‘चौकीदार चोर है’ मामले में राहुल गांधी को झटका, बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस रद्द करने से किया इनकार

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को कथित मानहानि के एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। अदालत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर की गई कथित टिप्पणियों से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले की कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया। राहुल गांधी ने मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से जारी समन को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।

यह मामला राहुल गांधी की उन कथित टिप्पणियों से जुड़ा है, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘चौकीदार चोर है’, ‘चोरों के सरदार’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किए जाने का आरोप है। राहुल गांधी की याचिका पर मंगलवार को जस्टिस नितिन बोरकर की एकल पीठ ने सुनवाई की।

राहुल गांधी की याचिका पर क्या था तर्क

राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पासबोला ने दलील दी कि जिस कथित ट्वीट को लेकर शिकायत दर्ज की गई है, उसमें किसी राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया गया था। उनका कहना था कि बयान में किसी स्पष्ट, निश्चित या पहचान योग्य वर्ग को निशाना नहीं बनाया गया।

इसी आधार पर राहुल गांधी की ओर से कहा गया कि जब कोई स्पष्ट रूप से पहचाना जाने वाला पीड़ित व्यक्ति या समूह मौजूद नहीं है, तो शिकायतकर्ता के पास आपराधिक मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार नहीं बनता।
हाईकोर्ट ने दलील क्यों नहीं मानी

हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस नितिन बोरकर ने कहा कि बीजेपी एक पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और इस वजह से उसे एक पहचान योग्य संस्था माना जा सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता के अनुसार वह करीब दो दशक से बीजेपी का सक्रिय सदस्य रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो बीजेपी के सदस्य हैं, को ‘कमांडर-इन-थीफ’ कहे जाने वाली टिप्पणी को केवल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक सीमित मानना इस स्तर पर उचित नहीं होगा।

हालांकि, अदालत ने यह अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया कि कथित बयान का वास्तविक आशय क्या था या उससे बीजेपी के सदस्यों की प्रतिष्ठा पर कितना प्रभाव पड़ा। हाईकोर्ट ने कहा कि इन पहलुओं पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान विचार किया जाना चाहिए।

बीजेपी कार्यकर्ता ने दर्ज कराई थी शिकायत

मामले की शुरुआत बीजेपी कार्यकर्ता महेश श्रीश्रिमल की शिकायत से हुई थी। उन्होंने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि की कार्यवाही शुरू करने की मांग की थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने राहुल गांधी को समन जारी किया।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि राहुल गांधी की कथित टिप्पणी केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका असर बीजेपी और उसके सदस्यों पर भी पड़ता है। उनका दावा था कि प्रधानमंत्री को ‘चोरों के सरदार’ कहने से पार्टी के सदस्यों को भी ‘चोर’ के तौर पर पेश किया गया और इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।

महाराष्ट्र सरकार ने भी किया याचिका का विरोध

राहुल गांधी की याचिका का महाराष्ट्र सरकार की ओर से भी विरोध किया गया। एडवोकेट जनरल डॉ. मिलिंद साठे ने अदालत के सामने कहा कि इस स्तर पर यह देखा जाना चाहिए कि कथित मानहानि के अपराध के लिए जरूरी कानूनी तत्व मौजूद हैं या नहीं और क्या टिप्पणी किसी निश्चित तथा पहचान योग्य समूह से संबंधित थी।

सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि यदि किसी निश्चित और पहचान योग्य समूह की पहचान की जा सकती है, तो कानून उस समूह के किसी पीड़ित व्यक्ति को अभियोजन शुरू करने की अनुमति देता है। इसलिए मामले की कार्यवाही को शुरुआती स्तर पर ही समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।

शशि थरूर से जुड़े मामले का भी जिक्र

सुनवाई के दौरान बॉम्बे हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता शशि थरूर से जुड़े एक मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि पंजीकरण के आधार पर किसी राजनीतिक दल को एक पहचान योग्य और निर्धारित संस्था माना जा सकता है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी संदर्भ में कहा कि मौजूदा मामले में कथित बयान का वास्तविक मतलब क्या था और उसका पार्टी के सदस्यों पर क्या प्रभाव पड़ा, यह अभी तय किया जाना बाकी है। अदालत के अनुसार इन सवालों का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाएगा। इस आधार पर राहुल गांधी की ओर से दायर याचिका के जरिए आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की गई।