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क्या परियों के देश में खो गई बबीता पांडे? 27 दिन बाद भी नहीं मिला सुराग, फिर चर्चा में आई उत्तराखंड की रहस्यमयी लोककथा

उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक से 27 दिन पहले लापता हुई बबीता पांडे का अब तक कोई सुराग नहीं मिला है। इस रहस्यमयी गुमशुदगी के बीच उत्तराखंड की परियों के देश से जुड़ी लोककथाएं और मान्यताएं एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 24 Jun 2026 11:55:13

क्या परियों के देश में खो गई बबीता पांडे? 27 दिन बाद भी नहीं मिला सुराग, फिर चर्चा में आई उत्तराखंड की रहस्यमयी लोककथा

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले स्थित दयारा बुग्याल ट्रेक से लापता हुई एमबीए छात्रा बबीता पांडे का रहस्य समय के साथ और गहराता जा रहा है। 29 मई को रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हुई 24 वर्षीय बबीता का 27 दिन बीत जाने के बाद भी कोई सुराग नहीं मिल पाया है। लगातार चल रहे व्यापक खोज अभियान के बावजूद जांच एजेंसियों के हाथ अब तक कोई ठोस सफलता नहीं लगी है।

रामनगर निवासी बबीता पांडे दयारा बुग्याल ट्रेक पर गई थीं, जहां से वह अचानक लापता हो गईं। उनकी तलाश में पुलिस, प्रशासन, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, वन विभाग, स्थानीय पुलिस, डॉग स्क्वाड, गोताखोरों, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान की टीमों और स्थानीय ग्रामीणों ने संयुक्त अभियान चलाया, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। आधुनिक तकनीकों की मदद से मोबाइल सर्विलांस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और सीसीटीवी फुटेज की भी जांच की जा रही है। हालांकि इस बीच पहाड़ों में एक पुरानी चर्चा फिर से लोगों की जुबान पर लौट आई है—क्या बबीता को परियां अपने साथ ले गईं?

दयारा बुग्याल और परियों की लोककथाओं का पुराना संबंध

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत में लोककथाओं और दैवीय मान्यताओं का विशेष स्थान रहा है। यहां की लोकभाषा में परियों को 'आंचरी' या 'वन देवी' के रूप में जाना जाता है। पहाड़ों के दूरस्थ और ऊंचे इलाकों को लेकर ऐसी अनेक कहानियां पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं।

टिहरी जिले में स्थित खैट पर्वत को तो स्थानीय लोग आज भी "परियों का देश" कहते हैं। वहां इस नाम का एक बोर्ड भी लगाया गया है, जिस पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है—"प्रसिद्ध खैट पर्वत, परियों का देश"। यही वजह है कि बबीता की गुमशुदगी को लेकर भी कुछ लोग इन पुरानी लोकमान्यताओं का जिक्र करने लगे हैं।

स्थानीय लोगों के बीच फिर जीवित हुईं पुरानी मान्यताएं

इलाके के कई ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों से जुड़े लोग इस घटना को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं कर रहे हैं। कुछ लोग इसे पहाड़ों की रहस्यमयी लोककथाओं और अदृश्य शक्तियों से जोड़कर देख रहे हैं। वर्षों से इस क्षेत्र में ट्रैकिंग कराने वाले आशुतोष बताते हैं कि दयारा बुग्याल और उसके आसपास का इलाका बेहद घना, विशाल और प्राकृतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है।

उनके अनुसार चारों ओर फैले जंगल, ऊंची पर्वत श्रृंखलाएं और दूर-दूर तक फैला एकांत वातावरण कई बार रहस्यमयी अनुभव कराता है। आशुतोष कहते हैं कि इतनी लंबी खोजबीन के बाद भी जब कोई सुराग नहीं मिलता, तो लोगों के मन में पुराने किस्से फिर से उभरने लगते हैं। उनका कहना है कि लोककथाओं में आंचरी यानी परियों का उल्लेख लंबे समय से मिलता रहा है। हालांकि नई पीढ़ी इन मान्यताओं को अधिक महत्व नहीं देती, लेकिन पहाड़ों में आज भी ऐसी कहानियां लोगों के बीच जीवित हैं।

ऊंचाई वाले इलाकों को लेकर बुजुर्गों की सलाह

आशुतोष बताते हैं कि पहाड़ों में बुजुर्ग अक्सर चेतावनी देते रहे हैं कि ऊंचे और निर्जन इलाकों में बहुत चमकीले या भड़कीले कपड़े पहनकर नहीं जाना चाहिए। साथ ही वहां अनावश्यक शोर-शराबा या तेज आवाज में चिल्लाने से भी बचना चाहिए।

