 4 जुलाई 2025, देवी मातंगी की उपासना के लिए अत्यंत मंगलकारी और गूढ़ माना जाता है। मातंगी महाविद्याओं में नवम स्थान पर हैं और उन्हें तांत्रिक परंपरा की ‘सरस्वती’ कहा जाता है। वे वाणी, संगीत, ज्ञान और अंतर्ज्ञान की देवी हैं, लेकिन शास्त्रीय सरस्वती से भिन्न, मातंगी गूढ़, अपवर्जित और सीमाओं से परे ज्ञान की प्रतीक हैं।
मातंगी का स्वरूप और प्रतीक
मातंगी को श्यामवर्णा, तीन नेत्रों वाली, वीणा वादिनी और हरे वस्त्रों में सुशोभित देवी के रूप में दर्शाया गया है। वे सिंह या शव पर विराजित होती हैं, जो दर्शाता है कि उनका ज्ञान केवल पुस्तकीय नहीं, बल्कि अंतःप्रज्ञा और तांत्रिक अनुभूति से उत्पन्न होता है।
उनकी उपासना के पीछे गहरा संदेश यह है कि ज्ञान को सीमाओं, जातियों, मर्यादाओं और रूढ़ियों से मुक्त होना चाहिए। वे उन साधकों की अधिष्ठात्री हैं जो नियमों को भीतर से आत्मसात करके उन्हें पार करने की क्षमता रखते हैं।
मातंगी और तांत्रिक साधना
मातंगी की पूजा तांत्रिक विधि से की जाती है, जिसमें मौन, जप, संगीत और ध्यान का विशेष महत्व होता है। वे उन साधकों को प्रिय हैं जो कलाओं, भाषाओं और अभिव्यक्ति के माध्यम से आत्मा की अभिव्यक्ति करना चाहते हैं।
उनकी साधना से साधक को न केवल बाहरी विद्या मिलती है, बल्कि वह अपनी ‘आवाज’, यानी स्वयं की आत्म-प्रकाशना को भी प्राप्त करता है। वह समाज की स्वीकृति या अस्वीकृति से ऊपर उठकर सच्चे स्वरूप को व्यक्त कर पाता है।
नवमी तिथि और ज्योतिषीय संयोग
4 जुलाई को नवमी तिथि में चंद्रमा की स्थिति तंत्र की मौन साधना और अंतर्ज्ञान के लिए अनुकूल रहेगी। इस दिन बुध और गुरु की युति मानसिक स्पष्टता और अभिव्यक्ति की कुशलता को जाग्रत करने वाली होगी।
इस दिन मौन व्रत, मंत्र-साधना और आत्मचिंतन द्वारा देवी मातंगी का आह्वान किया जाता है। जिन लोगों की वाणी में दोष होता है, या जो अपने विचार प्रकट नहीं कर पाते, उनके लिए यह साधना अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।
आधुनिक जीवन में मातंगी की भूमिका
आज की दुनिया में जहाँ संचार, भाषा, अभिव्यक्ति और प्रस्तुति सबसे बड़ी शक्तियाँ बन चुकी हैं, माँ मातंगी की साधना अत्यंत सामयिक हो जाती है। वे सिखाती हैं कि वाणी केवल बोलने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा का दर्पण है।
जिन लोगों को मंच पर बोलना, लेखन करना, संगीत, कला या न्यायिक सेवा करनी होती है—उनके लिए मातंगी की कृपा सफलता की कुंजी बन सकती है।
साथ ही, वे हमें सिखाती हैं कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह अंतर्मन से उत्पन्न हो और बाह्य स्वीकृति पर निर्भर न हो।
गुप्त नवरात्रि का नवम दिन देवी मातंगी की उपासना के साथ इस नौ दिवसीय आध्यात्मिक साधना का समापन करता है। यह दिन न केवल विद्या और वाणी की सिद्धि का प्रतीक है, बल्कि आत्मबोध, अंतःप्रज्ञा और सीमाओं से परे जाकर स्वयं को अभिव्यक्त करने की दिव्य कला का भी उत्सव है।
मातंगी की साधना से साधक अपने भीतर की छिपी प्रतिभा, ज्ञान और बोध को खोज पाता है, और उन्हें दुनिया के सामने व्यक्त करने का आत्मबल प्राप्त करता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक ग्रंथों, तांत्रिक परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है। इसमें दी गई जानकारी केवल आध्यात्मिक जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। किसी भी विशेष तांत्रिक साधना या पूजा से पहले किसी योग्य गुरु या विद्वान से मार्गदर्शन लेना आवश्यक है। यह लेख किसी प्रकार की अंधश्रद्धा या तांत्रिक प्रयोग के अनुशंसा हेतु नहीं है।














