चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों के चुनाव नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस समेत कई राजनीतिक दलों के सामने नए सवाल खड़े किए हैं। BJP ने सबसे ज्यादा 13 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि सहयोगी दलों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की कुल सीटें 16 रहीं। इसके बावजूद वाराणसी और नागपुर जैसे अहम क्षेत्रों में मिले नतीजों ने भाजपा के लिए राजनीतिक चर्चा का नया मुद्दा खड़ा कर दिया। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) ने पांच सीटें जीतीं, जबकि महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस ने जीत दर्ज की।
इन चुनावों में उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की शिक्षक तथा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटों पर मतदान हुआ था। नतीजों की अहमियत इसलिए भी रही कि इनसे अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दलों की स्थिति, स्थानीय मतदाताओं के रुझान और गठबंधन के प्रदर्शन की तस्वीर सामने आई। हालांकि, विधान परिषद के इन चुनावों को विधानसभा चुनाव के नतीजों का सीधा संकेत मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि दोनों चुनावों के मतदाता वर्ग और चुनावी परिस्थितियां अलग हैं।
BJP की 13 सीटों के बावजूद वाराणसी और नागपुर की चर्चा क्यों?
BJP ने कुल 28 सीटों में से 13 पर जीत हासिल की, लेकिन वाराणसी में उसकी हार विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से लोकसभा सांसद हैं। यहां विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक, दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की। ऐसे में विपक्ष ने वाराणसी के नतीजों को भाजपा के लिए राजनीतिक झटके के तौर पर पेश किया।
महाराष्ट्र में नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम भी चर्चा में रहा। नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह जिला है। यहां कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले और निर्दलीय प्रत्याशी नितेश कराले को हराया। इस जीत को कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अपने राजनीतिक संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया।
हालांकि, कुल सीटों के आंकड़े में भाजपा सबसे आगे रही। इसलिए चुनाव का आकलन केवल वाराणसी और नागपुर के नतीजों से नहीं, बल्कि चारों राज्यों के पूरे परिणाम और सहयोगी दलों के प्रदर्शन को ध्यान में रखकर करना होगा।
कांग्रेस का तंज: अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी पर भी ध्यान दें मोदी
कांग्रेस ने एक सीट जीतने के बावजूद भाजपा पर निशाना साधा। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि उन्हें दूसरों को उपदेश देने के बजाय आत्मविश्लेषण करना चाहिए। उन्होंने वाराणसी की दोनों सीटों पर भाजपा की हार और RSS के गढ़ नागपुर में कांग्रेस की जीत का उल्लेख किया।
जयराम रमेश ने महंगाई, बेरोजगारी और निजी निवेश में ठहराव जैसे मुद्दों को भी उठाया। उन्होंने कहा कि करोड़ों परिवार महंगाई से परेशान हैं, युवा बेरोजगार हैं और निजी निवेश ठप पड़ा है। उनके मुताबिक, प्रधानमंत्री को इन मुद्दों पर विचार करना चाहिए और अहंकार छोड़ना चाहिए।
कांग्रेस नेता ने वाराणसी और नागपुर के अलावा लखनऊ, प्रयागराज और पटना का जिक्र करते हुए दावा किया कि इन क्षेत्रों के नतीजे सरकार की नीतियों के प्रति अविश्वास का संकेत हैं। यह कांग्रेस की राजनीतिक व्याख्या थी; विधान परिषद चुनावों के नतीजे अपने आप में सभी मतदाताओं की राय या विधानसभा चुनाव का परिणाम तय नहीं करते।
पीएम मोदी ने कांग्रेस की सीटों पर उठाया सवाल
इन नतीजों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर कांग्रेस पर कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि चार बड़े राज्यों की 28 सीटों पर बैलेट पेपर से चुनाव हुए हैं और लोगों से पूछा कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं। भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं ने भी इसी तरह की पोस्ट साझा कीं।
कांग्रेस ने इस तंज के जवाब में वाराणसी और नागपुर के परिणामों को सामने रखा। इस तरह चुनावी चर्चा केवल कुल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन निर्वाचन क्षेत्रों पर भी केंद्रित हो गई जहां भाजपा को हार का सामना करना पड़ा या विपक्षी दलों ने जीत दर्ज की।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने भी नतीजों पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि बैलेट पेपर से हुए चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा को हार मिली और वाराणसी में भी, जहां से नरेंद्र मोदी सांसद हैं, पार्टी हार गई। उन्होंने लखनऊ का भी उल्लेख करते हुए भाजपा से हार स्वीकार करने की बात कही। उनके बयान में महाराष्ट्र के स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में भाजपा के प्रदर्शन को लेकर भी दावा किया गया।
उत्तर प्रदेश में BJP और सपा के बीच कैसा रहा मुकाबला?
उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों पर भाजपा ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटें जीतीं। विधानसभा चुनाव से पहले इन नतीजों को राजनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है, लेकिन इनका असर समझने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों और मतदाताओं की प्रकृति को ध्यान में रखना जरूरी है।
भाजपा ने लखनऊ शिक्षक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक, मेरठ स्नातक, आगरा स्नातक, गोरखपुर शिक्षक और मेरठ शिक्षक सीटों पर जीत दर्ज की। दूसरी ओर, सपा ने इलाहाबाद-झांसी स्नातक, वाराणसी स्नातक, लखनऊ स्नातक, आगरा शिक्षक और वाराणसी शिक्षक सीटें अपने नाम कीं। वाराणसी की दोनों सीटों पर सपा की जीत ने खास तौर पर ध्यान खींचा। इसके अलावा लखनऊ स्नातक और आगरा शिक्षक सीट पर भी सपा को सफलता मिली। इस तरह भाजपा ने राज्य में छह सीटों के साथ अपना स्थान बनाए रखा, जबकि सपा पांच सीटें जीतकर विपक्ष के रूप में अपनी मौजूदगी मजबूत करती दिखी।
बिहार में BJP को तीन सीटें, JDU को भी लगा झटका
बिहार की आठ विधान परिषद सीटों के नतीजों में भाजपा ने तीन सीटें जीतीं। पार्टी ने कोसी स्नातक, तिरहुत शिक्षक और दरभंगा स्नातक सीट पर जीत हासिल की। पटना स्नातक सीट पर जनता दल यूनाइटेड (JDU) के नीरज कुमार विजयी रहे।
हालांकि, भाजपा को पटना शिक्षक सीट पर हार का सामना करना पड़ा। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के डॉ. संजीव सिंह ने यह सीट जीती। स्रोत में इस सीट पर भाजपा के नवल किशोर यादव के लंबे समय से प्रतिनिधित्व का उल्लेख है; इस हार को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण झटका माना गया। बिहार में JDU ने चार सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन तीन पर उसे हार मिली। पार्टी को केवल पटना स्नातक सीट पर जीत हासिल हुई। वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर विधान परिषद में अपना खाता खोला। सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार विजयी रहे।
इन नतीजों से स्पष्ट हुआ कि बिहार में किसी एक दल का सभी सीटों पर दबदबा नहीं रहा। भाजपा ने तीन सीटें जीतीं, लेकिन JDU के कमजोर प्रदर्शन और अन्य दलों तथा निर्दलीय उम्मीदवारों की सफलता ने राज्य के परिणामों को बहुकोणीय बना दिया।
महाराष्ट्र में महायुति को दो सीटें, नागपुर में कांग्रेस की जीत
महाराष्ट्र विधान परिषद की पांच सीटों पर सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को दो सीटें मिलीं। भाजपा और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने एक-एक सीट जीती। दूसरी तरफ, शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) ने पुणे स्नातक और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की। नागपुर स्नातक सीट कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीती।
नागपुर का नतीजा भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से खास रहा। यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय होने के कारण भी चर्चा में रहता है। साथ ही, यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह जिला है। कांग्रेस की जीत ने विपक्ष को भाजपा के खिलाफ सवाल उठाने का अवसर दिया।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अजित पवार गुट को भी चुनाव में झटका लगा। पार्टी नेता सुनील तटकरे ने हार स्वीकार करते हुए कहा कि उन्हें यह समझने के लिए आत्ममंथन करना होगा कि कहां चूक हुई और आगे क्या सुधार किया जा सकता है। उन्होंने सतीश चव्हाण का उल्लेख किया, जो लगातार तीन कार्यकाल यानी 18 साल तक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व करते रहे थे। तटकरे ने सवाल उठाया कि इतने लंबे प्रतिनिधित्व के बावजूद उन्हें हार क्यों मिली।
