क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के करीब आ रही है कांग्रेस? उदित राज ने अभिजीत दीपके को दिया बड़ा राजनीतिक सुझाव

सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) अब केवल एक ऑनलाइन कैंपेन तक सीमित नहीं दिखाई दे रही है। इसके बढ़ते प्रभाव और युवाओं के बीच बन रही पहचान ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज कर दी है। अब इस डिजिटल आंदोलन को लेकर कांग्रेस के भीतर से भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद उदित राज ने पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके को ऐसा सुझाव दिया है, जिसने इस पूरे मुद्दे को नई राजनीतिक बहस में बदल दिया है।

उदित राज ने कहा है कि किसी भी जनआंदोलन को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए उसे मजबूत राजनीतिक समर्थन की जरूरत होती है। उनका मानना है कि केवल सोशल मीडिया के सहारे कोई आंदोलन ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि अगर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को व्यापक जनसमर्थन और राजनीतिक दिशा चाहिए, तो उसे ऐसे नेतृत्व के साथ जुड़ना होगा जो मौजूदा सत्ता के खिलाफ मजबूत विकल्प बन सके। इस दौरान उन्होंने राहुल गांधी का नाम लेते हुए उन्हें इस आंदोलन के लिए उपयुक्त चेहरा बताया।

सोशल मीडिया से निकला आंदोलन, अब राजनीति में चर्चा

उदित राज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि अभिजीत दीपके के नेतृत्व में शुरू हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी और असंतोष का प्रतीक बनकर सामने आई है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे आंदोलनों की असली ताकत तभी बनती है, जब उन्हें सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों का सहयोग प्राप्त हो।

उन्होंने लिखा कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा सरकार के खिलाफ एक विश्वसनीय विकल्प खड़ा करना आसान नहीं है। ऐसे में विपक्षी एकजुटता और बड़े नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। उदित राज के अनुसार, यदि यह ऊर्जा अलग-अलग दिशाओं में बिखर गई तो आंदोलन का मूल उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है।
राहुल गांधी को बताया आंदोलन का संभावित चेहरा

पूर्व सांसद उदित राज ने अभिजीत दीपके को सीधे तौर पर सलाह देते हुए कहा कि उन्हें इस अभियान को राहुल गांधी के नेतृत्व से जोड़ने पर विचार करना चाहिए। उनका कहना था कि राहुल गांधी ही ऐसे नेता हैं जो इस गुस्से और असंतोष को संविधान और लोकतंत्र की रक्षा के बड़े राष्ट्रीय आंदोलन में बदल सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि अभिजीत दीपके खुद को अंबेडकरवादी विचारधारा से जोड़ते हैं, इसलिए उन्हें यह समझना चाहिए कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लोकतांत्रिक तरीके से चुनौती देने की वास्तविक राजनीतिक क्षमता किसके पास है। उदित राज का मानना है कि अगर आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना है तो उसे केवल डिजिटल विरोध तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

तृणमूल कांग्रेस ने भी दिया समर्थन

दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस की ओर से आई यह प्रतिक्रिया ऐसे समय पर सामने आई है, जब तृणमूल कांग्रेस पहले ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के समर्थन में उतर चुकी है। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने हाल ही में कहा था कि पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी इस ऑनलाइन मुहिम को पूरा समर्थन दे रहे हैं।

डेरेक ओ’ब्रायन ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा कि उनकी पार्टी “अच्छी लड़ाई” लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है और जनता की आवाज उठाने वाले अभियानों के साथ खड़ी है। इसके बाद से यह चर्चा और तेज हो गई कि क्या विपक्षी दल इस डिजिटल अभियान को राजनीतिक मंच में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

कैसे शुरू हुई ‘कॉकरोच जनता पार्टी’?

अमेरिका के बोस्टन में रहने वाले अभिजीत दीपके ने 16 मई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की शुरुआत की थी। यह अभियान उस विवाद के बाद तेजी से वायरल हुआ, जिसमें प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की एक टिप्पणी को बेरोजगार युवाओं की तुलना “कॉकरोच” से जोड़कर देखा गया। सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर भारी प्रतिक्रिया देखने को मिली और देखते ही देखते ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ट्रेंड करने लगी।

हालांकि बाद में पार्टी से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और वेबसाइट को बंद कर दिया गया। इसके बावजूद इस अभियान को लेकर चर्चा कम नहीं हुई है। बड़ी संख्या में युवा अब भी सोशल मीडिया पर इससे जुड़े सवाल उठा रहे हैं और इसे सरकार विरोधी प्रतीक के रूप में देख रहे हैं।

क्या भविष्य में बनेगी राजनीतिक ताकत?


फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भविष्य में वास्तविक राजनीतिक संगठन का रूप ले पाएगी या यह केवल एक डिजिटल आंदोलन बनकर रह जाएगी। हालांकि अभी तक अभिजीत दीपके की ओर से औपचारिक राजनीतिक पार्टी बनाने को लेकर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जिस तरह विपक्षी दलों की दिलचस्पी इसमें बढ़ रही है, उससे राजनीतिक संभावनाओं की चर्चा तेज हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोशल मीडिया आधारित आंदोलनों का प्रभाव अब भारतीय राजनीति में लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अगर इस तरह के अभियानों को जमीन पर समर्थन मिलता है, तो आने वाले समय में यह पारंपरिक राजनीति के लिए नई चुनौती भी बन सकते हैं।