उनका कहना है कि वर्षों की ट्रैकिंग के दौरान कई बार ऐसा महसूस होता है कि सुनसान पहाड़ी क्षेत्रों में कोई अदृश्य उपस्थिति आसपास मौजूद है। हालांकि इसे वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं किया जा सकता, लेकिन लोकविश्वासों में ऐसे अनुभवों का अक्सर उल्लेख मिलता है।

नौ बहनों की कहानी आज भी सुनाई जाती है

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार चौड़ा गांव में कभी आशा रावत नामक महिला की नौ अत्यंत सुंदर बेटियां थीं। कहा जाता है कि एक सुबह उन्होंने देखा कि चारों ओर अंधेरा है, लेकिन खैट पर्वत की दिशा से अद्भुत प्रकाश दिखाई दे रहा है।

किंवदंती के अनुसार सभी नौ बहनें उस रोशनी का स्रोत देखने के लिए वहां पहुंचीं, लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटीं। लोककथा में माना जाता है कि वे सभी परियों में परिवर्तित हो गईं। आज भी क्षेत्र के लोग विश्वास करते हैं कि खैट पर्वत के आसपास स्थित नौ पहाड़ियों पर वे परियां निवास करती हैं और पूरे क्षेत्र की रक्षा करती हैं।

जीतू बगड़वाल और बांसुरी की प्रसिद्ध कथा

उत्तराखंड की लोकगाथाओं में जीतू बगड़वाल का नाम भी विशेष रूप से लिया जाता है। लोककथाओं के अनुसार जीतू एक बेहद आकर्षक और प्रतिभाशाली युवक था, जो बांसुरी बहुत मधुर स्वर में बजाता था।

जब वह अपने पशुओं को चराने या खेतों में काम करने जाता, तो खाली समय में बांसुरी बजाया करता था। कहा जाता है कि एक दिन वह खैट पर्वत के पास रुका और बांसुरी बजाने लगा। उसकी धुन इतनी मनमोहक थी कि परियां उससे आकर्षित हो गईं और उसे अपने साथ ले गईं। मान्यता है कि उस समय वह अपनी बहन को उसके ससुराल रैथल गांव से वापस लाने जा रहा था, लेकिन फिर कभी लौटकर नहीं आया।

लोकविश्वासों में आज भी जीवित हैं ये मान्यताएं

उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में आज भी ऐसी कई लोकधारणाएं सुनने को मिलती हैं। ग्रामीणों का मानना है कि कुछ स्थानों पर विशेष प्रकार की ऊर्जा या दैवीय शक्तियों का निवास होता है।

इसी वजह से इन क्षेत्रों में तेज आवाज में गाना-बजाना, चिल्लाना या हुड़दंग करना उचित नहीं माना जाता। कई लोग चमकदार और आकर्षक कपड़े पहनने से भी परहेज करने की सलाह देते हैं। हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी वे स्थानीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी हुई हैं।

आधुनिक तकनीक से जारी है बबीता की तलाश

बबीता पांडे की खोज के लिए आधुनिक संसाधनों का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है। ड्रोन कैमरों, मोबाइल ट्रैकिंग, तकनीकी निगरानी और अन्य आधुनिक उपकरणों की सहायता से लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।

सौ से अधिक लोग विभिन्न क्षेत्रों में उसकी तलाश में जुटे हुए हैं। बावजूद इसके अब तक कोई ऐसा संकेत नहीं मिला है जिससे उसकी स्थिति का पता चल सके। इसी कारण स्थानीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं।

हालांकि तकनीक और वैज्ञानिक युग में परियों से जुड़ी बातें कई लोगों को महज अंधविश्वास लगती हैं। लेकिन यह भी सच है कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में ऐसी कहानियां सदियों से सुनाई जाती रही हैं और आज भी कई लोग उन्हें अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा मानते हैं।

27 दिन बाद भी कायम है रहस्य

पुलिस और प्रशासन लगातार यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जांच पूरी तरह तथ्यों, वैज्ञानिक प्रमाणों और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। अधिकारियों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और जांच एजेंसियों का सहयोग करने की अपील की है।

वहीं स्थानीय ट्रैकिंग व्यवसायियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी कहना है कि इस मामले को लेकर अनावश्यक अटकलों से बचना चाहिए। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बबीता पांडे को जल्द से जल्द खोजा जाए।

27 दिन बीत जाने के बावजूद बबीता की गुमशुदगी अब भी एक अनसुलझा रहस्य बनी हुई है। परिवार के लोग उसकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद में हर दिन इंतजार कर रहे हैं, जबकि बचाव दल और जांच एजेंसियां लगातार नए सुराग तलाशने में जुटी हैं। पूरे उत्तराखंड की नजरें अब इस रहस्यमयी मामले के अगले घटनाक्रम और जांच के संभावित नतीजों पर टिकी हुई हैं।

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