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आंदोलन तो कई दलों ने किया, फिर कार्रवाई सिर्फ एक समुदाय पर क्यों?' पुलिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट के तीखे सवाल

बॉम्बे हाईकोर्ट ने SDPI पदाधिकारियों के तड़ीपार आदेश को रद्द करते हुए मुंबई पुलिस से सवाल किया कि प्रदर्शन में शामिल अन्य दलों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Wed, 29 Jul 2026 10:29:28

आंदोलन तो कई दलों ने किया, फिर कार्रवाई सिर्फ एक समुदाय पर क्यों?' पुलिस पर बॉम्बे हाईकोर्ट के तीखे सवाल

मुंबई: मुंबई पुलिस द्वारा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के दो पदाधिकारियों के खिलाफ जारी तड़ीपार (एक्सटर्नमेंट) आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट ने रद्द करते हुए उसे "पूरी तरह गैर-कानूनी" और "अत्यधिक कठोर" करार दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए और पूछा कि जब उसी प्रदर्शन में अन्य राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता भी शामिल थे, तो कार्रवाई केवल याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ही क्यों की गई। अदालत ने यह भी जानना चाहा कि क्या यह कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि वे एक विशेष धर्म से जुड़े हुए हैं।

अदालत ने पुलिस की कार्रवाई पर जताई नाराजगी

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला जस्टिस माधव जे. जामदार की एकल पीठ के समक्ष आया। याचिकाकर्ता फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी को मुंबई पुलिस ने 3 दिसंबर 2025 को एक वर्ष के लिए तड़ीपार करने का आदेश जारी किया था। दोनों ने इस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में उपलब्ध एफआईआर देखने पर केवल नारेबाजी का उल्लेख मिलता है। कहीं भी यह नहीं बताया गया कि किसी व्यक्ति पर हमला हुआ, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया या कानून-व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हुई। अदालत ने कहा कि सिर्फ बिना अनुमति प्रदर्शन करने के आधार पर किसी नागरिक को तड़ीपार करना उचित नहीं माना जा सकता।

'क्या दूसरे दलों के खिलाफ भी हुई ऐसी कार्रवाई?'

सुनवाई के दौरान जस्टिस जामदार ने पुलिस से सीधे सवाल किए कि जिस प्रदर्शन में कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे), एनसीपी और स्थानीय नागरिक भी मौजूद थे, क्या उनके खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की गई? अदालत ने टिप्पणी की कि यदि एक ही कार्यक्रम में कई संगठन शामिल थे, तो केवल चुनिंदा लोगों को निशाना बनाना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने यह भी पूछा कि क्या कार्रवाई का आधार वास्तव में कानून था या फिर याचिकाकर्ताओं की धार्मिक पहचान। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में समानता और निष्पक्षता का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए।

पुलिस ने PFI से संबंधों का दिया हवाला

मुंबई पुलिस की ओर से पेश सरकारी वकील शिशिर हिरे ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं के प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) से कथित संबंध रहे हैं, इसलिए प्रशासन ने एहतियातन कार्रवाई की। हालांकि याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता इब्राहिम हरबत ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया।

इस पर अदालत ने पुलिस की दलीलों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस में कहीं भी PFI से कथित संबंधों का उल्लेख नहीं किया गया था। ऐसे में बाद में इस आधार को जोड़कर कार्रवाई को सही ठहराना उचित नहीं माना जा सकता।

सरकारी पक्ष ने यह भी कहा कि प्रशासन ने धर्म के आधार पर कार्रवाई नहीं की, बल्कि यदि किसी ने धार्मिक भावनाओं के नाम पर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की हो तो उस पर कार्रवाई होना स्वाभाविक है। पुलिस की ओर से यह भी दलील दी गई कि PFI पर प्रतिबंध के बाद कुछ नए संगठन सामने आए हैं, जिनकी कार्यप्रणाली पर प्रशासन की नजर है।

बाबरी मस्जिद प्रदर्शन को लेकर भी उठे सवाल

पुलिस ने तड़ीपार आदेश के समर्थन में वक्फ संशोधन विधेयक, चेंबूर-गोवंडी क्षेत्र के सीमेंट गोदामों से जुड़े विरोध प्रदर्शन और बाबरी मस्जिद मुद्दे पर दर्ज तीन एफआईआर का हवाला दिया। अदालत ने विशेष रूप से बाबरी मस्जिद से जुड़े मामले पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि कोई व्यक्ति यह राय रखता है कि मस्जिद का विध्वंस नहीं होना चाहिए था, तो इसे राष्ट्रविरोधी कैसे माना जा सकता है।

जस्टिस जामदार ने कहा कि किसी ऐतिहासिक घटना पर अलग विचार रखना हर नागरिक का अधिकार है। संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात रखने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। केवल किसी मत या विचार के आधार पर उसे राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता।

तड़ीपार आदेश को बताया मौलिक अधिकारों के विपरीत

सुनवाई के अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि तड़ीपार जैसी कार्रवाई बेहद असाधारण परिस्थिति में ही की जानी चाहिए, क्योंकि इससे किसी नागरिक की आवाजाही और स्वतंत्र जीवन जीने के मौलिक अधिकार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अदालत ने माना कि इस मामले में पुलिस पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी और कार्रवाई कानून के अनुरूप नहीं थी।

इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई पुलिस द्वारा जारी तड़ीपार आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल निष्पक्ष, संतुलित और कानूनी सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।

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