
गोवर्धन पूजा का पर्व आज पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होता है और भगवान श्री कृष्ण की गोवर्धन पर्वत उठाने की अलौकिक लीला को समर्पित है। इस दिन भक्त पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।
अन्नकूट: भोगों का पर्वत
पूजा के दौरान गोवर्धन पर्वत के सामने विभिन्न प्रकार के अनाज, फल, दालें, सब्जियाँ और मिठाइयाँ भोग के रूप में सजाई जाती हैं। इसे अन्नकूट कहा जाता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘अन्न का पर्वत’। अन्नकूट भक्ति, समर्पण और समृद्धि का प्रतीक है।
56 भोग अर्पित करने की परंपरा
गोवर्धन पूजा में पारंपरिक रूप से 56 प्रकार के भोग भगवान कृष्ण को अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें ‘छप्पन भोग’ कहा जाता है। धार्मिक दृष्टि से इन भोगों का विशेष महत्व है। इसे श्री कृष्ण की उदारता, संपन्नता और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। 56 भोग अर्पित करने से जीवन में विविधता, खुशहाली और आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
56 भोगों में शामिल सामग्री
छप्पन भोग में स्वाद और परंपरा का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। इसमें शामिल हैं:
दालें और अन्न: माखन-मिश्री, शुद्ध देसी घी, चावल, गेहूं, मूंग, उड़द, मसूर, चना, राजमा, छोले।
सब्जियाँ: आलू, लौकी, तुरई, भिंडी, गवार फली, करेला, कद्दू, बैंगन, पालक।
फल: केला, सेब, अमरूद, संतरा, अंगूर, अनार, पपीता, आम, नारियल।
मिठाईयाँ: खीर, हलवा, लड्डू, पेड़ा, रसगुल्ला, बर्फी, खाजा, मोदक, घेवर, पारंपरिक मिठाइयाँ।
अन्य व्यंजन: चकली, पूड़ी, पकोड़ा, मठरी, उपमा, खिचड़ी, कढ़ी-चावल, दही, चटनी, पापड़।
भोग का आध्यात्मिक महत्व
अन्नकूट और 56 भोग की परंपरा केवल खाने-पीने की वस्तुएँ अर्पित करने तक सीमित नहीं है। इसका आध्यात्मिक संदेश यह है कि सच्ची भक्ति केवल मन या वाणी तक सीमित नहीं होती। जब भक्त पूर्ण समर्पण और सेवा भाव से भोग अर्पित करता है, तभी उसकी पूजा पूरी मानी जाती है।
भोग अर्पण न केवल देवी-देवताओं को प्रसन्न करता है, बल्कि साधक के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह भी बढ़ाता है। गोवर्धन पूजा की यह परंपरा धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।














