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सत्तर के दशक का वो संगीत, जिसे सुनकर झूमने लगता है मन — लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (दूसरा व अन्तिम भाग)

1966 की खुमारी अभी गई भी नहीं थी कि 1967 में एक बार फिर से लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने संगीत से स्वयं को बॉलीवुड में सिरमौर साबित किया

Posts by : Geeta | Updated on: Wed, 21 Feb 2018 5:55:11

सत्तर के दशक का वो संगीत, जिसे सुनकर झूमने लगता है मन — लक्ष्मीकांत प्यारेलाल (दूसरा व अन्तिम भाग)

पाठकों ने हमारे लीजेण्ड क्लासिक के पहले आलेख लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को काफी सराहा। लक्ष्मीकांत पर दी गईजानकारी आधी थी हमने इस आलेख के अन्त में लिखा था कि जारी. . . . . . (शेष अगली कड़ी में) पाठकों ने इसे पसन्द किया और इसके अगले भाग की जानकारी चाही। अब हम पाठकों को लीजेण्ड क्लासिक के जरिए लगातार बॉलीवुड के उन दिग्गज व्यक्तित्वों के बारे में बताते रहेंगे जो अतीत की बात हो चुके हैं। यदि यह लोग नहीं होते तो बॉलीवुड, बॉलीवुड नहीं होता। अब लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के बारे में शेष. . . . .

—सम्पादक


1966 की खुमारी अभी गई भी नहीं थी कि 1967 में एक बार फिर से लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने अपने संगीत से स्वयं को बॉलीवुड में सिरमौर साबित किया। यह वो वर्ष था जब उनकी सबसे ज्यादा फिल्मों का प्रदर्शन हुआ और उन फिल्मों के गीतों की लोकप्रियता ने शिखर स्थान प्राप्त किया। सन् 1967 में लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने लगातार एक के बाद एक सफल फिल्में देकर स्वयं को और हिन्दी फिल्मों को उस स्थान पर पहुँचाया जहाँ दर्शक उसे देखना पसन्द करता था। इस वर्ष की शुरूआत में उन्होंने छोटे-बड़े हर बैनर की फिल्म में संगीत दिया, जिनमें प्रमुख रही—फर्ज, अनिता, शार्गिद, पत्थर के सनम, नाइट इन लंदन, जाल और एवरग्रीन म्यूजिकल हिट ‘मिलन’। इन फिल्मों में ‘फर्ज’ ऐसी फिल्म थी जिसकी स्टार कास्ट बड़ी नहीं थी। जितेन्द्र नवोदित अभिनेताओं में थे और वे एक बड़ी सफल फिल्म को तरस रहे थे।

‘फर्ज’ लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की पहली गोल्डन जुबली हिट फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के गीतों—मस्त बहारों का मैं आशिक मैं जो चाहे यार करूं, बार-बार दिन ये आए, तू जिये हजारों साल. . . ., हम तो तेरे आशिक हैं सदियों. . ., तुमसे ओ हसीना कभी मोहब्बत न मैंने करनी थी—ऐसे गीत रहे जिन्हें वर्षों तक श्रोता गुनगुनाते रहे। इस फिल्म ने जितेन्द्र को हिन्दी फिल्मों में ‘जम्पिंग जैक’ के नाम से ख्यात किया। ‘शार्गिद’ उनकी दूसरी गोल्डन जुबली फिल्म साबित हुई। इस फिल्म के गीतों को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने। फिल्म में छह गीत थे और सभी बेहद सुरीले और कर्णप्रिय। विशेष रूप से ‘वो हैं जरा खफा-खफा, नैन यूं चुराये हैं. . . .’ ‘दिल विल प्यार-व्यार मैं क्या जानूं रे’ आज भी सुनकर मन झूमने लगता है। लता मंगेशकर का गाया यह गीत उस वर्ष की बिनाका गीत माला का सिरमौर गीत बना था। इस वर्ष लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत तो कई फिल्मों में दिया लेकिन पुरस्कार मिला ‘मिलन’ के लिए।

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17 मार्च 1967 को प्रदर्शित हुई निर्माता एल.वी.प्रसाद की ए.सुब्बाराव निर्देशित ‘मिलन’ के गीतों को आनन्द बक्शी ने लिखा था। फिल्म में कुल 11 गीत थे और सब एक से बढक़र कर। इस फिल्म की सफलता में सबसे बड़ा योगदान गीत-संगीत का था। ‘मिलन’ ने आनन्द बक्शी को हिन्दी सिनेमा में श्रेष्ठ गीतकार का दर्जा दिलवाया। विशेष रूप से उनके द्वारा रचे—सावन का महीना, पवन करे सोर, जियरा झूमे जैसे मन मा नाचे मोर, राम करे ऐसा हो जाये मेरी निंदीया तोहे मिल जाये मैं जागूं, तू सो जाये, बोल गोरी बोल तेरा कौन पिया—के शब्द और इनका फिल्मांकन दोनों श्रेष्ठ थे। ‘मिलन’ ने 1967 के फिल्मफेयर पुरस्कारों में तीन अपनी झोली में डाले—फिल्मफेयर बेस्ट एक्ट्रेस—नूतन, फिल्मफेयर बेस्ट स्पोर्टिंग एक्ट्रेस—जमुना, और फिल्मफेयर बेस्ट म्यूजिक निर्देशक अवार्ड—लक्ष्मीकांत प्यारेलाल। इस पुरस्कार के लिए वे इस वर्ष के इकलौते ऐसे संगीतकार रहे जिनके सामने अन्य कोई नहीं आया था। पाठकों को यह जानकार थोड़ी हैरानी होगी कि ‘मिलन’ 1963 में आई सुपरहिट तेलुगू फिल्म ‘मोगा मानासूलू’ का रीमेक थी, जिसके निर्माता भी एल.वी. प्रसाद ही थे।

