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आखिर नेपाल में अचानक कैसे आई इतनी भयानक बाढ़?, सामने आई चौंकाने वाली वजह

नेपाल में अचानक आई भीषण बाढ़ की संभावित वजह ग्लेशियर का टूटना बताई जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार 17 हजार फीट ऊंचाई से बर्फ का विशाल हिस्सा गिरा।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 27 Aug 2026 8:21:01

आखिर नेपाल में अचानक कैसे आई इतनी भयानक बाढ़?, सामने आई चौंकाने वाली वजह

नेपाल में बुधवार को अचानक आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। दर्जनों लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। कई गांव तेज पानी की चपेट में आ गए और लोगों को संभलने का पर्याप्त समय नहीं मिला। शुरुआती सवालों के बीच अब वैज्ञानिकों के विश्लेषण ने इस प्राकृतिक आपदा की संभावित वजह की ओर इशारा किया है।

भूवैज्ञानिकों और ग्लेशियोलॉजिस्ट्स के शुरुआती आकलन के मुताबिक, काठमांडू के उत्तर में एक ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर करीब 4,000 फीट नीचे घाटी में जा गिरा। इस तरह की घटना को वैज्ञानिक तौर पर ‘आइस एवलांच’ यानी बर्फ का भूस्खलन कहा जाता है। इसके बाद बर्फ, पानी और मलबे का तेज बहाव घाटी में फैल गया, जिससे बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।

17 हजार फीट की ऊंचाई पर था बर्फ का विशाल हिस्सा

कनाडा की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलगरी के भूवैज्ञानिक डैनियल शुगर ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर घटना का शुरुआती विश्लेषण किया। उनके मुताबिक, ग्लेशियर का एक हिस्सा अलग होकर लगभग 4,000 फीट नीचे घाटी में गिरा।

वैज्ञानिकों के अनुसार, टूटकर अलग हुआ बर्फ का टुकड़ा करीब 2,000 फीट चौड़ा था और लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई पर मौजूद था। इतनी ऊंचाई से भारी बर्फ के नीचे गिरने के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है। स्कॉटलैंड की डंडी यूनिवर्सिटी के ग्लेशियोलॉजिस्ट साइमन कुक के अनुसार, गिरने की इस ताकत से बर्फ टूटकर तेजी से बहने वाले पानी और मलबे में बदल सकती है।

डैनियल शुगर ने सैटेलाइट तस्वीरों का हवाला देते हुए बताया कि घाटी के निचले हिस्से में ग्लेशियर के टूटे अवशेष बड़ी मात्रा में दिखाई देते हैं।

काठमांडू से करीब 40 मील उत्तर में हुई घटना

वैज्ञानिकों की शुरुआती जानकारी के अनुसार ग्लेशियर टूटने की घटना काठमांडू से लगभग 40 मील उत्तर में हुई। इसके बाद बर्फ, पानी और मलबे का बहाव घाटी से होते हुए उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ा और भोटे कोशी नदी की तरफ पहुंचा। यह नदी नेपाल और तिब्बत की सीमा के पास स्थित है।

साइमन कुक ने इस घटना की तुलना 2021 में उत्तराखंड में हुई ग्लेशियर आपदा से की। उस घटना के बाद आई बाढ़ में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

भूकंप को लेकर शुरुआती जानकारी बाद में बदली

घटना के शुरुआती चरण में अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण यानी USGS के डेटा में इलाके में 4.4 तीव्रता के भूकंप का संकेत मिला था। हालांकि बाद में एजेंसी ने स्पष्ट किया कि दर्ज हुआ सिस्मिक सिग्नल किसी प्राकृतिक भूकंप की वजह से नहीं था।

USGS की वेबसाइट के अनुसार, ग्लेशियर से जुड़े भूस्खलन की ताकत से पैदा हुए प्रभाव का सिस्मिक सिग्नल 5.2 मैग्नीट्यूड के बराबर था। फ्रांस की यूनिवर्सिटी ग्रेनोबल एल्प्स की भू-आकृति वैज्ञानिक क्रिस्टन कुक के मुताबिक, स्थानीय सिस्मिक रिकॉर्ड में सुबह करीब 8:40 बजे एक बड़े हिस्से के अचानक नीचे खिसकने का संकेत मिला। इसके कुछ ही समय बाद पानी और मलबे के तेज बहाव के संकेत दर्ज हुए।

क्या बढ़ते तापमान ने बढ़ाया खतरा?

वैज्ञानिकों ने इस घटना में बढ़ते तापमान की संभावित भूमिका से भी इनकार नहीं किया है। शुरुआती सैटेलाइट तस्वीरों में घटना से एक दिन पहले इलाके में बर्फ का कवर तेजी से कम होता दिखाई दिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापमान बढ़ने से बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज हुई हो सकती है, जिसने ग्लेशियर के इस हिस्से के टूटने में भूमिका निभाई हो।

हालांकि, इस समय इसे अंतिम कारण नहीं माना जा रहा है। बादलों के कारण घटना की पूरी सैटेलाइट तस्वीरें उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, आगे मिलने वाली साफ तस्वीरों से घटना की परिस्थितियों को समझने में मदद मिल सकती है।

डैनियल शुगर ने यह भी कहा कि वीडियो में दिखाई देने वाले पानी की मात्रा हाल की ग्लेशियर आपदाओं में देखी गई मात्रा से काफी अधिक लगती है। इसलिए उन्होंने इस बात की संभावना से भी इनकार नहीं किया कि इस तबाही के पीछे कोई अतिरिक्त वजह हो सकती है।

फिलहाल वैज्ञानिकों का शुरुआती आकलन ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने और उसके बाद बने पानी-मलबे के तेज बहाव को नेपाल में आई अचानक बाढ़ की प्रमुख संभावित वजह के रूप में देखता है। हालांकि, घटना के सटीक कारणों को लेकर आगे के सैटेलाइट और वैज्ञानिक विश्लेषण का इंतजार किया जा रहा है।

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