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सावन में प्याज और दही खाने से क्यों परहेज किया जाता है? जानिए धार्मिक मान्यता, आयुर्वेद और वैज्ञानिक नजरिया

सावन में प्याज और दही से परहेज क्यों किया जाता है? जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं, आयुर्वेद की सलाह और वैज्ञानिक कारणों की पूरी जानकारी।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 16 Jul 2026 4:36:48

सावन में प्याज और दही खाने से क्यों परहेज किया जाता है? जानिए धार्मिक मान्यता, आयुर्वेद और वैज्ञानिक नजरिया

सावन का महीना हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे भगवान शिव की उपासना के लिए समर्पित किया जाता है। इस पूरे महीने श्रद्धालु व्रत, पूजा-पाठ, जलाभिषेक और सात्विक जीवनशैली अपनाने का प्रयास करते हैं। कई लोग इस दौरान खानपान में भी विशेष सावधानी बरतते हैं और प्याज, लहसुन जैसी चीजों के साथ-साथ दही का सेवन भी सीमित कर देते हैं या पूरी तरह छोड़ देते हैं।

हालांकि, अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर सावन में प्याज और दही खाने से परहेज क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे केवल धार्मिक मान्यता है या फिर आयुर्वेद और विज्ञान भी इसकी कोई वजह बताते हैं? आइए विस्तार से समझते हैं कि इस परंपरा के पीछे क्या कारण माने जाते हैं।

धार्मिक दृष्टि से क्यों नहीं खाते प्याज और दही?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु शरीर और मन दोनों की शुद्धता बनाए रखने के लिए सात्विक भोजन का सेवन करते हैं। मान्यता है कि प्याज और लहसुन तामसिक अथवा राजसिक प्रवृत्ति वाले खाद्य पदार्थ हैं, इसलिए व्रत और पूजा के दौरान इनसे दूरी बनाई जाती है, ताकि मन शांत रहे और साधना में एकाग्रता बनी रहे।

दूसरी ओर, सावन में भगवान शिव का अभिषेक दूध, दही, जल और अन्य पवित्र सामग्री से किया जाता है। कई श्रद्धालुओं का मानना है कि जिन वस्तुओं को भगवान को अर्पित किया जाता है, उनका स्वयं सेवन करने से बचना चाहिए। इसी कारण कुछ लोग इस महीने दही खाना भी छोड़ देते हैं।

दही से परहेज करने के पीछे वैज्ञानिक कारण

बरसात के मौसम में वातावरण में नमी अधिक होती है और तापमान में लगातार बदलाव होता रहता है। ऐसे मौसम में कुछ लोगों को दही खाने से गले में खराश, बलगम, सर्दी या पाचन संबंधी परेशानियां महसूस हो सकती हैं। हालांकि यह समस्या हर व्यक्ति में नहीं होती।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि दही पूरी तरह ताजा हो, सही तरीके से रखा गया हो और व्यक्ति को इससे कोई स्वास्थ्य संबंधी परेशानी न हो, तो सीमित मात्रा में इसका सेवन सामान्यतः सुरक्षित माना जाता है। इसलिए दही न खाने का निर्णय व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति और खानपान की आदतों पर भी निर्भर करता है।

सावन में प्याज न खाने को लेकर क्या कहता है विज्ञान?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो प्याज में ऐसा कोई तत्व नहीं पाया जाता जो केवल सावन के महीने में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो जाए। प्याज फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट्स, विटामिन और कई आवश्यक पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत माना जाता है। यदि प्याज ताजा, स्वच्छ और अच्छी गुणवत्ता का हो, तो सामान्य परिस्थितियों में इसका सेवन नुकसानदायक नहीं माना जाता।

यही वजह है कि विज्ञान प्याज से परहेज को स्वास्थ्य की बजाय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से अधिक जोड़कर देखता है।

परंपरा के पीछे छिपे हो सकते हैं व्यावहारिक कारण

पुराने समय में आज की तरह रेफ्रिजरेटर या आधुनिक भंडारण सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। बारिश के मौसम में अधिक नमी के कारण दूध, दही और अन्य जल्दी खराब होने वाले खाद्य पदार्थ अपेक्षाकृत कम समय में खराब हो जाते थे। ऐसे भोजन का सेवन करने से संक्रमण और पेट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता था।

संभव है कि इन्हीं व्यावहारिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए समय के साथ कुछ खानपान संबंधी परंपराएं विकसित हुई हों, जिन्हें बाद में धार्मिक मान्यताओं के साथ भी जोड़ दिया गया।

आयुर्वेद क्या कहता है?

आयुर्वेद के अनुसार वर्षा ऋतु में शरीर की पाचन शक्ति अपेक्षाकृत कमजोर हो जाती है। इस दौरान भारी, अधिक तैलीय या कठिनाई से पचने वाले खाद्य पदार्थ कुछ लोगों में अपच, गैस, एसिडिटी और पेट की अन्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं।

इसी वजह से आयुर्वेद इस मौसम में हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन करने की सलाह देता है। हालांकि किसी भी खाद्य पदार्थ का सेवन व्यक्ति की प्रकृति, स्वास्थ्य और पाचन क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए। यदि किसी को कोई विशेष स्वास्थ्य समस्या है, तो खानपान में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित रहेगा।

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