पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता की ओर मजबूती से बढ़ती नजर आ रही है। दोपहर तक के चुनावी रुझानों में पार्टी 190 से अधिक सीटों पर आगे चल रही है, जबकि 15 साल से सत्ता संभाल रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का प्रदर्शन 100 सीटों से नीचे सिमटता दिखाई दे रहा है। हालांकि अंतिम नतीजों के लिए शाम या रात तक इंतजार करना होगा, लेकिन मौजूदा संकेत साफ बताते हैं कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ा उलटफेर हुआ है। 2021 में जहां भाजपा 77 सीटों तक पहुंच पाई थी, वहीं इस बार उसने सीधे ममता बनर्जी के मजबूत गढ़ में गहरी सेंध लगा दी है। इस अप्रत्याशित बढ़त के पीछे कई अहम वजहें मानी जा रही हैं।
1. हिंदू वोटों का एकजुट होना बना सबसे बड़ा फैक्टरपश्चिम बंगाल में लगभग 27 से 32 प्रतिशत मुस्लिम आबादी मानी जाती है, जिसके कारण लंबे समय से राजनीतिक समीकरण टीएमसी के पक्ष में झुके रहते थे। पिछले डेढ़ दशक में मुस्लिम वोट बैंक, महिलाओं और युवाओं के एक हिस्से के समर्थन ने ममता बनर्जी की स्थिति मजबूत बनाए रखी।
लेकिन इस बार तस्वीर बदलती दिखी। भाजपा ने हिंदू मतदाताओं को एकजुट करने में बड़ी सफलता हासिल की। घुसपैठ, सीमाई सुरक्षा, बांग्लादेशी प्रवासन और SIR जैसे मुद्दों को उठाकर पार्टी ने एक मजबूत नैरेटिव तैयार किया, जिसका असर वोटिंग पैटर्न पर साफ दिखा।
2. लंबी सत्ता के बाद एंटी-इंकम्बेंसी की लहर2011 से लगातार सत्ता में रहने के कारण टीएमसी को इस बार स्वाभाविक रूप से एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ा। 2016 और 2021 की जीत के बाद भी जमीनी स्तर पर असंतोष धीरे-धीरे बढ़ता गया था।
स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप, “कट मनी” संस्कृति, प्रशासनिक असंतुलन और नेताओं पर लगे गंभीर आरोपों ने जनता के बीच नाराजगी को और गहरा किया। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद उत्पन्न होने वाली यही थकान इस चुनाव में टीएमसी के खिलाफ बड़ी चुनौती बन गई।
3. मोदी-शाह फैक्टर और मजबूत चुनावी रणनीतिभाजपा की इस जीत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति ने निर्णायक भूमिका निभाई। पिछले एक दशक में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कई राज्यों में सत्ता हासिल की है, जिससे पार्टी का राष्ट्रीय प्रभाव लगातार बढ़ा है।
वहीं, अमित शाह ने बंगाल में लंबा प्रवास करते हुए जमीनी स्तर पर चुनावी रणनीति तैयार की। बूथ मैनेजमेंट से लेकर संगठनात्मक मजबूती तक, उनकी रणनीति का असर परिणामों में साफ दिखाई दिया। यह संयोजन भाजपा के लिए गेमचेंजर साबित हुआ।
4. विपक्ष की बिखरी हुई एकताइस चुनाव में विपक्षी दलों के बीच तालमेल की कमी भी भाजपा के पक्ष में गई। कांग्रेस ने मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उल्लेखनीय वोट हासिल किए, जिससे कई सीटों पर टीएमसी के वोटों का बंटवारा हो गया।
टीएमसी और कांग्रेस के बीच गठबंधन न होना भी बड़ा नुकसान साबित हुआ। राहुल गांधी द्वारा चुनावी रैलियों में टीएमसी पर किए गए हमलों ने विपक्षी वोट बैंक को और विभाजित किया। कई सीटों पर सीधा लाभ भाजपा को मिला क्योंकि विरोधी वोट एकजुट नहीं रह सके।
5. बदलाव की उम्मीद और नई राजनीतिक आकांक्षापश्चिम बंगाल में पिछले 70 वर्षों में सत्ता कांग्रेस, वामपंथ और टीएमसी के बीच घूमती रही है, लेकिन भाजपा कभी मुख्य सत्ता में नहीं रही। इसी वजह से इस बार जनता के एक बड़े हिस्से ने “नए विकल्प” के रूप में भाजपा को मौका दिया।
पार्टी ने महिलाओं, युवाओं और किसानों के लिए कई बड़े वादे किए—महिलाओं के लिए मासिक आर्थिक सहायता, युवाओं के लिए रोजगार और किसानों के लिए बढ़ी हुई आय जैसी घोषणाओं ने भी मतदाताओं को आकर्षित किया। इन वादों ने बदलाव की चाह रखने वाले वोटरों के बीच भाजपा के प्रति विश्वास को मजबूत किया, जिसका सीधा असर नतीजों में दिखा।