योग में कुछ आसन ऐसे होते हैं, जिनमें शरीर को मोड़ने के साथ-साथ संतुलन और एकाग्रता बनाए रखना भी जरूरी होता है। परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन ऐसा ही एक चुनौतीपूर्ण योगासन है। इसमें शरीर को एक ओर घुमाया जाता है और हाथों को एक विशेष बंध मुद्रा में रखने की कोशिश की जाती है। इस दौरान पैरों, जांघों, कमर और रीढ़ के आसपास के हिस्सों पर काम होता है। इस आसन का नाम संस्कृत के तीन शब्दों से मिलकर बना है। 'परिवृत्त' का अर्थ घूमना या मुड़ना, 'बद्ध' का अर्थ बंधा हुआ और 'पार्श्वकोण' का अर्थ बगल का कोण होता है। इसे पार्श्वकोणासन का अधिक चुनौतीपूर्ण रूप माना जाता है, क्योंकि इसमें शरीर को घुमाने के साथ हाथों की बंध मुद्रा और संतुलन पर भी ध्यान देना पड़ता है। परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन केवल शरीर को खींचने वाला अभ्यास नहीं है। इसे करते समय शरीर की स्थिति, सांस और एकाग्रता के बीच तालमेल बनाना पड़ता है। हालांकि, यह हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता और इसे अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए।
परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन करने के फायदे
1. रीढ़ और कमर के लचीलेपन के लिए उपयोगी
इस आसन की प्रमुख विशेषता शरीर को एक ओर घुमाने की मुद्रा है। इस दौरान रीढ़ के घुमाव पर काम होता है और पीठ व कमर के आसपास खिंचाव महसूस हो सकता है। सही तरीके से अभ्यास करने पर रीढ़ की गतिशीलता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। अगर आपकी कमर या पीठ में पहले से दर्द रहता है, तो इस आसन को जबरदस्ती करने से बचें। शरीर को जरूरत से ज्यादा घुमाने के बजाय अपनी सहजता के अनुसार ही मुद्रा बनाएं।
2. पैरों और जांघों की मांसपेशियों पर पड़ता है प्रभाव
परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन में पैरों को मजबूती से जमीन पर टिकाकर शरीर का संतुलन बनाए रखना पड़ता है। इस दौरान जांघों और पैरों की कई मांसपेशियां सक्रिय रहती हैं। आसन की स्थिति बनाए रखने के लिए शरीर के निचले हिस्से को स्थिर रखना जरूरी होता है। इस अभ्यास में क्वाड्रिसेप्स यानी जांघों के सामने की मांसपेशियों के साथ हैमस्ट्रिंग यानी जांघों के पीछे की मांसपेशियों पर भी खिंचाव पड़ सकता है। घुटनों और टखनों की स्थिति पर ध्यान देना भी जरूरी है, ताकि शरीर पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
3. शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद
इस योगासन में पैरों की स्थिति, शरीर का घुमाव और हाथों की बंध मुद्रा एक साथ संभालनी पड़ती है। यही वजह है कि इसे करते समय संतुलन बनाए रखने पर विशेष ध्यान देना होता है। नियमित और अपनी क्षमता के अनुरूप अभ्यास से शरीर की स्थिति के प्रति जागरूकता और संतुलन का अभ्यास बेहतर हो सकता है। शुरुआत में पूरी मुद्रा बनाना कठिन लग सकता है। ऐसे में शरीर को जबरदस्ती मोड़ने या हाथों को बांधने की कोशिश करने के बजाय पहले संतुलन और सहजता पर ध्यान देना बेहतर है।
4. छाती खोलने और सांस पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास
परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन में हाथों को बंध मुद्रा में रखने और शरीर को घुमाने की कोशिश की जाती है। इस दौरान छाती और कंधों की स्थिति पर ध्यान देना पड़ता है। सहज रूप से सांस लेते हुए मुद्रा बनाए रखने से सांस और शरीर की गतिविधियों के बीच तालमेल बनाने का अभ्यास किया जा सकता है। हालांकि, इस आसन से फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ने या सांस से जुड़ी किसी बीमारी का उपचार होने का निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। यदि सांस लेने में परेशानी होती है, तो अभ्यास रोक देना चाहिए।
5. एकाग्रता और मानसिक स्थिरता का अभ्यास
इस आसन को करते समय शरीर के कई हिस्सों की स्थिति पर एक साथ ध्यान देना पड़ता है। पैरों को स्थिर रखना, शरीर को नियंत्रित तरीके से घुमाना और सांस पर ध्यान बनाए रखना एकाग्रता की मांग करता है। योगाभ्यास के दौरान इस तरह ध्यान केंद्रित करना मानसिक सजगता विकसित करने में मदद कर सकता है। योग की परंपरा में इस आसन को मणिपुर चक्र से भी जोड़ा जाता है, जिसे इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास का प्रतीक माना जाता है। यह योग परंपरा से जुड़ी मान्यता है; इसे किसी निश्चित मानसिक या शारीरिक परिणाम की गारंटी नहीं समझना चाहिए।
परिवृत्त बद्ध पार्श्वकोणासन करते समय बरतें सावधानी यह एक चुनौतीपूर्ण आसन है, इसलिए इसे करते समय अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना जरूरी है। अगर घुटनों, कंधों, रीढ़ की हड्डी या गर्दन में हाल ही में चोट लगी है या इन हिस्सों में गंभीर दर्द है, तो इस आसन का अभ्यास न करें। शरीर को घुमाते समय या हाथों को बंध मुद्रा में लाते हुए दर्द महसूस हो, तो मुद्रा को जबरदस्ती बनाए न रखें। इस आसन में संतुलन और लचीलेपन की जरूरत होती है, इसलिए कठिन मुद्रा हासिल करने की जल्दबाजी करने के बजाय शरीर की सहजता को प्राथमिकता दें।














