पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2026 विधानसभा चुनाव के बाद तेजी से बदलते घटनाक्रम एक बड़े सत्ता परिवर्तन की कहानी बयां कर रहे हैं। चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के साथ ही अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का वर्षों पुराना मजबूत प्रशासनिक और राजनीतिक नेटवर्क भी बिखरता नजर आ रहा है। जिन अधिकारियों, सलाहकारों और करीबी सहयोगियों को कभी ममता सरकार की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, वही अब एक-एक कर अपने पद छोड़ रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे ममता बनर्जी के “कोर सिस्टम” के टूटने के तौर पर देखा जा रहा है।
चुनाव नतीजों के बाद शुरू हुआ इस्तीफों का दौरचुनावी नतीजे सामने आने के तुरंत बाद इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया। मुख्यमंत्री की सलाहकार टीम में शामिल दो रिटायर्ड आईएएस अधिकारी — अलापन बंद्योपाध्याय और एच.के. द्विवेदी — ने 5 मई 2026 को अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। राज्य सचिवालय से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इन इस्तीफों के बाद प्रशासनिक स्तर पर नई नियुक्तियों और बदलावों की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। दोनों अधिकारी पहले पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव रह चुके हैं और लंबे समय तक ममता बनर्जी के बेहद भरोसेमंद प्रशासनिक चेहरों में शामिल रहे।
अलापन बंद्योपाध्याय का इस्तीफा सबसे ज्यादा चर्चा मेंसबसे ज्यादा चर्चा अलापन बंद्योपाध्याय के इस्तीफे को लेकर हो रही है। उन्हें ममता बनर्जी का सबसे करीबी और भरोसेमंद अधिकारी माना जाता था। साल 2021 में यास तूफान के दौरान केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच जो बड़ा विवाद हुआ था, उसमें ममता बनर्जी खुलकर अलापन के समर्थन में खड़ी हुई थीं। उस समय उनके ट्रांसफर को लेकर दिल्ली और कोलकाता के बीच तीखी राजनीतिक खींचतान देखने को मिली थी।
रिटायरमेंट के बाद भी ममता ने उन्हें अपने मुख्य सलाहकार की जिम्मेदारी सौंपी थी। ऐसे में अब उनका इस्तीफा सत्ता बदलने के बाद प्रशासनिक समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
अभिरूप सरकार ने नैतिकता का हवाला देकर छोड़ा पदइसी क्रम में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास निगम (WBIDC) के अध्यक्ष अभिरूप सरकार ने भी अपना पद छोड़ दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जब मुख्यमंत्री चुनाव हार चुकी हैं, तो उनके लिए इस पद पर बने रहना नैतिक रूप से उचित नहीं है।
अभिरूप सरकार को ममता सरकार की आर्थिक नीतियों का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था। उद्योग, निवेश और आर्थिक फैसलों में उनकी अहम भूमिका रही थी। उनके इस्तीफे के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि नई सरकार बंगाल की आर्थिक और औद्योगिक नीतियों में बड़े बदलाव कर सकती है।
कानूनी मोर्चे पर भी बड़ा झटका, किशोर दत्ता ने छोड़ा पदममता बनर्जी सरकार को कानूनी लड़ाइयों में मजबूती देने वाले एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने भी अपना इस्तीफा सौंप दिया है। उन्होंने राजभवन पहुंचकर पद छोड़ने की औपचारिक प्रक्रिया पूरी की। राज्य सरकार की ओर से कई बड़े और संवेदनशील मामलों में अदालत में पक्ष रखने की जिम्मेदारी उन्हीं के पास थी। शिक्षक भर्ती घोटाले, चुनावी हिंसा और अन्य हाई-प्रोफाइल मामलों में वे सरकार का प्रमुख कानूनी चेहरा माने जाते थे।
राजनीतिक बदलाव के बीच उनका इस्तीफा इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अब राज्य का कानूनी ढांचा भी नई दिशा में आगे बढ़ सकता है। सत्ता परिवर्तन के साथ सरकार का सबसे भरोसेमंद कानूनी रणनीतिकार अब इस पूरी व्यवस्था से अलग हो चुका है।
मीडिया और सलाहकार टीम भी हुई अलगममता बनर्जी के करीबी माने जाने वाले कई वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया सलाहकारों ने भी अपने पदों से दूरी बना ली है। इनमें कई ऐसे चेहरे शामिल हैं जिन्हें सरकार की ओर से विभिन्न अकादमियों, सांस्कृतिक संस्थानों और सरकारी निगमों में अहम जिम्मेदारियां दी गई थीं।
इन इस्तीफों के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी का वह मजबूत मीडिया और बौद्धिक नेटवर्क, जो लंबे समय से उनके पक्ष में माहौल तैयार करता था, अब कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक सरकार के समर्थन में सक्रिय रहने वाला यह पूरा इकोसिस्टम धीरे-धीरे बिखरता नजर आ रहा है।
हार के बाद भी आक्रामक रुख में ममता बनर्जीएक तरफ जहां उनके पुराने सहयोगी लगातार साथ छोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी अब भी अपने राजनीतिक रुख पर अडिग दिखाई दे रही हैं। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने चुनावी हार स्वीकार करने के बावजूद तत्काल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को लेकर कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है। बताया जा रहा है कि उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों और धांधली के आरोप भी उठाए हैं।
राज्य सचिवालय ‘नबन्ना’ में भी अब माहौल पूरी तरह बदल चुका है। प्रशासनिक हलकों में सन्नाटा और अनिश्चितता का माहौल बताया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि कई वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारी, जो पहले ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाते थे, अब नई सरकार के साथ तालमेल बैठाने की कोशिशों में जुट गए हैं।
नई सरकार के सामने अब नियुक्तियों की चुनौतीसूत्रों के अनुसार कई अधिकारी दिल्ली और भाजपा नेताओं से संपर्क साध रहे हैं ताकि बदलते राजनीतिक माहौल में अपनी भूमिका सुनिश्चित कर सकें। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा सरकार इन खाली हुए अहम पदों पर किन नए चेहरों को जिम्मेदारी देगी और प्रशासनिक ढांचे में कितने बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे।
साथ ही यह भी देखने वाली बात होगी कि क्या ममता बनर्जी अपने पुराने भरोसेमंद सहयोगियों के बिना राजनीतिक वापसी की नई रणनीति तैयार कर पाएंगी या नहीं।
बंगाल में 15 साल बाद बदली सत्तागौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए प्रचंड बहुमत हासिल किया है। 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस जीत के साथ ही राज्य में तृणमूल कांग्रेस का करीब 15 वर्षों से चला आ रहा शासन समाप्त हो गया और बंगाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो गई है।