कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान जिंदा लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाकर उनके नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कथित कोशिश का मामला सामने आया है। विजयपुरा में इस मामले को लेकर भाजपा से निष्कासित विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल समेत तीन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। शिकायतकर्ता अब्दुल रजाक बागवान का आरोप है कि उनके अलावा कम से कम सात अन्य जीवित लोगों को भी दस्तावेजों में मृत दर्शाया गया, ताकि मतदाता सूची से उनके नाम हटाए जा सकें।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब कर्नाटक में मतदाता सूची से वास्तविक मतदाताओं के नाम कथित तौर पर हटाने की कोशिशों को लेकर कई शिकायतें और आपराधिक मामले दर्ज किए जा चुके हैं। विजयपुरा का प्रकरण भी इसी तरह के विवादों से जुड़ा है।
सब्जी विक्रेता को सरकारी रिकॉर्ड में मृत दिखाने का आरोप
विजयपुरा में सब्जी बेचने वाले अब्दुल रजाक बागवान को तब इस मामले की जानकारी मिली, जब उन्हें पता चला कि सरकारी दस्तावेजों में उन्हें मृत दिखाया गया है। आरोप है कि मतदाता सूची से उनका नाम हटाने के लिए उनके नाम से संबंधित मृत्यु प्रमाणपत्र का इस्तेमाल किया गया था। बागवान ने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया कि उनके अलावा कम से कम सात अन्य लोगों के साथ भी ऐसा ही हुआ। शिकायत के आधार पर पुलिस ने बसनगौड़ा पाटिल यतनाल और दो अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। आरोप है कि संबंधित दस्तावेजों के माध्यम से कुल आठ मतदाताओं को मृत बताकर उनके नाम मतदाता सूची से हटाने की आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं।
जांच में आठ लोग सामने आए, तीन महिलाओं ने दिखाए दस्तावेज
पुलिस के मुताबिक, जांच के दौरान आठ ऐसे लोग सामने आए, जिनके नाम मृत्यु प्रमाणपत्रों से जोड़े गए थे, जबकि वे जीवित हैं। इन लोगों में शिकायतकर्ता अब्दुल रजाक बागवान भी शामिल हैं। बुधवार को तीन महिलाओं ने सार्वजनिक रूप से अपने पहचान पत्र और उन मृत्यु प्रमाणपत्रों की प्रतियां दिखाईं, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर उन्हें मृत साबित करने के लिए किया गया था। महिलाओं ने इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि संबंधित मृत्यु प्रमाणपत्र सक्षम प्राधिकारी की ओर से जारी किए गए थे। हालांकि, प्रमाणपत्रों में दर्ज पहचान संबंधी अन्य जानकारियां उन जीवित मतदाताओं से मेल नहीं खाती थीं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाने के लिए आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। इस तरह दस्तावेजों में दर्ज विवरण और संबंधित लोगों की वास्तविक पहचान के बीच अंतर सामने आया है।
यतनाल ने 1,054 मतदाताओं के नामों पर दर्ज कराई थीं आपत्तियां
इस मामले में बसनगौड़ा पाटिल यतनाल की भूमिका को लेकर भी जांच की जा रही है। SIR प्रक्रिया के दौरान उन्होंने 1,054 मतदाताओं की सूची अधिकारियों के समक्ष जमा की थी। इन लोगों के नाम मतदाता सूची में बने रहने पर आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं और उनके समर्थन में दस्तावेज भी लगाए गए थे। आरोप है कि इस सूची में कम से कम आठ ऐसे मतदाता शामिल थे, जिन्हें दस्तावेजों में मृत बताया गया, जबकि वे जीवित हैं। यतनाल ने कथित तौर पर 31 अगस्त को अधिकारियों के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं। यह तारीख मसौदा मतदाता सूची प्रकाशित होने के लगभग एक सप्ताह बाद की बताई गई है। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों का सत्यापन किया गया।
