पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कई सांसद और नेता नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं। इसी बीच ऐसी अटकलें तेज हो गई हैं कि तृणमूल कांग्रेस के एक बड़े समूह का झुकाव भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर हो सकता है। हालांकि अब तक इस पूरे घटनाक्रम को लेकर किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन अंदरखाने चल रही चर्चाओं ने बंगाल की राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।
सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद पार्टी छोड़ने पर विचार कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यदि यह राजनीतिक बदलाव होता है, तो यह ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है। हाल के दिनों में पार्टी के कई पार्षदों के इस्तीफे और कुछ विधायकों की निष्क्रियता ने भी इन अटकलों को और मजबूत कर दिया है।
कितने सांसद बदल सकते हैं पाला?राजनीतिक रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल लगभग 12 सांसदों के भाजपा के संपर्क में होने की चर्चा है। इसके अलावा 5 से 6 अन्य सांसदों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जो कथित तौर पर पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। हालांकि इन सांसदों की पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि वे कब तक कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं।
सूत्रों का कहना है कि बातचीत का दायरा लगातार बढ़ रहा है और यह संख्या आगे चलकर 18 से 20 सांसदों तक पहुंच सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यदि लोकसभा में टीएमसी के कुल सांसदों में से दो-तिहाई सदस्य अलग गुट बना लेते हैं, तो दल-बदल कानून के प्रावधान उनके खिलाफ लागू नहीं होंगे। यही वजह है कि संख्या को लेकर काफी सावधानी के साथ रणनीति बनाई जा रही है।
मॉनसून सत्र तक साफ हो सकती है तस्वीरसियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि संसद के आगामी मॉनसून सत्र तक स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। माना जा रहा है कि कई सांसद अभी खुलकर सामने आने के बजाय राजनीतिक समीकरणों का इंतजार कर रहे हैं। खबरें यह भी हैं कि जिन नेताओं के नाम दल-बदल की चर्चाओं में सामने आ रहे हैं, उनमें कुछ ऐसे चेहरे भी शामिल हैं जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता रहा है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर इतने बड़े स्तर पर टूट होती है, तो यह केवल संगठनात्मक असंतोष नहीं बल्कि पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर गहराते मतभेदों का संकेत भी माना जाएगा। फिलहाल टीएमसी नेतृत्व सार्वजनिक तौर पर इन खबरों पर ज्यादा प्रतिक्रिया देने से बच रहा है।
चुनावी हार के बाद बढ़ी अंदरूनी बेचैनीविधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी संगठन को फिर से सक्रिय करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। इसी सिलसिले में 20 मई को टीएमसी ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन भी किया था। लेकिन इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विधायकों की गैरमौजूदगी ने पार्टी के भीतर की नाराजगी को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए।
बताया गया कि लगभग 80 विधायकों में से केवल 35 विधायक ही कार्यक्रम में पहुंचे। इससे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब टीएमसी नेतृत्व संगठन को जमीनी स्तर पर दोबारा मजबूत करने की रणनीति पर विचार कर रहा था।
हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता शोभनदेब चट्टोपाध्याय ने इन अटकलों को खारिज करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि कई विधायक संगठनात्मक जिम्मेदारियों और निजी कारणों की वजह से कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। बावजूद इसके विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषक इसे पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष से जोड़कर देख रहे हैं।
पार्षदों के इस्तीफों ने बढ़ाई चिंतातृणमूल कांग्रेस के लिए मुश्किलें केवल सांसदों और विधायकों तक सीमित नहीं दिख रही हैं। हाल ही में डायमंड हार्बर नगर पालिका में भी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। भाजपा की जीत के बाद यहां टीएमसी के आठ पार्षदों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
गौरतलब है कि इस नगर पालिका में कुल 16 पार्षद थे और सभी सीटों पर टीएमसी का कब्जा था। विपक्ष का एक भी पार्षद यहां मौजूद नहीं था। ऐसे में एक साथ आठ पार्षदों के इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।
बताया जा रहा है कि पार्षदों ने अलग-अलग कारणों का हवाला देते हुए अपने इस्तीफे सौंपे हैं, लेकिन विपक्ष इसे टीएमसी के कमजोर होते संगठन और नेतृत्व संकट से जोड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह घटनाक्रम बंगाल की राजनीति में और बड़े बदलावों का संकेत दे सकता है।