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स्वतंत्रता दिवस विशेष : 1857 की क्रांति का स्वतंत्रता आन्दोलन में विशेष स्थान

हम 1857 की इस क्रांति के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Mon, 13 Aug 2018 6:09:55

स्वतंत्रता दिवस विशेष : 1857 की क्रांति का स्वतंत्रता आन्दोलन में विशेष स्थान

भारतीय स्वंत्र आन्दोलन की शुरुआत 1857 की क्रांति से मानी जाती हैं। 1857 का भारतीय विद्रोह ही आजादी के लिए पहला कदम था। हांलाकि 1 वर्ष के अन्दर ही ब्रिटिश हुकूमत ने इस आन्दोलन को समाप्त कर दिया था। लेकिन आजादी की इस पहली चिंगारी का स्वतंत्रता आन्दोलन में बहुत बड़ा महत्व हैं। क्योंकि यहाँ से उत्पन्न हुई चिंगारी पूरी तरह बुझी नहीं थी और समय-समय पर इसका असर कई आन्दोलनों के रूप में देखने को मिला। आज हम 1857 की इस क्रांति के बारे में आपको बताने जा रहे हैं।

लोगों के बढ़ते असंतोष से इस अवधि के दौरान अनेक स्थानीय प्रांतियां होती रहीं। यद्यपि 1857 का विद्रोह, जो मेरठ में सैन्य कर्मियों की बगावत से शुरू हुआ, जल्दी ही आगे फैल गया और इससे ब्रिटिश शासन को एक गंभीर चुनौती मिली। जबकि ब्रिटिश शासन इसे एक वर्ष के अंदर ही दबाने में सफल रहा, यह निश्चित रूप से एक ऐसी लोकप्रिय क्रांति थी जिसमें भारतीय शासक, जनसमूह और नागरिक सेना शामिल थी, जिसने इतने उत्साह से इसमें भाग लिया कि इसे भारतीय स्वतंत्रता का पहला संग्राम कहा जा सकता है। ब्रिटिश द्वारा जमीनदारी प्रथा को शुरू करना, जिसमें मजदूरों को भारी करों के दबाव से कुचल डाला गया था, इससे जमीन के मालिकों का एक नया वर्ग बना। दस्तकारों को ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के आगमन से नष्ट कर दिया गया। धर्म और जाति प्रथा, जिसने पारम्परिक भारतीय समाज की सुदृढ़ नींव बनाई थी अब ब्रिटिश प्रशासन के कारण खतरे में थी।

भारतीय सैनिक और साथ ही प्रशासन में कार्यरत नागरिक वरिष्ठ पदों पर पदोन्नत नहीं किए गए, क्योंकि ये यूरोपियन लोगों के लिए आरक्षित थे। इस प्रकार चारों दिशाओं में ब्रिटिश शासन के खिलाफ असंतोष और बगावत की भावना फैल गई, जो मेरठ में सिपाहियों के द्वारा किए गए इस बगावत के स्वर में सुनाई दी जब उन्हें ऐसी कारतूस मुंह से खोलने के लिए कहा गया जिन पर गाय और सुअर की चर्बी लगी हुई थी, इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। हिन्दु तथा मुस्लिम दोनों ही सैनिकों ने इन कारतूसों का उपयोग करने से मना कर दिया, जिन्हें 9 मई 1857 को अपने साथी सैनिकों द्वारा क्रांति करने के लिए गिरफ्तार कर लिया गया।

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बगावती सेना ने जल्दी ही दिल्ली पर कब्जा कर लिया और यह क्रांति एक बड़े क्षेत्र में फैल गई और देश के लगभग सभी भागों में इसे हाथों हाथ लिया गया। इसमें सबसे भयानक युद्ध दिल्ली, अवध, रोहिलखण्ड, बुंदेल खण्ड, इलाहबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार में लड़ा गया। विद्रोही सेनाओं में बिहार में कंवर सिंह के तथा दिल्ली में बख्तखान के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन को एक करारी चोट दी।

कानपुर में नाना साहेब ने पेशावर के रूप में उद्घघोषणा की और तात्या टोपे ने उनकी सेनाओं का नेतृत्व किया जो एक निर्भीक नेता थे। झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने ब्रिटिश के साथ एक शानदार युद्ध लड़ा और अपनी सेनाओं का नेतृत्व किया। भारत के हिन्दु, मुस्लिक, सिक्ख और अन्य सभी वीर पुत्र कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और ब्रिटिश राज को उखाड़ने का संकल्प लिया। इस क्रांति को ब्रिटिश राज द्वारा एक वर्ष के अंदर नियंत्रित कर लिया गया जो 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुई और 20 जून 1858 को ग्वालियर में समाप्त हुई।

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