1967 ऐसा वर्ष रहा जब हिन्दी सिनेमा में तीन संगीतकारों— लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन और कल्याणजी आनन्दजी — ने अपने पांव पसारे। इन तीनों ने उस समय के ख्यातनाम संगीतकारों शंकर जयकिशन, सचिन देव बर्मन, नौशाद, सी.रामचन्द्र, खय्याम, मदन मोहन, ओ.पी. नैय्यर, रोशन आदि को बैकफुट पर जाने पर मजबूर कर दिया। फिल्म उद्योग के बड़े निर्माताओं—प्रसाद प्रोडक्शन, राजश्री प्रोडक्शन, जे.ओम. प्रकाश, राज खोसला, मनोज कुमार, रामानन्द सागर, मदन मोहला, मोहन सहगल, वी शान्ताराम, राजकपूर, यश चोपड़ा, मनमोहन देसाई, सुभाष घई—ने अपने स्थायी संगीतकारों को छोडक़र लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को अपनी फिल्मों की कमान संभलवानी शुरू कर दी थी। लक्ष्मी-प्यारे ने भी इनकी फिल्मों में वो संगीत दिया, जो आज भी बेमिसाल माना जाता है।

हिन्दी सिनेमा के इतिहास में आनन्द बक्शी और लक्ष्मी-प्यारे की जोड़ी ने अनगिनत हिट गीत दिए। इस जोड़ी ने 250 से ज्यादा फिल्मों में एक साथ काम किया। आनन्द बक्शी ने अपने अधिकांश गीत इस जोड़ी के लिए लिखे। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने जितने भी फिल्मफेयर अवार्ड जीते उन सभी के गीतों के रचनाकार आनन्द बक्शी साहब रहे। सिवाय उनके पहले फिल्मफेयर अवार्ड के, जो उन्होंने 1965 में ‘दोस्ती’ के लिए प्राप्त किया था।

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1963 से अपना करियर शुरू करने वाले लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने अपने करियर में सात बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। उन्हें यह पुरस्कार—दोस्ती (1965), मिलन (1968), जीने की राह (1970), अमर अकबर एंथोनी (1978), सत्यम् शिवम् सुन्दरम् (1979), सरगम (1980) और कर्ज (1981)—के लिए मिला। वहीं दूसरी ओर वे 1971 से लेकर 1994 तक 18 अन्य फिल्मों के संगीत के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार के दावेदार बने, किन्तु उन्हें जीत नहीं पाए। अपने करियर में लगभग हर वर्ष वे पुरस्कार के दावेदार बने। कई बार तो ऐसा मौका भी आया जब वे एक ही वर्ष में तीन या चार फिल्मों के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के तौर पर नॉमिनेट हुए। कुछ ऐसी फिल्में रहीं जिनका संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ लेकिन वे पुरस्कार न पा सके। यह फिल्में थी—आए दिन बहार के, इंतकाम, दो रास्ते, मेरा गाँव मेरा देश, शोर, दाग, बॉबी, एक दूजे के लिए, उत्सव, सुर संगम, फर्ज, शार्गिद, तेजाब, हीरो और मिस्टर इंडिया। इन फिल्मों के अतिरिक्त रोटी, कपड़ा और मकान, दुल्हन, जानी दुश्मन, आशा, प्रेम रोग, मेरी जंग, प्यार झुकता नहीं, राम लखन, सौदागर, खलनायक वो फिल्में रहीं जिनका संगीत श्रोताओं और दर्शकों के सिर चढक़र बोला लेकिन इनके लिए लक्ष्मी-प्यारे को कोई पुरस्कार नहीं मिला।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का संगीत लता मंगेशकर, आशा भौंसले, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी की आवाज के बिना अधूरा माना जा सकता है। इन गायकों के साथ उन्होंने हजारों गीतों को संगीतबद्ध किया। लता और आशा के साथ अपने 35 साल लम्बे सफर में उन्होंने 1100 से ज्यादा गीतों को इनसे गवाया। लता मंगेशकर ने लक्ष्मी-प्यारे के संगीत से सजे 712 गीतों को अपनी आवाज दी, वहीं आशा भौंसले ने 485 गीतों में अपनी आवाज का जादू जगाया।

