LPG पर निर्भरता घटाएगा भारत, मोदी कैबिनेट ने कोल गैसीफिकेशन मिशन को दिखाई हरी झंडी, 3 लाख करोड़ निवेश की उम्मीद

केंद्र सरकार ने देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में कोयला और लिग्नाइट गैसीकरण परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 37,500 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना को मंजूरी दी गई है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि यह पहल स्वच्छ ऊर्जा, आयात पर निर्भरता घटाने और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में बेहद अहम साबित होगी।

सरकार का मानना है कि इस योजना के जरिए आने वाले वर्षों में करीब 3 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित किया जा सकेगा। इसके साथ ही भारत घरेलू संसाधनों का इस्तेमाल कर एलपीजी, प्राकृतिक गैस और अन्य औद्योगिक जरूरतों के लिए विदेशी आयात पर अपनी निर्भरता काफी हद तक कम कर पाएगा।

कोयला और लिग्नाइट से बनेगी ‘सिनगैस’

इस योजना का मुख्य उद्देश्य कोयला और लिग्नाइट को गैसीकरण तकनीक के जरिए ‘सिनगैस’ यानी सिंथेसिस गैस में बदलना है। इस गैस का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, केमिकल इंडस्ट्री और कई अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में किया जा सकेगा। सरकार ने इस मिशन के तहत लगभग 75 मिलियन टन कोयला और लिग्नाइट के गैसीकरण का लक्ष्य तय किया है।

अश्विनी वैष्णव ने बताया कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कोयला और लिग्नाइट भंडार वाले देशों में शामिल है। देश के पास करीब 401 अरब टन कोयला और लगभग 47 अरब टन लिग्नाइट का भंडार मौजूद है। फिलहाल भारत की कुल ऊर्जा खपत में कोयले की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक है। सरकार अब पारंपरिक थर्मल पावर तक सीमित रहने के बजाय कोयले के उपयोग को आधुनिक औद्योगिक क्षेत्रों तक विस्तारित करना चाहती है।
क्या होती है कोल गैसीफिकेशन तकनीक?

कोल गैसीफिकेशन एक उन्नत तकनीक है, जिसमें कोयले को बेहद उच्च तापमान और दबाव पर ऑक्सीजन और पानी के साथ रिएक्ट कराया जाता है। इस प्रक्रिया से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन से भरपूर ‘सिनगैस’ तैयार होती है। बाद में इस गैस को अलग-अलग औद्योगिक जरूरतों के मुताबिक प्रोसेस किया जाता है।

सरकार का कहना है कि यह पहल केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य प्राकृतिक गैस, उर्वरक और केमिकल आयात में कमी लाकर भारत को आत्मनिर्भर बनाना भी है। परियोजनाओं का चयन पूरी तरह पारदर्शी बोली प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा ताकि निवेश और कार्यान्वयन में पारदर्शिता बनी रहे।

कंपनियों को मिलेगा वित्तीय प्रोत्साहन

सरकार इस योजना के तहत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता भी देगी। संयंत्र और मशीनरी की लागत का लगभग 20 प्रतिशत तक प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। यह सहायता परियोजना के अलग-अलग चरण पूरे होने पर चार किस्तों में जारी की जाएगी।

प्रत्येक परियोजना को अधिकतम 5,000 करोड़ रुपये तक की सहायता मिल सकेगी। वहीं एक उत्पाद श्रेणी (SNG और यूरिया को छोड़कर) के लिए अधिकतम 9,000 करोड़ रुपये तक का प्रोत्साहन तय किया गया है। इसके अलावा सभी परियोजनाओं को मिलाकर किसी एक इकाई या समूह को अधिकतम 12,000 करोड़ रुपये तक की मदद दी जाएगी।

ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना भारत की ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव ला सकती है। इससे न केवल स्वदेशी संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा, बल्कि रोजगार, औद्योगिक निवेश और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी बड़ा बढ़ावा मिलेगा। साथ ही एलपीजी और गैस आयात पर खर्च होने वाली भारी विदेशी मुद्रा की बचत होने की भी उम्मीद जताई जा रही है।

सरकार अब इस परियोजना को देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का अहम हिस्सा मान रही है, जिससे भविष्य में भारत स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ सकेगा।