देवशयनी एकादशी के साथ शुरू हो रहा चातुर्मास, नियमों का पालन कर पाए भगवान विष्णु का आशीर्वाद

By: Ankur Mon, 19 July 2021 08:15 AM

देवशयनी एकादशी के साथ शुरू हो रहा चातुर्मास, नियमों का पालन कर पाए भगवान विष्णु का आशीर्वाद

20 जुलाई, मंगलवार को आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे देवशयनी एकादशी के रूप में जाना जाता हैं, इसी के साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाएगा और भगवान श्री हरि पाताल लोक में निद्रासन में चले जाते हैं। इस दौरान वे अपना कार्यभार भगवान शिव को सौंप देते हैं। चातुर्मास में सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक माह शामिल होते हैं। इन दिनों में मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है। इसी के साथ चातुर्मास से जुड़े कुछ नियम तय किए गए हैं जिनका पालन किया जाना बहुत जरूरी हैं जो कि भगवान विष्णु का आशीर्वाद दिलाते हैं। तो आइये जानते हैं उन नियमों के बारे में।

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- चातुर्मास में भगवान विष्णु जी का स्मरण करना चाहिए। इस अवधि में दूसरों को भला-बुरा नहीं कहना चाहिए। चातुर्मास में दूसरों की निंदा करना अथवा निंदा को सुनना पाप माना जाता है। अपने मन में किसी के प्रति बुरे ख्याल नहीं लाएं।

- मान्यता के अनुसार देवशयनी एकादशी से लेकर देवउठनी एकादशी तक पलंग अथवा खाट पर नहीं सोना चाहिए, बल्कि इस दौरान भूमि पर बिस्तर लगाकर शयन करना चाहिए। इस नियम का पालन करने वाले जातक को भगवान विष्णु जी आशीर्वाद प्राप्त होता है।

- मान्यता के अनुसार चातुर्मास के दौरान काले और नीले रंग के वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए। इन वस्त्रों को धारण करने से दोष लगता है और इस दोष की शुद्धि भगवान सूर्यनारायण के दर्शन होती है। इस अवधि में आप उपरोक्त रंग के वस्त्र धारण न करें।

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- चातुर्मास के दौरान कुछ विशेष खाद्य पदार्थों को भी नहीं खाना चाहिए। इस अवधि में मिर्च, उड़द की दाल एवं चने की दाल का त्याग करना चाहिए। इसके अलावा इन चार माह तक जातकों को मांस का सेवन नहीं करना चाहिए। चातुर्मास में ऐसा करने वाला जातक पुण्य का भागी होता है।

- चातुर्मास में भोजन करते समय वार्तालाप नहीं करना चाहिए, जो व्यक्ति ऐसा करता है वह पाप का भागी माना जाता है, जबकि मौन रहकर भोजन करने वाले जातक को पुण्य प्राप्त होता है। अगर पके हुए अन्न में कीड़े-मकोड़े पड़ जाएं तो वह अन्न अशुद्ध हो जाता है। उसका सेवन नहीं करें।

- चातुर्मास के दौरान नैतिक मूल्यों और ब्रह्मचर्य का पालन करें। त्याग, तपस्या, जप, ध्यान, स्नान, दान एवं पुण्य के कार्य इस अवधि में लाभकारी और पुण्यकारी माने जाते हैं।

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