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गणगौर स्पेशल : अखंड सुहाग के लिए सुहागिनों की कहानी

आज हम आपको इस दिन सुनी जाने वाली व्रत कथा की जानकारी देने जा रहे हैं जो अखंड सुहाग का आशीर्वाद दिलाती हैं।

Posts by : Ankur Mundra | Updated on: Wed, 25 Mar 2020 6:00:23

गणगौर स्पेशल : अखंड सुहाग के लिए सुहागिनों की कहानी

आने वाले दिनों में 27 मार्च 2020 को गणगौर का पावन पर्व आने वाला हैं और इसका समापन हैं। इस दिन सभी सुहागिन अपने सुहाग के लिए और अविवाहित लड़कियां अच्छे वर को पाने के लिए व्रत रखती हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया पर देश के कई हिस्सों जैसे राजस्थान, उ‍त्तरप्रदेश, हरियाणा व मध्यप्रदेश में मुख्यतया मनाया जाता हैं। आज हम आपको इस दिन सुनी जाने वाली व्रत कथा की जानकारी देने जा रहे हैं जो अखंड सुहाग का आशीर्वाद दिलाती हैं। तो आइये जानते हैं इस कहानी के बारे में।

चैत्र कृष्ण प्रतिपदा यानी होली के दूसरे दिन से अखंड सौभाग्य की कामना से कुंवारी, विवाहिताएं और नवविवाहिताएं सुहागिन प्रतिदिन गणगौर पूजती हैं और चैत्र शुक्ल द्वितीया यानी गुड़ी पड़वा के अगले दिन (सिंजारे) किसी नदी, तालाब या शुद्ध स्वच्छ शीतल सरोवर पर जाकर अपनी पूजी हुई गणगौर को जल पिलाती हैं। दूसरे दिन शाम को बिदा के सुंदर व मार्मिक लोकगीतों के साथ उनका विसर्जन होता है। यह व्रत विवाहित महिलाएं पति से सात जन्मों का साथ, स्नेह, सम्मान और सौभाग्य पाने के लिए करती हैं। इस व्रत को करने से कुंवारी कन्या को उत्तम पति मिलता है और सुहागिनों का सुहाग अखंड रहता है।

एक बार भगवान शंकर तथा पार्वतीजी नारदजी के साथ भ्रमण को निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गांव में पहुंच गए। उनके आगमन का समाचार सुनकर गांव की श्रेष्ठ कुलीन स्त्रियां उनके स्वागत के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाने लगीं। भोजन बनाते-बनाते उन्हें काफी विलंब हो गया। किंतु साधारण कुल की स्त्रियां श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों से पहले ही थालियों में हल्दी तथा अक्षत लेकर पूजन हेतु पहुंच गईं।

पार्वतीजी ने उनके पूजा भाव को स्वीकार करके सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया। वे अटल सुहाग प्राप्ति का वरदान पाकर लौटीं। इसके बाद उच्च कुल की स्त्रियां अनेक प्रकार के पकवान लेकर गौरीजी और शंकरजी की पूजा करने पहुंचीं। सोने-चांदी से निर्मित उनकी थालियों में विभिन्न प्रकार के पदार्थ थे। उन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वतीजी से कहा- 'तुमने सारा सुहाग रस तो साधारण कुल की स्त्रियों को ही दे दिया। अब इन्हें क्या दोगी?'

पार्वतीजी ने उत्तर दिया- 'प्राणनाथ, आप इसकी चिंता मत कीजिए। उन स्त्रियों को मैंने बाहरी पदार्थों से बना रस दिया है। मैं इन उच्च कुल की स्त्रियों को अपनी उंगली चीरकर अपने रक्त का सुहाग रस दूंगी। यह सुहाग रस जिसके भाग्य में पड़ेगा, वह तन-मन से मुझ जैसी सौभाग्यवती हो जाएगी। जब स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर दिया, तब पार्वतीजी ने अपनी उंगली चीरकर उन पर छिड़क दी। जिस पर जैसा छींटा पड़ा, उसने वैसा ही सुहाग पा लिया। इसके बाद भगवान शिव की आज्ञा से पार्वतीजी ने नदी तट पर स्नान किया और बालू की शिव-मूर्ति बनाकर पूजन करने लगीं। पूजन के बाद बालू के पकवान बनाकर शिवजी को भोग लगाया।

