पश्चिम बंगाल में मदरसों को लेकर प्रशासनिक स्तर पर बड़ी कवायद शुरू होने की खबर सामने आ रही है। सूत्रों के मुताबिक राज्य सरकार अवैध रूप से संचालित या निजी प्रबंधन के तहत चल रहे मदरसों की विस्तृत जांच कराने की तैयारी में है। इस प्रक्रिया के तहत उनकी फंडिंग, शैक्षणिक पाठ्यक्रम, शिक्षकों की योग्यता, प्रशासनिक ढांचे और अन्य गतिविधियों की पड़ताल की जा सकती है। दूसरी ओर, कई अल्पसंख्यक संगठनों ने इस पहल पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि विशेष समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि राज्य में संचालित विभिन्न प्रकार के मदरसों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से उनके संचालन से जुड़ी तमाम जानकारियां एकत्र की जा रही हैं। यदि जांच के दौरान किसी संस्थान में वित्तीय अनियमितता, नियमों का उल्लंघन या अन्य गंभीर गड़बड़ी सामने आती है, तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे संस्थानों को बंद करने का निर्णय भी लिया जा सकता है।
आधारभूत सुविधाओं और जमीन के रिकॉर्ड की भी होगी जांचसूत्रों के अनुसार केवल शैक्षणिक और वित्तीय पक्ष ही नहीं, बल्कि मदरसों के भौतिक ढांचे की भी समीक्षा की जाएगी। यह देखा जाएगा कि वहां शिक्षा के लिए आवश्यक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। साथ ही संस्थानों के भूमि संबंधी दस्तावेजों की भी जांच की जाएगी। यदि किसी मदरसे का संचालन अवैध कब्जे वाली जमीन पर पाया जाता है, तो प्रशासन उसके खिलाफ कठोर कदम उठा सकता है। ऐसे मामलों में भवन हटाने या ध्वस्तीकरण जैसी कार्रवाई भी संभव बताई जा रही है।
राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि पूर्व में इस प्रकार का व्यापक डाटा संकलन नहीं किया गया था। उनके अनुसार यह विषय संवेदनशील है, इसलिए फिलहाल सीमित जानकारी ही साझा की जा रही है। हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि किसी संस्थान के संचालन में गंभीर अनियमितता या संदिग्ध विदेशी फंडिंग के प्रमाण मिलते हैं, तो कार्रवाई करने में कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी।
जिला प्रशासन को सौंपी गई जिम्मेदारीजानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने 5 जून को ही सभी जिलाधिकारियों को ऐसे मदरसों से संबंधित जानकारी जुटाने के निर्देश जारी कर दिए थे। प्रशासन से कहा गया है कि वे निर्धारित प्रारूप में रिपोर्ट तैयार कर 5 जुलाई तक सरकार को सौंपें। माना जा रहा है कि रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तय की जाएगी।
सूत्र यह भी बता रहे हैं कि मदरसों की आर्थिक व्यवस्था और फंडिंग के स्रोतों की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि राज्य भर में बड़ी संख्या में ऐसे मदरसे हैं जिनकी स्थिति और संचालन व्यवस्था को लेकर प्रशासन जानकारी एकत्र कर रहा है। अनुमान है कि करीब 8,000 संस्थान इस समीक्षा प्रक्रिया के दायरे में आ सकते हैं।
मदरसों के आंकड़ों को लेकर लंबे समय से स्पष्ट तस्वीर नहींराज्य में मदरसों की कुल संख्या को लेकर कोई आधिकारिक और अद्यतन आंकड़ा लंबे समय से सार्वजनिक नहीं किया गया है। हालांकि कुछ अधिकारियों का दावा है कि वर्ष 2015 के आसपास पश्चिम बंगाल में लगभग 11 हजार मदरसे संचालित हो रहे थे। इस कारण वर्तमान समय में वास्तविक संख्या और उनकी स्थिति का पता लगाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
