महाराष्ट्र में बारिश की कमी और फसलों को हुए नुकसान को लेकर शिवसेना (यूबीटी) ने राज्य सरकार से तत्काल कदम उठाने की मांग की है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया है कि राज्य के कई हिस्से सूखे जैसी स्थिति से गुजर रहे हैं और सरकार को बिना शर्त राहत उपलब्ध कराने के लिए नियमों में ढील देनी चाहिए। संपादकीय में महाराष्ट्र में तुरंत सूखा आपातकाल घोषित करने और किसानों के लिए सरकारी खजाना खोलने की मांग की गई है।
संपादकीय के मुताबिक, मानसून के मुख्य दौर में पर्याप्त बारिश नहीं होने से मराठवाड़ा, पश्चिमी महाराष्ट्र और विदर्भ के बड़े हिस्से में खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है। इसमें दावा किया गया है कि एल नीनो के गंभीर प्रभाव के चलते सोलापुर, अहिल्यानगर, मराठवाड़ा और पश्चिमी विदर्भ के कई इलाकों में कई हफ्तों तक बारिश नहीं हुई। कुछ स्थानों पर करीब दो महीने तक बारिश नहीं होने का भी उल्लेख किया गया है।
सोयाबीन से लेकर मक्का तक फसलों पर असर का दावा
शिवसेना (यूबीटी) के संपादकीय में कहा गया है कि बारिश की कमी का सीधा असर खेतों में खड़ी फसलों पर पड़ा है। सोयाबीन, कपास, तुअर, मूंग, उड़द, ज्वार और मक्का जैसी फसलों के सूखकर खराब होने का दावा किया गया है।
संपादकीय के अनुसार, जिन किसानों के पास कुएं या सिंचाई की सुविधा है, उन्हें भी उत्पादन में 50 से 70 प्रतिशत तक कमी की आशंका है। वहीं, पूरी तरह बारिश पर निर्भर किसानों की फसल बर्बाद होने की बात कही गई है।
पार्टी ने इसे केवल मौजूदा खरीफ सीजन तक सीमित संकट नहीं बताया है। संपादकीय में कहा गया है कि बारिश की कमी का असर आने वाले रबी सीजन पर भी पड़ सकता है।
कुएं, तालाब और बोरवेल सूखने का भी जिक्र
संपादकीय में जल स्रोतों की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें कहा गया है कि बारिश के मौसम के बीच ही कुएं, तालाब और बोरवेल समय से पहले सूख रहे हैं।
पार्टी के मुताबिक, इसका असर अगली बुवाई पर भी पड़ सकता है क्योंकि किसानों के पास रबी की फसल के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं रह सकता। संपादकीय में इसे किसानों की पूरे साल की आजीविका से जुड़ा संकट बताया गया है।
कर्नाटक का उदाहरण देकर महाराष्ट्र सरकार पर सवाल
'सामना' के संपादकीय में सूखे से निपटने की कार्रवाई में कथित देरी को लेकर राज्य सरकार पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें पड़ोसी राज्य कर्नाटक का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वहां कई हफ्ते पहले सूखा घोषित कर राहत के उपाय शुरू किए गए थे।
इसके विपरीत, संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और मंत्री लौटते मानसून का इंतजार कर रहे हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि मुख्यमंत्री और सरकारी अधिकारी अब खेतों का दौरा कर जमीनी स्थिति का जायजा लेने लगे हैं।
संपादकीय में कहा गया, "हालांकि मुख्यमंत्री और सरकारी अधिकारी हाल ही में जमीनी हकीकत का जायजा लेने के लिए खेतों का दौरा करने लगे हैं, लेकिन औपचारिक सर्वे, पंचनामे और मंत्रियों की समीक्षा बैठकों से तत्काल राहत में देरी नहीं होनी चाहिए।"
सूखे के साथ मंडियों में कम दाम मिलने का मुद्दा
शिवसेना (यूबीटी) ने किसानों की मुश्किलों को केवल मौसम तक सीमित नहीं रखा है। संपादकीय में कृषि उपज के लिए बाजार में मिलने वाले दाम का मुद्दा भी उठाया गया है। इसमें परभणी जिले के सैलू तालुका के किसान जीवन कावड़े का उदाहरण दिया गया है।
संपादकीय के अनुसार, सूखे के बावजूद जीवन कावड़े ने चार क्विंटल मिर्च की खेती की। उनकी पूरी उपज के लिए व्यापारियों ने कथित तौर पर सिर्फ 1,017 रुपये दिए। वहीं, केवल कटाई की मजदूरी पर ही 2,000 रुपये खर्च होने की बात कही गई है। इसके अलावा बीज, खाद और परिवहन का खर्च भी किसान को उठाना पड़ा।
इस उदाहरण के जरिए संपादकीय में कहा गया है कि मौसम की मार के साथ किसानों को बाजार में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
एपीएमसी बाजारों में जाने की अपील
शिवसेना (यूबीटी) ने नेताओं से एपीएमसी बाजारों का दौरा करने की अपील की है। संपादकीय में संकट में फंसे किसानों की उपज का कम दाम देने वाले और उनका कथित शोषण करने वाले बिचौलियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
पार्टी ने मौजूदा स्थिति को लाखों किसान परिवारों के लिए बेहद गंभीर बताते हुए राज्य सरकार से राहत प्रक्रिया तेज करने को कहा है। संपादकीय में मांग की गई है कि किसानों की तत्काल मदद के लिए सख्त प्रशासनिक नियमों में ढील दी जाए और सूखा आपातकाल घोषित कर राहत उपाय शुरू किए जाएं।














