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दानाकिल डिप्रेशन : जहन्नुम का दरवाजा है ये जगह, पूरे साल रहता है 45 डिग्री सेल्सियस तापमान

जीवन जीने का मजा तभी आता है जब उस जगह का वातावरण संतुलित और मानव सम्मित हो।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Fri, 27 Jul 2018 6:23:44

दानाकिल डिप्रेशन : जहन्नुम का दरवाजा है ये जगह, पूरे साल रहता है 45 डिग्री सेल्सियस तापमान

जीवन जीने का मजा तभी आता है जब उस जगह का वातावरण संतुलित और मानव सम्मित हो। बहुत ज्यादा सर्दी या बहुत ज्यादा गर्मी जिंदगी को पनपने नहीं देती। खासकर ऐसी जगहों पर जीवनयापन करना बहुत कठिन होता हैं जहां हमेशा प्राकृतिक विपदाओं का सामना करना पड़े। आज हम आपको ऐसी ही एक जगह के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे दुनिया का जहन्नुम कहा जाता हैं और इस जगह का नाम है दानाकिल डिप्रेशन। ये वो इलाका है जिसकी कोख में धरती की तीन कॉन्टिनेंटल प्लेट आपस में टकराती हैं। तो आइये जानते हैं इस जगह के बारे में।

यहां धरती से लावा और एसिड बाहर आते रहते हैं। डानाकिल डिप्रेशन में साल भर औसत तापमान 45 डिग्री सेल्सियस रहता है। इसे इलाके के लोग ‘जहन्नुम का दरवाजा’ भी कहते हैं। हाल ही में यहां जिंदगी के निशान मिले हैं। ये समुद्र की सतह से करीब 330 फुट नीचे है।

यहां दो ऐसे ज्वालामुखी हैं जो अक्सर सक्रिय रहते हैं। इसमें से एक है ‘इरता अले’। इस ज्वालामुखी की चोटी में लावा खौलता रहता है। आस-पास तेजाब के तालाब हैं। जहां से हर समय भाप उठती रहती है। इस ज्वालामुखी के मुहाने को ‘डालोल’ कहते हैं। समुद्र का खारा पानी जब ज्वालामुखी से निकलने वाले खनिजों और लावा के साथ मिलता है, तो कई तरह के चमकीले रंग पैदा करता है। तेजाब के तालाब में जब सल्फर और नमक एक दूसरे के साथ मिलते हैं तो चमकीला पीला रंग दिखाई देता है। इसी तरह जब ये तांबा नमक के साथ मिलता है तो चमकीला फिरोजी रंग तैयार होता है।

साल 2013 से पहले तक दानाकिल के बारे में दुनिया को बहुत ज्यादा मालूम नहीं था। लेकिन साल 2013 में ‘यूरोप्लांट’ की टीम ने इस इलाके में रिसर्च करना शुरू किया। यूरोप्लांट रिसर्च संस्थाओं और कंपनियों का एक संघ है। जिसका काम धरती के ऐसे इलाकों पर तजुर्बे करना है, जिससे मंगल ग्रह पर रिसर्च करने में मदद मिले। इस बारे रिसर्चर्स का मानना है कि इस इलाके तक पहुंचना आसान काम नहीं है। साल 2012 में यूरोप के कुछ रिसर्चर यहां आए थे, लेकिन उन्हें अगवा कर लिया गया था। यहां तक पहुंचने के लिए इस देश के फौजी साथियों की मदद की दरकार होती है।

इस इलाके की हवा में क्लोरीन और हाईट्रोजन सल्फाइड गैस अधिक मात्रा घुली हुई है। इसीलिए यहां आने वाले रिसर्चर्स को गैस मास्क का सहारा लेकर ही यहां आना पड़ता है। प्रोफेसर क्वालाजी के अनुसार ये पता होना बेहद जरूरी है कि किस जगह पर जमीन के भीतर ज्यादा हलचल मची है। गलती से भी अगर आपने उस जगह पर पैर रख दिया या आप गिर गए तो जलने से आपको कोई नहीं बचा सकता।

रिसर्चर्स ने साल 2013 में यहां काम शुरू किया था, इसके बाद साल 2016 में नमूने जमा किए और साल 2017 में बहुत से नमूनों के साथ लौटे। अच्छी बात ये रही कि रिसर्चर्स की मेहनत बेकार नहीं गई। जिस काम के लिए वो वहां गए थे उसमें सफल हुए। यहां से लिए गए नमूनों में उन्हें कुछ बैक्टीरिया मिले जिससे जिंदगी होने के सबूत मिले। दो अलग अलग जगह के नमूनों में अलग अलग तरह के बैक्टीरिया पाए गए।

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