प्रदक्षिणा करके नदी तट की मिट्टी से माथे पर तिलक लगाकर दो कण बालू का भोग लगाया। इतना सब करते-करते पार्वती को काफी समय लग गया। काफी देर बाद जब वे लौटकर आईं तो महादेवजी ने उनसे देर से आने का कारण पूछा। उत्तर में पार्वतीजी ने झूठ ही कह दिया कि वहां मेरे मायके वाले मिल गए थे। उन्हीं से बातें करने में देर हो गई। परंतु महादेव तो महादेव ही थे। वे कुछ और ही लीला रचना चाहते थे। अतः उन्होंने पूछा- 'पार्वती! तुमने नदी के तट पर पूजन करके किस चीज का भोग लगाया था और स्वयं कौन-सा प्रसाद खाया था?'

स्वामी, पार्वतीजी ने पुनः झूठ बोल दिया- 'मेरी भाभी ने मुझे दूध-भात खिलाया, उसे खाकर मैं सीधी यहां चली आ रही हूं... यह सुनकर शिवजी भी दूध-भात खाने की लालच में नदी-तट की ओर चल दिए। पार्वती दुविधा में पड़ गईं। तब उन्होंने मौन भाव से भगवान भोले शंकर का ही ध्यान किया और प्रार्थना की - हे भगवन! यदि मैं आपकी अनन्य दासी हूं तो आप इस समय मेरी लाज रखिए। यह प्रार्थना करती हुई पार्वतीजी भगवान शिव के पीछे-पीछे चलती रहीं। उन्हें दूर नदी के तट पर माया का महल दिखाई दिया। उस महल के भीतर पहुंचकर वे देखती हैं कि वहां शिवजी के साले तथा सलहज आदि सपरिवार उपस्थित हैं। उन्होंने गौरी तथा शंकर का भाव-भीना स्वागत किया। वे दो दिनों तक वहां रहे।

तीसरे दिन पार्वतीजी ने शिव से चलने के लिए कहा, पर शिवजी तैयार न हुए। वे अभी और रुकना चाहते थे। तब पार्वतीजी रूठकर अकेली ही चल दीं। ऐसी हालत में भगवान शिवजी को पार्वती के साथ चलना पड़ा। नारदजी भी साथ-साथ चल दिए। चलते-चलते वे बहुत दूर निकल आए। उस समय भगवान सूर्य अपने धाम (पश्चिम) को पधार रहे थे। अचानक भगवान शंकर पार्वतीजी से बोले- 'मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूं....

'ठीक है, मैं ले आती हूं.' - पार्वतीजी ने कहा और जाने को तत्पर हो गईं। परंतु भगवान ने उन्हें जाने की आज्ञा न दी और इस कार्य के लिए ब्रह्मपुत्र नारदजी को भेज दिया। परंतु वहां पहुंचने पर नारदजी को कोई महल नजर न आया। वहां तो दूर तक जंगल ही जंगल था, जिसमें हिंसक पशु विचर रहे थे। नारदजी वहां भटकने लगे और सोचने लगे कि कहीं वे किसी गलत स्थान पर तो नहीं आ गए? मगर सहसा ही बिजली चमकी और नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी हुई दिखाई दी। नारदजी ने माला उतार ली और शिवजी के पास पहुंचकर वहां का हाल बताया।

शिवजी ने हंसकर कहा- 'नारद! यह सब पार्वती की ही लीला है.... इस पर पार्वती बोलीं- 'मैं किस योग्य हूं...तब नारदजी ने सिर झुकाकर कहा- 'माता! आप पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। आप सौभाग्यवती समाज में आदिशक्ति हैं। यह सब आपके पतिव्रत का ही प्रभाव है। संसार की स्त्रियां आपके नाम-स्मरण मात्र से ही अटल सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं और समस्त सिद्धियों को बना तथा मिटा सकती हैं। तब आपके लिए यह कर्म कौन-सी बड़ी बात है?' महामाये, गोपनीय पूजन अधिक शक्तिशाली तथा सार्थक होता है।

आपकी भावना तथा चमत्कारपूर्ण शक्ति को देखकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं आशीर्वाद रूप में कहता हूं कि जो स्त्रियां इसी तरह गुप्त रूप से पति का पूजन करके मंगलकामना करेंगी, उन्हें महादेवजी की कृपा से दीर्घायु पति का संसर्ग मिलेगा।

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