वर्ष 2014 में हुए खागरागढ़ विस्फोट मामले की जांच के दौरान भी कुछ प्रकार के मदरसों को लेकर सवाल उठे थे। उस समय राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अपनी जांच में कुछ संस्थानों के संबंध में चिंता जताई थी। एजेंसी का कहना था कि कुछ स्थानों पर कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रभाव की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी पृष्ठभूमि में अब सरकार विभिन्न प्रकार के मदरसों का वर्गीकरण और सत्यापन करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
सरकार से मान्यता प्राप्त और गैर-वित्तपोषित मदरसों की स्थितिराज्य में बड़ी संख्या में ऐसे मदरसे भी संचालित हैं जिन्हें सरकार से आर्थिक सहायता नहीं मिलती, लेकिन उनका पाठ्यक्रम सरकारी मानकों के अनुरूप स्वीकृत है। ऐसे संस्थानों का संचालन निजी स्तर पर होता है और कई बार उन्हें स्थानीय स्तर पर आर्थिक सहयोग भी प्राप्त होता है।
इसके अलावा सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे और पंजीकृत गैर-सहायता प्राप्त मदरसे भी हैं, जो पश्चिम बंगाल मदरसा शिक्षा बोर्ड के निर्धारित नियमों और पाठ्यक्रमों के अनुसार चलते हैं। इन संस्थानों में सामान्य शिक्षा के साथ-साथ अरबी भाषा, इस्लामी अध्ययन और धर्मशास्त्र से जुड़े विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है।
क्या होते हैं खारिजी मदरसे?खारिजी मदरसों को आम तौर पर ऐसे संस्थानों के रूप में देखा जाता है जो पारंपरिक धार्मिक शिक्षा पद्धति के आधार पर संचालित होते हैं और उनका सीधा संबंध राज्य के औपचारिक शिक्षा बोर्ड से नहीं होता। इनका संचालन प्रायः मस्जिद समितियों, वक्फ संस्थाओं या धार्मिक विद्वानों के नेटवर्क द्वारा किया जाता है।
इन संस्थानों का मुख्य उद्देश्य इस्लामी शिक्षा प्रदान करना और धार्मिक विद्वानों या मौलवियों को तैयार करना माना जाता है। वर्ष 2002 में तैयार एक विस्तृत रिपोर्ट में ऐसे मदरसों की पहचान और उनके पंजीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया था कि इन संस्थानों की गतिविधियों और संरचना का व्यवस्थित रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए।
मान्यता प्रक्रिया में सीमित संख्या में आए आवेदनतृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद राज्य में बड़ी संख्या में मदरसों को औपचारिक मान्यता देने की योजना बनाई गई थी। उस समय सरकार ने घोषणा की थी कि इच्छुक मदरसों को मान्यता प्राप्त करने के लिए आवेदन करना होगा और संचालन से जुड़ी पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी।
हालांकि इस प्रक्रिया में अपेक्षित संख्या में आवेदन नहीं आए। उपलब्ध जानकारी के अनुसार लगभग 10 हजार मदरसों को मान्यता देने की बात कही गई थी, लेकिन केवल करीब 1,400 संस्थानों ने आवेदन किया। इनमें से भी सीमित संख्या को ही औपचारिक स्वीकृति मिल सकी। बाद के वर्षों में चरणबद्ध तरीके से कुछ और मदरसों को मान्यता दी गई और 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले भी सैकड़ों संस्थानों को स्वीकृति प्रदान किए जाने की जानकारी सामने आई थी।
फिलहाल सरकार द्वारा मांगी गई नई रिपोर्ट के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है और प्रशासन किन संस्थानों पर कार्रवाई करने का फैसला लेता है। वहीं इस मुद्दे ने राज्य में शिक्षा, प्रशासन और राजनीति से जुड़ी नई बहस को भी जन्म दे दिया है।