राजस्थान में शहरी निकाय, पंचायतीराज और छात्रसंघ चुनावों को लेकर सियासी गर्मी चरम पर है। विपक्ष चुनावों में देरी को लेकर सरकार पर हमलावर है, तो सत्तारूढ़ भाजपा भी पलटवार में जुटी है। छात्रनेता सड़कों पर उतर चुके हैं और जनता के बीच सवाल उठ रहा है कि लोकतंत्र के इन अहम स्तंभों के चुनाव आखिर कब होंगे। सरकार की योजना पंचायत और निकाय चुनाव एक साथ कराने की है, लेकिन पुनर्गठन और परिसीमन जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी के चलते पूरा शेड्यूल अधर में लटक गया है।
पंचायत चुनावों पर अनिश्चितता
राज्य सरकार ने पंचायत चुनावों के पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी, लेकिन 4 जून को प्रस्तावों के प्रकाशन की समयसीमा होते हुए भी ज़िलों से भेजे गए प्रस्तावों पर कई आपत्तियां आ गईं। जनप्रतिनिधियों ने जयपुर पहुंचकर इन आपत्तियों को लेकर विरोध दर्ज कराया। मामला हाईकोर्ट में पहुंच गया और कोर्ट ने सरकार को अंतिम प्रस्ताव पेश करने के निर्देश दिए। हालांकि, सरकार अभी तक प्रक्रिया को अंतिम रूप नहीं दे सकी है और अब कोर्ट ने 22 जुलाई की समयसीमा तय की है।
नगरीय निकाय चुनावों में सीमांकन बना सबसे बड़ी अड़चनशहरी निकाय चुनावों की राह भी आसान नहीं है। 100 से ज्यादा निकायों में वार्ड परिसीमन का काम तय समयसीमा 15 मई तक पूरा नहीं हो पाया है। सरकार अब जुलाई के अंत तक इस प्रक्रिया को पूरा कर अधिसूचना जारी करने की तैयारी में है। अगस्त से मतदाता सूची बनाने की योजना है।
चुनावों में सबसे बड़ी बाधा यह है कि नवंबर 2023 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर वार्डों का निर्धारण किया गया था, लेकिन कई स्थानों पर भौगोलिक परिस्थितियों (जैसे पहाड़, नदी, सड़क) के चलते जनसंख्या असंतुलन सामने आया। कई वार्डों में आबादी तय सीमा से 15–26% तक अधिक या कम है। इससे परिसीमन की प्रक्रिया जटिल हो गई है।
प्रशासक नियुक्त, पर चुनाव की ठोस तारीख नहींराज्य सरकार ने अब तक 111 नगरीय निकायों में प्रशासक नियुक्त कर दिए हैं। इनका कार्यकाल समाप्त हो चुका है, लेकिन चुनाव नहीं कराए गए। वहीं, दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में समाप्त होने वाले 140 निकायों में भी चुनाव साथ कराने की योजना है। इसमें बड़ी बाधा यह है कि 91 निकायों के बोर्ड जनवरी और फरवरी 2026 में ही खत्म होंगे, ऐसे में बोर्ड भंग किए बिना चुनाव कराने की योजना पर विचार हो रहा है।
छात्रसंघ चुनाव: एक बार फिर स्थगन की भेंटराजस्थान में छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगना कोई नई बात नहीं है। वर्ष 2003 के बाद अब तक 9 बार चुनावों पर रोक लग चुकी है। 2004 के बाद 5 साल तक चुनाव नहीं हुए थे। 2010 में दोबारा चुनाव शुरू हुए और 2018 तक नियमित रूप से होते रहे। फिर 2020 और 2021 में चुनाव नहीं हुए, लेकिन 2022 में कांग्रेस सरकार ने एक बार फिर चुनाव कराए। 2023 में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस सरकार ने छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी थी, जो अब तक भाजपा सरकार में भी जारी है।
अब छात्रों का गुस्सा सड़कों पर नजर आ रहा है। विभिन्न विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं और सरकार से चुनावों की बहाली की मांग कर रहे हैं।
सीएम स्तर पर चल रहा मंथनइन सभी चुनावों को लेकर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की निगरानी में उच्च स्तरीय बैठकें चल रही हैं। पंचायतों और नगरीय निकायों के परिसीमन और पुनर्गठन पर अंतिम निर्णय लेने में कई तकनीकी और राजनीतिक उलझनें हैं। सत्ता पक्ष जहां एक साथ चुनाव कराने की बात कर रहा है, वहीं विपक्ष आरोप लगा रहा है कि सरकार जानबूझकर चुनाव टाल रही है ताकि प्रशासनिक नियंत्रण से राजनीतिक लाभ लिया जा सके।
राजस्थान में निकाय, पंचायत और छात्रसंघ चुनावों को लेकर स्थिति अत्यंत उलझी हुई है। अदालत, प्रशासन और राजनीति की तिकड़ी ने इन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को जटिल बना दिया है। जहां छात्र संगठन लोकतंत्र की बहाली के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं विपक्ष चुनावों की देरी को लेकर सरकार पर हमला बोल रहा है। अब सभी की निगाहें 22 जुलाई पर टिकी हैं, जब हाईकोर्ट में सरकार को अंतिम रिपोर्ट पेश करनी है। अगर तब तक भी स्थिति स्पष्ट नहीं हुई, तो चुनावों की अनिश्चितता और बढ़ सकती है।