हिंदू धर्म में मृत्यु को अंतिम सत्य माना जाता है और यह जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। हर व्यक्ति का इस पृथ्वी पर जन्म होता है और अंततः मृत्यु भी होती है। हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार, मृत्यु के बाद शव को चिता पर रखकर अग्नि दी जाती है और अग्नि में शव के जलने के बाद उसके अवशेषों (अस्थियों) को एकत्रित कर नदी में प्रवाहित किया जाता है। यह प्रथा मृतक की आत्मा को शांति और मुक्ति देने के लिए की जाती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार अस्थि विसर्जन का महत्व
गरुड़ पुराण में इस विषय को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है। इस धार्मिक ग्रंथ के अनुसार, अस्थि विसर्जन एक महत्वपूर्ण धार्मिक कार्य है, जिसे किसी भी हाल में नहीं टालना चाहिए। जब शरीर की मृत्यु होती है, तो आत्मा अपने शरीर को छोड़कर अगले जीवन की यात्रा पर निकल पड़ती है। अस्थियों को गंगा जैसी पवित्र नदी में प्रवाहित करने से मृतक की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
अस्थियों को विसर्जित न करने पर क्या होता है?
गरुड़ पुराण के अनुसार, शरीर पांच तत्वों – पृथ्वी, वायु, अग्नि, जल और आकाश – से बना होता है। अंतिम संस्कार के बाद, ये तत्व शरीर से अलग होकर अपने स्वाभाविक स्थानों पर लौट जाते हैं। अगर अस्थियों को विसर्जित नहीं किया जाता, तो इसे मृतक की आत्मा के लिए कष्टकारी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि अस्थियों का विसर्जन न होने से आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसे भटकने की स्थिति का सामना करना पड़ता है।
गरुड़ पुराण का संदेश
गरुड़ पुराण के अनुसार, यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और मृतक की आत्मा की शांति के लिए अस्थि विसर्जन आवश्यक है। अगर इसे नजरअंदाज किया जाता है, तो इससे आत्मा को शांति नहीं मिलती, और यह उसके लिए एक बाधा बन सकता है। यहीं नहीं अस्थियों को विसर्जित नहीं करने पर मृतक की आत्मा को मोक्ष प्राप्ति में कठिनाइयां आती हैं और वो इधर-उधर भटकती रहती है। अस्थियों को विसर्जित नहीं करने पर मृतक की आत्मा पृथ्वी लोक छोड़कर नहीं जाती। अत: अस्थि विसर्जन का कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है और इसे सही समय पर करना चाहिए।
हिंदू धर्म में गंगा नदी को न केवल पवित्र माना गया है, बल्कि यह मोक्ष देने वाली भी मानी जाती है। गंगा का विशेष स्थान है और इसे देवताओं की कृपा से धरती पर लाया गया माना जाता है। हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि गंगा में अस्थि विसर्जन करने से मृतक की आत्मा को शांति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गंगा को क्यों माना जाता है मोक्ष देने वाली नदी?
गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया गया एक पवित्र जल माना जाता है, जो जीवन और मृत्यु के पार जाकर आत्मा को मोक्ष की ओर मार्गदर्शन करती है। पवित्र गंगा में अस्थियों का विसर्जन करने से आत्मा को शांति मिलती है और यह उसका अंतिम पथ होता है जो उसे भटकने से बचाता है।
गंगा का जल अत्यंत शुद्ध और पवित्र है, और इसका संबंध दिव्य शक्ति से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने से मृतक के आत्मा को स्वर्ग की ओर यात्रा करने का अवसर मिलता है। यह हिंदू धर्म के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के लिए एक आवश्यक और प्रभावी कदम है।
गरुड़ पुराण में गंगा के महत्व का उल्लेख
गरुड़ पुराण में इस विषय को विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार, अंतिम संस्कार के तीसरे, सातवें और नौवें दिन मृतक की अस्थियों को एकत्रित किया जाता है। इन अस्थियों को गंगा नदी में विसर्जित करने से मृतक की आत्मा को शांति और मुक्ति मिलती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, दस दिनों के भीतर अस्थियों का विसर्जन जरूरी है, ताकि आत्मा को मोक्ष का मार्ग मिल सके।
गंगा में अस्थि विसर्जन का आध्यात्मिक प्रभाव
गंगा में अस्थि विसर्जन न केवल एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी है। गंगा के जल में स्नान करने और अस्थियों का विसर्जन करने से आत्मा को शांति मिलती है और उसे पुनः जन्म के चक्र से मुक्ति मिलती है। यही कारण है कि भारत भर में लोग गंगा के किनारे अस्थियों का विसर्जन करते हैं, ताकि मृतक के आत्मा को शांति और मोक्ष की प्राप्ति हो सके।