क्या TMC में बढ़ रही है बगावत? 50 विधायकों के अलग होने की चर्चाओं ने बढ़ाई ममता बनर्जी की चिंता

पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस (TMC) को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति, नेताओं की नाराजगी और हाल ही में दो विधायकों के निष्कासन के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। इसी बीच ऐसी खबरें भी सामने आ रही हैं कि पार्टी के कुछ विधायक अलग राह चुन सकते हैं। हालांकि इन दावों की अब तक किसी भी स्तर पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के घटनाक्रमों ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरूनी हलचल को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना दिया है। पार्टी नेतृत्व लगातार स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन विरोधी दल इन घटनाओं को संगठन में बढ़ती असंतुष्टि का संकेत बता रहे हैं।

50 विधायकों के अलग होने की चर्चाओं ने बढ़ाई हलचल

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि लगभग 50 विधायक तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नया राजनीतिक समूह बना सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि यदि ऐसा होता है तो पार्टी के भीतर बड़ा विभाजन देखने को मिल सकता है।

हालांकि अभी तक किसी विधायक या वरिष्ठ नेता ने सार्वजनिक रूप से इन चर्चाओं की पुष्टि नहीं की है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में इन खबरों को केवल अटकलों के रूप में ही देखा जाना चाहिए, क्योंकि पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

दो विधायकों के निष्कासन के बाद विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों की संख्या घटकर 78 रह गई है। इसी के बाद से नई राजनीतिक संभावनाओं को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
क्या बन सकती है नई राजनीतिक इकाई?

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि हाल ही में निष्कासित किए गए विधायक रीताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा भविष्य में किसी नए राजनीतिक मंच का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि दोनों नेताओं या उनके समर्थकों की ओर से अभी तक इस दिशा में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।

इन चर्चाओं ने राज्य की राजनीति में उत्सुकता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन फिलहाल तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में पार्टी और संबंधित नेताओं के रुख से स्थिति और साफ हो सकती है।

महाराष्ट्र जैसी राजनीतिक स्थिति बनने की संभावना पर चर्चा

यदि भविष्य में बड़ी संख्या में विधायक अलग होकर कोई नया गुट बनाते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में महाराष्ट्र जैसे हालात बनने की चर्चा भी हो रही है। राजनीतिक जानकार इस संदर्भ में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के उदाहरण दे रहे हैं।

महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों के अलग होने के बाद शिवसेना में विभाजन हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ। इसी तरह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी विभाजन देखने को मिला था। हालांकि पश्चिम बंगाल में ऐसी किसी स्थिति की संभावना को लेकर फिलहाल केवल राजनीतिक अटकलें ही सामने हैं।

आखिर दो विधायकों के खिलाफ क्यों हुई कार्रवाई?

तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी किए गए पत्र के अनुसार, दोनों विधायकों पर पार्टी नेतृत्व के निर्देशों की अनदेखी करने और संगठन विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए गए हैं।

पत्र में कहा गया कि पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बावजूद दोनों नेता लगातार महत्वपूर्ण बैठकों से अनुपस्थित रहे और ऐसे कार्यों में शामिल पाए गए जो पार्टी के हितों के अनुरूप नहीं थे।

पार्टी नेतृत्व का मानना है कि उनके व्यवहार और सार्वजनिक बयानों से संगठन की छवि को नुकसान पहुंचा है। इसी आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें तत्काल प्रभाव से प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया।

चंद्रिमा भट्टाचार्य के हस्ताक्षर वाला पत्र हुआ चर्चा में

तृणमूल कांग्रेस की उपाध्यक्ष चंद्रिमा भट्टाचार्य द्वारा हस्ताक्षरित पत्र में कहा गया कि संबंधित विधायकों की गतिविधियों और बयानों की समीक्षा के बाद सक्षम प्राधिकारी ने निष्कासन का निर्णय लिया है।

पत्र में उल्लेख किया गया कि दोनों नेताओं के कुछ कदम पार्टी की नीतियों और हितों के विपरीत पाए गए। पर्याप्त विचार-विमर्श के बाद संगठन ने उन्हें पार्टी से बाहर करने का फैसला लिया।

शुभेंदु अधिकारी ने उठाया था मामला

पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने भी इन दोनों विधायकों का उल्लेख करते हुए कई आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि रीताब्रत बनर्जी और संदीपन साहा की शिकायतों के आधार पर विधानसभा सचिवालय ने एक मामले में कार्रवाई की थी।

शुभेंदु अधिकारी का दावा था कि विपक्ष के नेता के चयन से जुड़े दस्तावेजों और समर्थन पत्रों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे। उनके अनुसार, शिकायत में कहा गया था कि संबंधित बैठक में जिस प्रस्ताव का उल्लेख किया गया, वह औपचारिक रूप से पारित नहीं हुआ था।

उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ताओं ने कुछ हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए थे। इसी आधार पर मामला जांच एजेंसियों और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचा।

राजनीतिक घटनाक्रम पर बनी हुई है नजर

तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभर रहे इन घटनाक्रमों ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल पार्टी नेतृत्व किसी बड़े संकट से इनकार कर रहा है, जबकि विपक्ष इन घटनाओं को संगठन में बढ़ती असहमति का संकेत बता रहा है।

आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि मौजूदा चर्चाएं केवल राजनीतिक अटकलें साबित होती हैं या फिर राज्य की राजनीति में कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलता है। फिलहाल सभी की नजर तृणमूल कांग्रेस के अगले कदम और पार्टी के भीतर की गतिविधियों पर टिकी हुई है।