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पहले समर्थन, अब नसीहत! Gen-Z को लेकर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बदला अंदाज, आखिर क्यों कही ये बात?

RSS प्रमुख मोहन भागवत ने Gen-Z की सोच, लिव-इन रिलेशनशिप, LGBTQ समुदाय और मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल पर अपनी राय रखी। जानें उनके बयान की बड़ी बातें।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Mon, 27 Jul 2026 9:33:17

पहले समर्थन, अब नसीहत! Gen-Z को लेकर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बदला अंदाज, आखिर क्यों कही ये बात?

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक बार फिर युवा पीढ़ी यानी Gen-Z को लेकर अपनी राय जाहिर की है। हालांकि इस बार उनका संदेश पहले से अलग नजर आया। कुछ समय पहले उन्होंने सरकार को सलाह दी थी कि युवाओं के साथ संवाद और सहमति का रास्ता अपनाया जाना चाहिए, लेकिन अब उन्होंने Gen-Z की सोच और व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी कई बार बिना गहराई से विचार किए दूसरों की देखा-देखी फैसले लेने लगती है। उनके मुताबिक, भावनाओं में बहकर निर्णय लेना किसी भी समाज के लिए सही नहीं माना जा सकता।

Gen-Z को लेकर क्या बोले मोहन भागवत?

रविवार को आयोजित एक कार्यक्रम में मोहन भागवत ने कहा कि Gen-Z पीढ़ी अक्सर जिस बात को तुरंत सही मान लेती है, उसी दिशा में आकर्षित हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस आयु वर्ग के लोग कई बार किसी विषय पर शांत मन से विचार करने के बजाय भावनात्मक प्रतिक्रिया दे देते हैं और दूसरे लोगों को देखकर उसी राह पर चलने लगते हैं। गौरतलब है कि Gen-Z में सामान्यतः वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मे युवाओं को शामिल किया जाता है।

दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े आंदोलन के दौरान भागवत ने सरकार को यह सुझाव दिया था कि शासन और प्रशासन में आदेश देने की बजाय संवाद, चर्चा और आपसी सहमति की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अब उनके हालिया बयान को उसी संदर्भ में नए नजरिए से देखा जा रहा है।

विवाह संस्था और लिव-इन रिलेशनशिप पर भी रखी राय

अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने विवाह संस्था को भारतीय समाज का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि विवाह केवल दो व्यक्तियों का साथ नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और संस्कारों से जुड़ा सामाजिक अनुशासन है। उन्होंने कहा कि इसके विपरीत लिव-इन रिलेशनशिप में अक्सर स्थायित्व और जिम्मेदारी का अभाव देखने को मिलता है।

उन्होंने कहा कि आज कई लोग केवल व्यक्तिगत खुशी को प्राथमिकता देते हैं। जब तक संबंध अच्छा लगता है, साथ रहते हैं और मन बदलने पर अलग हो जाते हैं। भागवत के अनुसार, यदि जिम्मेदारियों से बचने की यह प्रवृत्ति बढ़ती है तो इसके सामाजिक प्रभाव भी सामने आएंगे, जिनके उदाहरण दुनिया के कई देशों में देखे जा सकते हैं।

आधुनिकता जरूरी, लेकिन अंधानुकरण नहीं

RSS प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि समय के साथ बदलाव को स्वीकार करना भारतीय परंपरा का हिस्सा है और आधुनिकता का स्वागत किया जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने कहा कि किसी भी नई जीवनशैली या विचारधारा को अपनाने से पहले उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।

उन्होंने संकेत दिया कि पश्चिमी जीवनशैली का बिना सोचे-समझे अनुसरण करना उचित नहीं है। उनका कहना था कि आधुनिक सोच और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखना समय की आवश्यकता है।

LGBTQ समुदाय पर भी दिया संदेश


अपने संबोधन में मोहन भागवत ने LGBTQ समुदाय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान होना चाहिए और किसी भी समुदाय को हीन भावना से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, समाज में सभी को समान गरिमा और सम्मान मिलना चाहिए तथा किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए।

मोबाइल के बढ़ते इस्तेमाल पर जताई चिंता


नई पीढ़ी की जीवनशैली पर बात करते हुए भागवत ने परिवारों में बढ़ते मोबाइल उपयोग को भी चिंता का विषय बताया। उन्होंने कहा कि बच्चों को केवल उपदेश देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि माता-पिता को स्वयं भी अनुशासित व्यवहार अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि यदि बड़े चाहते हैं कि बच्चे मोबाइल का सीमित और जिम्मेदारी से उपयोग करें, तो उन्हें भी अपने व्यवहार से उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। साथ ही उन्होंने परिवार के सदस्यों के बीच नियमित संवाद को बेहद जरूरी बताया, ताकि बच्चों के सवालों का समाधान घर के भीतर ही हो सके और आपसी समझ मजबूत बने।

बदलाव की शुरुआत खुद से करने की सलाह

मोहन भागवत ने अपने संबोधन के अंत में कहा कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए केवल सरकार से अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे अपने घर और परिवार से बदलाव की शुरुआत करें।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर जरूरत से ज्यादा समय बिताने से बचना चाहिए और मोबाइल के इस्तेमाल में आत्मअनुशासन विकसित करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अक्सर माता-पिता बच्चों को मोबाइल से दूर रहने की सलाह देते हैं, लेकिन स्वयं लंबे समय तक फोन में व्यस्त रहते हैं। कई बार तो बच्चा रोने लगता है तो उसे शांत कराने के लिए मोबाइल थमा दिया जाता है। भागवत के अनुसार, यदि परिवार खुद अपने व्यवहार में बदलाव लाएगा, तभी समाज में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन संभव हो सकेगा।

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