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आध्यात्म के साथ प्राकृतिक सुंदरता का अहसास करवाता हैं अम्बाजी-देवी का घर

By: Anuj Sat, 16 May 2020 3:24 PM

आध्यात्म के साथ प्राकृतिक सुंदरता का अहसास करवाता हैं  अम्बाजी-देवी का घर

अम्बाजी प्राचीन भारत का सबसे पुराना और पवित्र तीर्थ स्थान है। ये शक्ति की देवी सती को समर्पित बावन शक्तिपीठों में से एक है। गुजरात और राजस्थान की सीमा पर बनासकांठा जिले की दांता तालुका में स्थित गब्बर पहाड़ियों के ऊपर अम्बाजी माता स्थापित हैं। अम्बाजी में दुनियाभर से पर्यटक आकर्षित होकर आते हैं, यह स्थान अरावली पहाड़ियों के घने जंगलों से घिरा है। यह स्थान पर्यटकों के लिये प्रकृतिक सुन्दरता और आध्यात्म का संगम है।

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अंबाजी मंदिर का इतिहास

अम्बे माता या देवी माँ का स्थान हिंदू तीर्थयात्रियों के लिए धार्मिक पर्यटन का एक प्रसिद्ध स्थान है। इस मंदिर में पूर्व वैदिक काल से पूजा की जाती है और देवी को अरासुर नी अम्बे माँ के रूप में स्वीकार किया जाता है क्योंकि मंदिर अरावली पहाड़ियों के शीर्ष पर स्थित है। अंबाजी मंदिर व्यापक रूप से सबसे महत्वपूर्ण शक्ति पीठ में से एक के रूप में जाना जाता है और यह सर्वविदित है कि क्षेत्र के आसपास के लोग पवित्र भजन के रूप में अंबाजी का नाम लेते रहते हैं। अंबाजी को दुनिया के सर्वोच्च ब्रह्मांडीय नियंत्रक के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक रूप से, देवी की कोई मूर्ति या तस्वीर कभी नहीं देखी गई है, हालांकि पुजारियों ने छत के ऊपर भीतरी क्षेत्र को एक तरह से चित्रित किया था जो देवी की दीप्तिमान छवि को दिखाता है।

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कैसे पहुंचें

गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित विख्यात तीर्थस्थल अम्बाजी मंदिर मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक है तथा यहां वर्षपर्यंत भक्तों का रेला लगा रहता है।अम्बाजी मंदिर गुजरात और राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है। आप यहां राजस्थान या गुजरात जिस भी रास्ते से चाहें पहुंच सकते हैं। यहां से सबसे नजदीक स्टेशन माउंटआबू का पड़ता है। आप अहमदाबाद से हवाई सफर भी कर सकते हैं। अम्बाजी मंदिर अहमदाबाद से 180 किलोमीटर और माउंटआबू से 45 किलोमीटर दूरी पर स्थित है।
बलराम अम्बाजी वन्यजीव अभ्यारण्य- बलराम अम्बाजी वन्यजीव अभ्यारण्य गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित है। क्षेत्र के विपरीत सिरों पर स्थित बलराम और अम्बाजी मन्दिरों के कारण ही अभ्यारण्य का यह नाम पड़ा। इस अभ्यारण्य को गुजरात सरकार द्वारा वन्यजीवों और उनके वातावरण के उत्थान तथा विकास के लिये 7 अगस्त 1989 में स्थापित किया गया था। अभ्यारण्य में दुर्लभ जन्तुओं तथा पक्षियों का विशाल संग्रह है जिनमें आलसी भालू, साही, पट्टीदार हाइना, ब्लूबुल, लोमड़ी, भारतीय मुश्कबिलाव और भारतीय पैंगोलिन आदि शामिल हैं। क्षेत्र में कडाया, गुग्गल और मूसली जैसे कई औषधीय पौधे भी पाये जाते हैं।

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धार्मिक महत्व

अम्बाजी मन्दिर को भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में गिना जाता है। एक मान्यता के अनुसार देवी सती का हृदय गब्बर पहाड़ी के ऊपर गिरा था। अरासुरी अम्बाजी के पवित्र मन्दिर में, जैसे कि यह अरासुर पर्वत पर स्थित है, पावन देवी की कोई मूर्ति नहीं है। श्री वीसा यन्त्र की ही मुख्य मूर्ति के रूप में पूजा की जाती है। यन्त्र को नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता। इस श्री वीसा यन्त्र की पूजा करने के लिये आँखों पर पट्टी बाँधनी पड़ती है। भाद्रपद महीने की पूर्णिमा को एक मेले का आयोजन किया जाता है जिसमें जुलाई के महीने में माँ अम्बे की आराधना के लिये लोग देश भर से यहाँ आते हैं।

गब्बर पहाडिया

गुजरात-राजस्थान की सीमा पर स्थित अम्बाजी गाँव से 4 किमी की दूरी पर स्थित गब्बर पहाड़ियों को अम्बाजी माता का मूल स्थान माना जाता है। तन्त्र चूड़ामणि के एक उल्लेख के अनुसार देवी सती के हृदय का एक भाग इस पर्वत के ऊपर गिरा था। मन्दिर तक पहुँचने के लिये पहाड़ी पर 999 सीढियाँ चढ़नी पड़ती हैं। पहाड़ी के ऊपर से सूर्यास्त देखने के अनुभव भी बेहतरीन होता है।

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