पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है। पार्टी के अंदर असंतोष और कुछ नेताओं की खुली नाराजगी के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी ने संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव करने का फैसला लिया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि आगामी राजनीतिक चुनौतियों से निपटने और संगठन को एकजुट बनाए रखने के लिए नई संरचना की जरूरत है। इसी दिशा में ममता बनर्जी ने कई अहम नियुक्तियों और जिम्मेदारियों के पुनर्वितरण की घोषणा की है।
सबसे ज्यादा चर्चा उस फैसले की हो रही है, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के साथ दो अन्य नेताओं को भी समान जिम्मेदारी दी गई है। अब तक संगठन में अभिषेक की भूमिका बेहद प्रभावशाली मानी जाती रही है, लेकिन नए बदलाव के बाद पार्टी के शीर्ष स्तर पर सामूहिक नेतृत्व को बढ़ावा देने की कोशिश दिखाई दे रही है।
राष्ट्रीय महासचिव पद पर बढ़ी साझेदारीतृणमूल कांग्रेस ने वरिष्ठ सांसद डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन को भी राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी है। दोनों नेता अब अभिषेक बनर्जी के साथ मिलकर संगठनात्मक मामलों को संभालेंगे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस कदम के जरिए पार्टी नेतृत्व ने निर्णय प्रक्रिया को अधिक संतुलित और सामूहिक बनाने का प्रयास किया है।
संगठन के भीतर लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि कुछ फैसले सीमित दायरे में लिए जा रहे हैं, जिससे कई वरिष्ठ नेताओं में असंतोष पैदा हुआ। ऐसे में नई नियुक्तियों को पार्टी के अंदर शक्ति संतुलन स्थापित करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली बनी विवाद की वजह?पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक हाल के महीनों में जो असंतोष उभरकर सामने आया है, उसका केंद्र सीधे तौर पर ममता बनर्जी नहीं बल्कि अभिषेक बनर्जी की कार्यप्रणाली रही है। विधानसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं होने के बाद कई नेताओं ने संगठन के भीतर फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठाए थे।
बताया जाता है कि चुनावी समीक्षा बैठकों के दौरान जब अभिषेक की भूमिका की सराहना की गई तो कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अपनी नाराजगी जाहिर की। उनका मानना था कि पार्टी की लोकप्रियता में आई गिरावट और कार्यकर्ताओं की दूरी बढ़ने के पीछे संगठनात्मक स्तर पर कुछ फैसले जिम्मेदार रहे हैं।
19 मई को कालीघाट में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में कई नेताओं ने पहली बार खुलकर अपनी राय रखी। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा जैसे नेताओं ने संगठन की दिशा और नेतृत्व शैली को लेकर सवाल उठाए, जिससे पार्टी के भीतर चल रही असहमति सार्वजनिक रूप से सामने आ गई।
पुराने सहयोगियों पर फिर जताया भरोसासंकट के इस दौर में ममता बनर्जी ने उन नेताओं को आगे बढ़ाने का फैसला किया है, जिन्हें लंबे समय से पार्टी का भरोसेमंद चेहरा माना जाता है। इसी क्रम में चंद्रिमा भट्टाचार्य को पश्चिम बंगाल तृणमूल कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह नियुक्ति केवल एक पद परिवर्तन नहीं बल्कि संगठन की नई दिशा का संकेत है।
वहीं वरिष्ठ नेता सुब्रत बख्शी को राष्ट्रीय कार्यसमिति में उपाध्यक्ष पद पर बरकरार रखा गया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी अनुभवी नेताओं की भूमिका को कमजोर करने के बजाय उन्हें और अधिक जिम्मेदारी देना चाहती है।
महिला नेतृत्व को भी मिला बड़ा स्थानतृणमूल कांग्रेस ने संगठन में महिला प्रतिनिधित्व को मजबूत करने पर भी जोर दिया है। पार्टी ने सजदा अहमद, ममता ठाकुर, नयना बंद्योपाध्याय और स्वाति खांडेकर को पश्चिम बंगाल इकाई का उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। इन नियुक्तियों को महिला नेतृत्व को आगे बढ़ाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
इसके अलावा युवा संगठन में भी कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया है। सांसद सयानी घोष को युवा तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी जारी रखने का फैसला लिया गया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि युवा वर्ग के बीच उनकी स्वीकार्यता संगठन के लिए लाभदायक साबित हो सकती है।
बागी नेताओं पर कुणाल घोष का तीखा हमलाइस बीच तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष ने पार्टी छोड़ने वाले और विरोध दर्ज कराने वाले नेताओं पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ नेता राजनीतिक दबाव और व्यक्तिगत हितों के कारण पार्टी से दूरी बना रहे हैं।
कुणाल घोष ने कहा कि चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद कुछ नेताओं ने अपनी राजनीतिक निष्ठा बदलनी शुरू कर दी। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जिन नेताओं को जनता ने ममता बनर्जी के नाम और पार्टी के प्रतीक पर वोट दिया, वही अब अलग राह पकड़ रहे हैं। उनके मुताबिक यह व्यवहार पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की भावनाओं के विपरीत है।
उन्होंने दावा किया कि कुछ व्यक्तियों के जाने से संगठन कमजोर नहीं होगा क्योंकि जमीनी स्तर का कार्यकर्ता आज भी ममता बनर्जी के नेतृत्व पर भरोसा रखता है और पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है।
आंतरिक चुनौतियों के बीच नई परीक्षा
तृणमूल कांग्रेस में यह व्यापक फेरबदल ऐसे समय किया गया है जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व और संगठनात्मक ढांचे को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ममता बनर्जी की नई रणनीति का उद्देश्य असंतुष्ट नेताओं को साधना, संगठन में संतुलन बनाना और आगामी राजनीतिक चुनौतियों के लिए पार्टी को तैयार करना माना जा रहा है।
अब राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया संगठनात्मक ढांचा पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को खत्म कर पाएगा या फिर असंतोष की आवाजें आगे भी सुनाई देती रहेंगी। आने वाले महीनों में इस बदलाव का असर न केवल तृणमूल कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर बल्कि पश्चिम बंगाल की समूची राजनीतिक तस्वीर पर भी देखने को मिल सकता है।