मोहम्मद रफी और किशोर कुमार ऐसे गायक रहे जिनके साथ इनकी जोड़ी खूब जमी। मोहम्मद रफी के साथ वर्ष 1967 में आई फिल्म ‘छलिया बाबू’ से हुई शुरूआत उनके गाये अंतिम गीत ‘तेरे आने की आस है दोस्त, तू कहीं आस-पास है दोस्त’ (1980) तक रही। यह मोहम्मद रफी की जिन्दगी का अंतिम गीत था जिसे उन्होंने इनके संगीत में गाया। 31 जुलाई 1980 को मेहबूब स्टूडियो में रात 10 बजे इसे रिकॉर्ड किया गया था और इसके कुछ देर बाद ही रफी साहब ने यह दुनिया छोड़ दी थी। यह गीत जे.ओमप्रकाश निर्मित निर्देशित फिल्म ‘आसपास’ का था, जिसमें धर्मेन्द्र और हेमा मालिनी ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई थीं। जे. ओमप्रकाश ने इस गीत को क्लाइमैक्स में रखा जहाँ धर्मेन्द्र हरीभरी वादियों में खड़े हैं और आसमान में उन्हें हेमा का अक्स दिखायी दे रहा है। साथ ही उन्होंने इस गीत की रिकॉर्डिंग का एक दृश्य भी रखा था। यह फिल्म 1980 में ही प्रदर्शित हुई थी।

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किशोर कुमार की जिन्दगी में लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल दूसरे ऐसे संगीतकार थे, जिनके निर्देशन में उन्होंने सर्वाधिक 402 गीतों को अपनी आवाज दी। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने रफी और किशोर कुमार के मध्य संतुलन बनाए रखा था। रफी (388) के मुकाबले उन्होंने किशोर कुमार से सिर्फ 14 गीत (402) ज्यादा गवाये थे। ‘आराधना’ की सफलता के बाद किशोर कुमार के शिखर दिनों में इस संगीतकार जोड़ी ने रफी साहब से सर्वाधिक गीत रिकॉर्ड करवाए। 1977 में उन्होंने रफी साहब को अमर अकबर एंथोनी और सरगम के जरिए पुन: शिखर पर पहुँचाया था।

ऐसा नहीं है कि अपने करियर में लक्ष्मी-प्यारे ने सिर्फ इन्हीं गायकों के साथ काम किया। उन्होंने इनके अतिरिक्त मुकेश, मन्ना डे, महेन्द्र कपूर, अमित कुमार, अल्का याग्निक, उदित नारायण, शैलेन्द्र सिंह, एस.पी. बालासुब्रह्मण्यम, एस. जानकी और अनुराधा पौडवाल के साथ भी काम किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी फिल्मों में नई प्रतिभाओं—कविता कृष्णमूर्ति, मोहम्मद अजीज, सुरेश वाडेकर, शब्बीर कुमार, सुखविन्दर सिंह, विनोद राठौड और रूपकुमार राठौड— को भी पेश किया। तलत मेहमूद के साथ काम करने की तीव्र इच्छा रखने वाले लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने उनके साथ सिर्फ एक गीत रिकॉर्ड किया था। 1971 में आई फिल्म ‘वो दिन’ के लिए उन्होंने लता और तलत की आवाज में ‘मोहब्बत की कहानियां’ नामक गीत को स्वरबद्ध किया।

लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल हिन्दी सिनेमा के एकमात्र ऐसी संगीतकार जोड़ी रही जिसने अपने समय के चार ख्यातनाम गायकों—किशोर, रफी, लता और मुकेश—को एक साथ एक ही फिल्म के एक ही गीत में रखा। यह फिल्म थी ‘अमर अकबर एंथोनी’ (1977) और गीत था—हमको तुमसे हो गया है प्यार क्या करें बोलो तो जिये, बोलो तो मर जायें। इसी तरह से उन्होंने गजल गायक पंकज उधास को महेश भट्ट निर्देशित ‘नाम’ (1986) से बतौर गायक पेश किया। गीत के बोल थे—‘चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई, बड़े दिनों के बाद अपने वतनों से यार वतन की मिट्टी आई है. . .’ इस गीत के बाद पंकज उधास से इनकी संगीतबद्ध कुछ और फिल्मों में भी गीत गाये।

आज लक्ष्मीकांत हमारे बीच में नहीं हैं और प्यारेलाल ने उनके जाने के बाद कुछ फिल्मों में बैकग्राउण्ड म्यूजिक दिया था। उन्होंने मुकेश खन्ना निर्मित और अभिनीत दूरदर्शन धारावाहिक ‘शक्तिमान’ के लिए संगीत रचा था।

—समाप्त

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अगली कड़ी में पढिय़े—कल्याणजी आनन्दजी के बारे में

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे, तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे, तब तुम मेरे पास आना प्रिय, मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए—फिल्म पूरब और पश्चिम, निर्माता निर्देशक अभिनेता मनोज कुमार, गीतकार संतोष आनन्द, संगीतकार कल्याणजी आनन्दजी।

—राजेश कुमार भगताणी

राज्य
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