पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में कुछ ही समय बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्धविराम (सीजफायर) को लेकर अहम वार्ता होने जा रही है। इस पूरी प्रक्रिया को पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक परीक्षा के रूप में देख रहा है। सुरक्षा कारणों से शहर में अभूतपूर्व सख्ती बरती गई है, कई इलाकों को हाई-सिक्योरिटी जोन में बदल दिया गया है और स्कूलों तक को बंद कर दिया गया है। पूरे इस्लामाबाद को एक अत्यंत सुरक्षित ज़ोन की तरह तब्दील कर दिया गया है। इसी बीच ईरान के प्रतिनिधि भी बातचीत के लिए वहां पहुंच चुके हैं, जिससे माहौल और अधिक संवेदनशील हो गया है। वार्ता से पहले ईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की तरफ से कुछ कड़े संकेत और शर्तें सामने आई हैं, जिनसे साफ झलकता है कि यह बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ सकती है।
मुज्तबा खामेनेई का रुख: युद्ध नहीं, लेकिन समझौता भी सीमितईरान के सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई ने बयान जारी करते हुए कहा है कि जनता की सड़कों पर मौजूदगी पहले की तरह जारी रहनी चाहिए और संघर्ष का मनोबल कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने राष्ट्रीय अधिकारों से किसी भी स्थिति में समझौता नहीं करेगा।
अपने संदेश में उन्होंने कहा कि हाल के संघर्षों में जनता ने जिस तरह मजबूती दिखाई है, वही असली जीत है। उन्होंने दक्षिणी पड़ोसी देशों को संबोधित करते हुए कहा कि वे एक बड़े बदलाव और “चमत्कार” को देख रहे हैं, जिसे सही ढंग से समझने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, गलत ताकतों और बाहरी दबावों से दूरी बनाकर ही सही रास्ता चुना जा सकता है।
मुज्तबा खामेनेई ने यह भी कहा कि जो देश ईरान के खिलाफ गतिविधियों में शामिल रहे हैं, उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने संकेत दिया कि हमलों और संघर्षों का जवाब बिना किसी देरी के दिया जाएगा और किसी भी तरह की छूट नहीं दी जाएगी।
उन्होंने आगे यह भी जोड़ा कि शहीदों और संघर्ष के दौरान हुए नुकसान का पूरा हिसाब लिया जाएगा और होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में काम किया जाएगा। उनका कहना था कि ईरान संघर्ष नहीं चाहता, लेकिन अपने अधिकारों से पीछे हटना भी स्वीकार नहीं करेगा।
संभावित समझौते की रूपरेखा: किन मुद्दों पर बन सकती है सहमतिरिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सहमति की संभावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि ईरान परमाणु हथियारों के निर्माण की दिशा में अपनी महत्वाकांक्षा को सीमित कर सकता है, हालांकि वह अपनी सैन्य क्षमता और मिसाइल कार्यक्रम पर किसी भी प्रकार का समझौता करने के लिए तैयार नहीं है।
इसके अलावा, ईरान अपने क्षेत्रीय प्रभाव जैसे लेबनान, हिज्बुल्लाह और हूती समूहों से जुड़े मुद्दों पर भी कोई बड़ा समझौता करने के पक्ष में नहीं दिख रहा है।
वहीं दूसरी ओर, अमेरिका की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य में आर्थिक और रणनीतिक भागीदारी की संभावना जताई जा रही है, जिसके तहत टैक्स या संचालन से जुड़े किसी मॉडल पर चर्चा हो सकती है। इसके बदले में ईरान अमेरिका से सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग रख सकता है।
साथ ही यह भी संभावना है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी या नियमित निरीक्षण की शर्त को स्वीकार कर सकता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहे।
हालांकि ये सभी अभी केवल संभावित अनुमान हैं। वास्तविक बातचीत किस दिशा में आगे बढ़ेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश किस तरह अपने-अपने हितों को संतुलित करते हैं, क्योंकि न अमेरिका और न ही ईरान इस समझौते में खुद को कमजोर पक्ष के रूप में दिखाना चाहता है।