Share Market Crash: सेंसेक्स में भारी गिरावट, निफ्टी 24,400 के नीचे फिसला; निवेशकों के ₹8 लाख करोड़ स्वाहा


बुधवार की सुबह भारतीय शेयर बाजार के लिए बेहद झकझोर देने वाली साबित हुई। कारोबार शुरू होते ही बाजार में तेज बिकवाली हावी हो गई और कुछ ही मिनटों में निवेशकों की बड़ी पूंजी डूब गई। अंतरराष्ट्रीय हालात, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने मिलकर ऐसा दबाव बनाया कि बाजार लगभग 2 प्रतिशत तक लुढ़क गया। अनुमान है कि इस गिरावट से निवेशकों की करीब ₹8 लाख करोड़ की संपत्ति साफ हो गई।

4 मार्च को शुरुआती कारोबार में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का सेंसेक्स 1,710 अंकों की गिरावट के साथ 78,529 के स्तर पर पहुंच गया। यह स्तर पिछले वर्ष अप्रैल के बाद सबसे निचला माना जा रहा है। दूसरी ओर, निफ्टी 50 भी 477 अंक टूटकर 24,389 पर आ गया। करीब सात महीनों में पहली बार निफ्टी 24,400 के अहम स्तर से नीचे फिसला। इस तेज गिरावट के चलते BSE में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण घटकर लगभग ₹449 लाख करोड़ पर सिमट गया।

पश्चिम एशिया में बढ़ता टकराव बना ट्रिगर

बाजार की इस उथल-पुथल के पीछे सबसे अहम वजह पश्चिम एशिया में गहराता संघर्ष बताया जा रहा है। अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर की गई सैन्य कार्रवाई के बाद क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई है। संभावित जवाबी हमलों और तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में फैली घबराहट का असर भारतीय इक्विटी बाजारों पर भी साफ दिखा।
कच्चे तेल की तेज़ी ने बढ़ाई चिंता

तेल बाजार में भी हलचल देखने को मिली। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति गुजरती है, वहां तनाव बढ़ने की आशंका से ब्रेंट क्रूड की कीमतें 82 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गईं। भारत अपनी करीब 85 प्रतिशत तेल जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है। ऐसे में कच्चे तेल का महंगा होना देश के लिए महंगाई, चालू खाते के घाटे और राजकोषीय संतुलन पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

रुपये में कमजोरी, विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी

तेल कीमतों में उछाल और भू-राजनीतिक जोखिमों के बीच भारतीय मुद्रा पर भी दबाव बढ़ा। रुपया डॉलर के मुकाबले फिसलकर 92.05 के स्तर तक पहुंच गया, जो अब तक के सबसे निचले स्तरों में से एक है। इसी दौरान विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने बाजार में लगातार बिकवाली जारी रखी, जिससे निवेशकों का भरोसा और कमजोर हुआ।

हालांकि घरेलू संस्थागत निवेशक (DII) खरीदारी के जरिए गिरावट को थामने की कोशिश करते नजर आए, लेकिन बिकवाली का दबाव इतना अधिक था कि बाजार को संभालना मुश्किल साबित हुआ।

निवेशकों के लिए आगे की राह

विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है, तो बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। ऊंची तेल कीमतें, कमजोर होता रुपया और संभावित महंगाई का दबाव कंपनियों की लागत और मुनाफे दोनों पर असर डाल सकता है।

आने वाले दिनों में वैश्विक घटनाक्रम, कच्चे तेल की चाल और विदेशी निवेशकों की रणनीति पर बाजार की दिशा काफी हद तक निर्भर करेगी। फिलहाल निवेशकों के बीच सतर्कता का माहौल है और बाजार में उतार-चढ़ाव का दौर जारी रहने की आशंका जताई जा रही है।