इस मामले में विजयपुरा में करीब 30 वर्षों से रह रहीं रजिया शेख ने भी कहा कि उनके नाम पर मृत्यु प्रमाणपत्र जमा किया गया था। उन्होंने आशंका जताई कि सरकारी रिकॉर्ड में मृत दर्ज होने से उनका राशन कार्ड और सरकार की ओर से मिलने वाली दूसरी सुविधाएं प्रभावित हो सकती हैं।
मार्च 2025 में भाजपा ने यतनाल को छह साल के लिए किया था निष्कासित
बसनगौड़ा पाटिल यतनाल कर्नाटक के पूर्व मंत्री रह चुके हैं। उन्हें मार्च 2025 में अनुशासनहीनता के आरोपों के चलते भाजपा से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया था। वह पार्टी नेतृत्व के मुखर आलोचक भी रहे हैं और वर्तमान में निर्दलीय विधायक हैं। इस मामले में यतनाल का पक्ष जानने के लिए उनसे कई बार संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। पुलिस ने उनके और दो अन्य लोगों के खिलाफ शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया है। FIR दर्ज होने और लगाए गए आरोपों के आधार पर ही उनकी जिम्मेदारी को अंतिम रूप से स्थापित नहीं माना जा सकता; मामले की जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।
कर्नाटक में फॉर्म 7 के इस्तेमाल को लेकर भी विवाद
विजयपुरा का मामला कर्नाटक में मतदाता सूची से वास्तविक मतदाताओं के नाम हटाने की कथित कोशिशों से जुड़े मामलों की व्यापक श्रृंखला का हिस्सा है। इन मामलों में बड़ी संख्या में फॉर्म 7 आवेदन जमा करने, मतदाताओं की जानकारी उनकी अनुमति के बिना इस्तेमाल करने और हस्ताक्षरों में कथित जालसाजी जैसे आरोप शामिल हैं।
भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) ने इसी महीने कर्नाटक के चुनाव अधिकारियों को फर्जी फॉर्म 7 आवेदनों की जांच करने और जरूरत पड़ने पर कानूनी कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने के लिए की गई आपत्तियों की सत्यता और उनके साथ जमा दस्तावेजों की जांच इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस तरह के आठ अन्य मामलों में भी FIR दर्ज की गई थी। इन मामलों का संबंध भालकी, बेलगावी नॉर्थ, बल्लारी, मैसूरु और बेंगलुरु से बताया गया है। आरोपों में बड़ी संख्या में फॉर्म 7 आवेदन जमा करना, संबंधित मतदाताओं की जानकारी उनकी जानकारी के बिना इस्तेमाल करना और हस्ताक्षर जाली होने जैसे मामले शामिल हैं।
इन आठ अन्य FIR के विवरण में किसी भी मामले की शुरुआत निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) की शिकायत से नहीं हुई थी। इससे पुलिस की आपराधिक जांच और चुनाव अधिकारियों की ओर से की जाने वाली कार्रवाई के बीच अंतर का मुद्दा भी सामने आया है। हालांकि, हर फॉर्म 7 विवाद में FIR दर्ज कराने के लिए निर्वाचन आयोग या ERO की शिकायत अनिवार्य नहीं है। पुलिस अन्य कथित आपराधिक अपराधों की स्वतंत्र रूप से भी जांच कर सकती है।
गलत घोषणा करने पर एक साल तक की सजा का प्रावधान
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने या सुधार की प्रक्रिया के दौरान जानबूझकर गलत बयान या घोषणा करना दंडनीय अपराध है। ऐसे अपराध के लिए एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांक खड़गे ने भी चेतावनी दी है कि फॉर्म 7 के माध्यम से निर्वाचन आयोग को गलत जानकारी देने वालों को एक साल तक की जेल हो सकती है। उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा कार्यकर्ताओं ने कुछ लोगों को मृत बताकर फॉर्म 7 आवेदन जमा किए।
विजयपुरा में दर्ज FIR और राज्य के अन्य मामलों के बीच समानता यह है कि आरोप मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया तथा उसके लिए जमा किए गए दस्तावेजों से जुड़े हैं। इन मामलों में संबंधित दस्तावेजों की सत्यता, मतदाताओं की पहचान और आपत्तियां दर्ज कराने की परिस्थितियों की जांच महत्वपूर्ण है।