वहीं, NCP (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले ने पुणे, नागपुर और मराठवाड़ा की स्नातक सीटों पर विपक्षी महाविकास आघाड़ी के प्रदर्शन पर खुशी जताई। उन्होंने मतदाताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि गठबंधन के नेतृत्व और विचारों पर जताया गया भरोसा उसके लिए महत्वपूर्ण है।
भाजपा ने अपने प्रदर्शन पर सहयोगी शिवसेना की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। भाजपा प्रवक्ता नवनाथ बन ने आरोप लगाया कि पुणे और नागपुर में शिक्षक तथा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव में सहयोगी दल होने के बावजूद शिवसेना ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया। यह भाजपा की ओर से गठबंधन के भीतर समन्वय को लेकर उठाया गया सवाल था।
कर्नाटक में कांग्रेस को चारों सीटों पर हार
कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस को विधान परिषद की चारों सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। भाजपा ने उत्तर-पूर्व शिक्षक, दक्षिण-पूर्व स्नातक और पश्चिम स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल की, जबकि गठबंधन सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) यानी JDS ने बेंगलुरु शिक्षक सीट अपने नाम की।
बेंगलुरु शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में JDS उम्मीदवार ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी को हराया। इस परिणाम के साथ भाजपा और JDS गठबंधन ने राज्य की सभी चार सीटें जीत लीं। कांग्रेस के लिए यह नतीजा इसलिए अहम रहा, क्योंकि राज्य में उसकी सरकार है और पार्टी चारों सीटों पर जीत हासिल नहीं कर सकी।
हालांकि, विधान परिषद चुनाव के इन नतीजों से कांग्रेस सरकार की स्थिरता पर सीधे तौर पर कोई असर नहीं पड़ता। फिर भी भाजपा और JDS के संयुक्त प्रदर्शन को विपक्षी तालमेल के नजरिए से देखा जा रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के गृह क्षेत्र में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा।
28 सीटों का पूरा हिसाब: BJP सबसे आगे, लेकिन विपक्ष को भी मिली जीत
चारों राज्यों के नतीजों में भाजपा 13 सीटों के साथ सबसे आगे रही। उसके सहयोगी दलों की सीटें जोड़ने पर NDA का आंकड़ा 16 पहुंचा। समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश में पांच सीटें जीतीं, जबकि महाराष्ट्र में NCP (शरदचंद्र पवार) को दो सीटें मिलीं। कांग्रेस को एक सीट पर जीत हासिल हुई।
पार्टी या गठबंधन का घटक - जीती गई सीटें
भाजपा (BJP)- 13
समाजवादी पार्टी (SP)- 5
NCP (शरदचंद्र पवार) -2
कांग्रेस- 1
जनता दल यूनाइटेड (JDU)- 1
जनता दल (सेक्युलर) (JDS)- 1
राष्ट्रीय जनता दल (RJD)- 1
जन सुराज पार्टी- 1
शिवसेना- 1
निर्दलीय उम्मीदवार -2
कुल 28
इन आंकड़ों से दो अलग तस्वीरें सामने आती हैं। एक तरफ भाजपा 13 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी रही और सहयोगियों के साथ NDA ने 28 में से 16 सीटें जीतीं। दूसरी तरफ, वाराणसी और नागपुर जैसे चर्चित क्षेत्रों में विपक्षी दलों की जीत ने भाजपा को राजनीतिक जवाब देने का अवसर दिया।
कांग्रेस के लिए एक सीट जीतना कुल आंकड़ों के लिहाज से सीमित सफलता रही, लेकिन नागपुर में जीत ने उसे भाजपा पर सवाल उठाने का मौका दिया। वहीं, उत्तर प्रदेश में सपा की पांच सीटें और वाराणसी की दोनों सीटों पर उसकी जीत राज्य की राजनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण रही। इसलिए इन नतीजों को केवल भाजपा की जीत या विपक्ष की सफलता के रूप में देखना अधूरा होगा। पूरे चुनाव में भाजपा सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बनी, जबकि कुछ अहम निर्वाचन क्षेत्रों में विपक्ष ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इन परिणामों से विधानसभा चुनाव का नतीजा तय नहीं होता, लेकिन अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक दलों के प्रदर्शन और उनके स्थानीय आधार को समझने के लिए उपयोगी संकेत जरूर मिलते हैं।














