नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने बुधवार को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट को बताया कि असम के डिब्रूगढ़ की जेल में बंद खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह को लोकसभा से 54 दिनों की छुट्टी दे दी गई है। संसदीय समिति ने छुट्टी मंजूर कर ली है और अब उनकी सदस्यता को कोई खतरा नहीं है।
भारत के एडिशनल सॉसिसिटर जनरल सत्यपाल जैन ने जस्टिस शील नागू और जस्टिस सुमित गोयल की पीठ को बताया कि इस तरह के मुद्दों पर विचार करने वाली समिति ने मंगलवार को अमृतपाल सिंह समेत चार सांसदों की छुट्टी मंजूर कर दी है और लोकसभा सचिवालय ने उन्हें 54 दिनों की छुट्टी मंजूर किए जाने की जानकारी दी है।
जैन ने अदालत के समक्ष लेटर की एक कॉपी भी पेश की। जैन ने अदालत से कहा, इसके मद्देनजर उनकी सदस्यता को कोई खतरा नहीं है।
इंजीनियर राशिद का दिया हवाला
उन्होंने बारामुल्ला के सांसद इंजीनियर राशिद का भी हवाला दिया था, जो गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आतंकवाद-वित्तपोषण मामले में तिहाड़ जेल में हैं। राशिद को पिछले महीने दो दिनों के लिए लोकसभा में उपस्थित होने के लिए पैरोल मिली थी।
बता दें कि कट्टरपंथी सिख उपदेशक अमृतपाल ने खडूर साहिब सीट पर निर्दलीय के रूप में 1।9 लाख वोटों से जीत हासिल की और पिछले साल 5 जुलाई को उन्हें पद की शपथ दिलाई गई। तब से, उन्होंने संसद में भाग नहीं लिया है।
सुनवाई के बाद पत्रकारों से बात करते हुए मामले के एक अन्य वकील धीरज जैन ने कहा कि इसे देखते हुए अमृतपाल सिंह ने प्राधिकारियों के समक्ष संसद में उपस्थित होने की अपनी दूसरी मांग को आगे बढ़ाने के लिए दायर अपनी याचिका वापस ले ली है।
60 दिन में खत्म हो जाती है सदस्यतासांसद ने 21 फरवरी को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें मांग की गई थी कि अधिकारियों को निर्देश जारी किए जाएं कि उन्हें संसद के बजट सत्र में भाग लेने की अनुमति दी जाए। उन्होंने कहा कि अगर कोई सदस्य लगातार 60 दिनों तक संसद की बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है।
याचिका में क्या कहा गया है?लोकसभा सचिवालय से प्राप्त सूचना के अनुसार वे 12 दिसंबर 2024 तक 46 दिनों के लिए अनुपस्थित रहे। उन्होंने 21 फरवरी को अदालत को बताया था, अब केवल छह दिन बचे हैं। उनकी याचिका में कहा गया है, यह अधिकारियों की दुर्भावनापूर्ण मंशा है ताकि याचिकाकर्ता के संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व न हो। याचिकाकर्ता को जबरन हिरासत में लिया गया है और उन्हें संसद की कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई है, और ऐसी परिस्थितियों में, इसे अनुपस्थिति नहीं कहा जा सकता है, बल्कि अधिकारियों द्वारा याचिकाकर्ता को संसद से दूर रखने के लिए मजबूर किया गया है, जो सख्त शब्दों में संसद की अवमानना है।