नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन में पश्चिम एशिया के बढ़ते तनाव को लेकर सदस्य देशों ने गंभीर चिंता जताई है। शनिवार को जारी नई दिल्ली घोषणा में BRICS नेताओं ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की निगरानी में आने वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों का विरोध किया। घोषणा में किसी देश का सीधे नाम नहीं लिया गया, लेकिन इसका संदेश अमेरिका और इजरायल की ईरान से जुड़ी सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में देखा जा रहा है।
परमाणु सुविधाओं को निशाना बनाने पर जताई गंभीर चिंताBRICS नेताओं ने कहा कि IAEA के पूर्ण सुरक्षा उपायों के तहत आने वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं और नागरिक बुनियादी ढांचे पर जानबूझकर हमले गंभीर चिंता का विषय हैं। समूह ने इस बात पर जोर दिया कि सशस्त्र संघर्ष के दौरान भी परमाणु सुरक्षा और संरक्षा के सिद्धांतों का पालन किया जाना चाहिए, ताकि लोगों और पर्यावरण को नुकसान से बचाया जा सके।
BRICS की घोषणा में संबंधित देशों से तनाव कम करने और बातचीत एवं कूटनीति के जरिए विवादों का समाधान खोजने की अपील भी की गई। इस रुख से साफ है कि समूह पश्चिम एशिया में सैन्य टकराव को और बढ़ने से रोकने पर जोर दे रहा है।
अमेरिका का सीधे नाम नहीं, लेकिन संदेश स्पष्टBRICS की संयुक्त घोषणा में अमेरिका का नाम लेकर उसकी आलोचना नहीं की गई। यही बात इस बयान को कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है। घोषणा में शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों और एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध किया गया है।
विश्लेषकों के अनुसार, अमेरिका का नाम लिए बिना भी यह संदेश काफी हद तक वॉशिंगटन की नीतियों की आलोचना के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई और उसके खिलाफ व्यापक प्रतिबंधों का समर्थन किया है। हालांकि, BRICS के सभी सदस्य इस मुद्दे को लेकर एक जैसी भाषा इस्तेमाल नहीं करते हैं, इसलिए घोषणा में सीधे किसी देश को निशाना बनाने से बचा गया।
ईरान के परमाणु ठिकाने बने विवाद का केंद्रईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका, इजरायल और तेहरान के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों पर सैन्य हमलों के बाद परमाणु सुरक्षा और IAEA की निगरानी को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता और बढ़ गई।
BRICS ने इसी व्यापक संदर्भ में शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं की सुरक्षा को लेकर अपना रुख सामने रखा है। समूह का कहना है कि परमाणु प्रतिष्ठानों को सैन्य संघर्ष का निशाना बनाना बेहद गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है।
SIPRI के अनुसार, ईरान में परमाणु प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों ने वैश्विक परमाणु अप्रसार व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल खड़े किए हैं और परमाणु सुविधाओं की सैन्य संघर्ष के दौरान सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ाई हैं।
IAEA की भूमिका भी चर्चा मेंपरमाणु सुविधाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर IAEA की भूमिका महत्वपूर्ण है। एजेंसी के महानिदेशक राफेल मारियानो ग्रॉसी लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि परमाणु प्रतिष्ठानों के आसपास सैन्य गतिविधियां परमाणु सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं।
मई 2026 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में ग्रॉसी ने संयुक्त अरब अमीरात के बराकाह परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पास हुए ड्रोन हमले को लेकर भी परमाणु सुरक्षा पर चिंता जताई थी। उनके अनुसार, परमाणु संयंत्रों पर सैन्य हमलों के गंभीर पर्यावरणीय और मानवीय परिणाम हो सकते हैं।
BRICS ने पश्चिम एशिया में तनाव कम करने को कहानई दिल्ली घोषणा में BRICS नेताओं ने पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहे तनाव पर चिंता जताई और अधिकतम संयम बरतने की अपील की। समूह ने नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को प्राथमिकता देने पर जोर दिया।
यह मुद्दा BRICS के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समूह में ईरान सदस्य देश है। वहीं भारत, चीन, रूस और अन्य सदस्य देशों के अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ भी महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में संयुक्त घोषणा में संतुलित भाषा अपनाना जरूरी था।
एकतरफा प्रतिबंधों का भी विरोधBRICS ने केवल परमाणु ठिकानों के मुद्दे पर ही चिंता नहीं जताई, बल्कि संयुक्त घोषणा में उन एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का भी विरोध किया जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अधिकृत नहीं किया है।
घोषणा में कहा गया कि ऐसे प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के खिलाफ हैं और इनका असर आम लोगों पर पड़ सकता है। इस मुद्दे को भी अमेरिका की प्रतिबंध नीति की आलोचना के संदर्भ में देखा जा रहा है, हालांकि संयुक्त घोषणा में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया।
भारत का रुख क्या है?भारत ने परमाणु सुरक्षा और शांतिपूर्ण परमाणु गतिविधियों की सुरक्षा के मुद्दे पर पहले भी चिंता व्यक्त की है। 2025 में ईरान पर सैन्य हमलों के बाद जारी BRICS बयान में भारत समेत सदस्य देशों ने IAEA के सुरक्षा उपायों के तहत आने वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। भारत ने उस समय भी परमाणु सुरक्षा, संरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कानून के पालन पर जोर दिया था।
नई दिल्ली में BRICS की मौजूदा घोषणा इसी व्यापक रुख को आगे बढ़ाती नजर आती है। हालांकि इस बार भी भाषा को इस तरह रखा गया है कि समूह किसी एक देश का नाम लेकर सीधे टकराव की स्थिति में न आए।
BRICS के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौतीइस घोषणा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि BRICS में अलग-अलग देशों के रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं। ईरान और रूस अमेरिका के साथ गंभीर तनाव में हैं, जबकि भारत और चीन के अमेरिका के साथ व्यापारिक एवं रणनीतिक संबंध भी हैं।
ऐसे में सभी सदस्य देशों की सहमति से एक संयुक्त घोषणा जारी करना अपने आप में महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि माना जा रहा है। घोषणा में अमेरिका या इजरायल का सीधे नाम न लेकर परमाणु सुविधाओं, नागरिक बुनियादी ढांचे और एकतरफा प्रतिबंधों के सिद्धांतों पर बात की गई है। इससे BRICS ने अपना संदेश भी दिया और सदस्य देशों के बीच मतभेदों को सार्वजनिक टकराव में बदलने से भी बचाया।
कुल मिलाकर, नई दिल्ली BRICS घोषणा ने पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट को लेकर समूह का रुख स्पष्ट कर दिया है। शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर हमलों का विरोध, नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा और बातचीत के जरिए विवाद सुलझाने की अपील के जरिए BRICS ने सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है। अमेरिका का नाम सीधे नहीं लिया गया, लेकिन घोषणा में इस्तेमाल की गई भाषा को वॉशिंगटन की नीतियों के लिए एक स्पष्ट कूटनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।