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महाराष्ट्र की सियासत में शिंदे-उद्धव की शिवसेना जंग, ‘शोले’ के डायलॉग से लेकर शेर, बाघ और कुत्तों की मिसाल तक आखिर क्यों पहुंची बात?

महाराष्ट्र में शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस पर उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच सियासी टकराव तेज हो गया। ‘शोले’ के डायलॉग से लेकर शेर, बाघ और कुत्तों की मिसाल तक नेताओं के तीखे बयान सामने आए, जबकि 6 सांसदों के कथित बगावत से राजनीतिक हलचल और बढ़ गई।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Sat, 20 Jun 2026 8:52:10

महाराष्ट्र की सियासत में शिंदे-उद्धव की शिवसेना जंग, ‘शोले’ के डायलॉग से लेकर शेर, बाघ और कुत्तों की मिसाल तक आखिर क्यों पहुंची बात?

महाराष्ट्र में शुक्रवार को शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर पार्टी के दोनों धड़ों—उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट—ने अलग-अलग मंचों से अपने-अपने दावे पेश किए। एक तरफ राजनीतिक भाषण में बाघ, शेर, भौंकते कुत्तों और एक ऐसे “सियासी ट्रेलर” का जिक्र हुआ जिसकी “पूरी फिल्म” अभी बाकी बताई गई, तो दूसरी तरफ भावनात्मक अपील करते हुए नेतृत्व पर सवाल उठने पर पद छोड़ने तक की पेशकश कर दी गई। साथ ही यह चेतावनी भी दी गई कि शिवसेना को ‘गद्दारों और धोखेबाज़ों’ के हाथों में नहीं जाने दिया जाएगा।

स्थापना दिवस के मौके पर यह सियासी टकराव तब और तेज हो गया जब उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (UBT) के 9 में से 6 लोकसभा सांसदों के शिंदे खेमे में जाने की अटकलें सामने आईं। इन चर्चाओं ने उस अंदरूनी विभाजन को और गहरा कर दिया है, जिसने 2022 में महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा ही बदल दी थी, जब एकनाथ शिंदे ने ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी और बाद में पार्टी के नाम के साथ-साथ उसके प्रतिष्ठित ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न पर भी नियंत्रण हासिल कर लिया था।

एकनाथ शिंदे का बयान—अभी तो ट्रेलर है, असली तस्वीर बाकी है

मुंबई में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए एकनाथ शिंदे ने अपने गुट को बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी बताने की कोशिश की। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि “यह तो सिर्फ एक ट्रेलर है, पूरी फिल्म अभी आनी बाकी है।” उन्होंने आगे कहा कि आज मंच पर एक बाघ खड़ा है और कुछ लोग कुत्तों की तरह लगातार भौंकते रहते हैं।

शिंदे ने कहा, “कुत्ते झुंड में भौंकते हैं, लेकिन शेर अकेला चलता है। बाघ शिकार करता है और अपनी ताकत से पहचान बनाता है। आज शिवसेना उसी मजबूती के साथ महाराष्ट्र में खड़ी है।” उन्होंने यह भी दोहराया कि विरोधियों की आलोचना उन्हें कमजोर नहीं कर सकती, बल्कि उनकी राजनीतिक स्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है।

बिना नाम लिए उद्धव पर निशाना—क्यों लोग साथ छोड़ रहे हैं?

अपने संबोधन में शिंदे ने उद्धव ठाकरे का नाम सीधे तौर पर लिए बिना उन पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि बार-बार यह कहा जाता है कि जो जाना चाहता है उसे जाने दिया जाए, लेकिन वास्तविकता यह है कि लोग लगातार पार्टी छोड़ रहे हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है और नेतृत्व को आत्ममंथन करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “अगर कोई छोड़कर जा रहा है तो केवल बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा, बल्कि आत्मनिरीक्षण जरूरी है। यह समझना होगा कि लोग क्यों दूरी बना रहे हैं और कहां कमी रह गई है।”

‘शोले’ के डायलॉग से तंज—कौन किसके पीछे?

अपने भाषण में शिंदे ने बॉलीवुड फिल्म ‘शोले’ का उदाहरण देते हुए विरोधियों पर कटाक्ष किया। उन्होंने असरानी के मशहूर संवाद का जिक्र करते हुए कहा, “आधे लोग इधर जाओ, आधे लोग उधर जाओ, बाकी मेरे पीछे आओ—लेकिन सवाल यह है कि उनके पीछे आखिर कौन है?”

उन्होंने आगे तंज कसते हुए कहा कि विरोधी गुट के पास अब केवल प्रतीकात्मक चीजें बची हैं, जबकि वास्तविक जनाधार कमजोर होता जा रहा है। उनके अनुसार, ऐसी स्थिति में किसी राजनीतिक संगठन का टिके रहना मुश्किल हो जाता है।

विरासत पर दावा—विचारधारा बनाम संबंध

शिंदे ने अपने भाषण में बार-बार यह बात दोहराई कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली अधिकार विचारधारा से तय होता है, न कि पारिवारिक या व्यक्तिगत संबंधों से। उन्होंने कहा कि शिवसेना किसी भौतिक संपत्ति या भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक आंदोलन है।

उन्होंने दावा किया कि उनके साथ जुड़े शिवसैनिक ही वास्तविक उत्तराधिकारी हैं और वही इस विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। शिंदे ने यह भी कहा कि 2022 में लिए गए उनके राजनीतिक निर्णय को लेकर कई तरह की आलोचनाएं हुई थीं, लेकिन समय ने दिखाया कि उनका फैसला पार्टी के विस्तार और प्रभाव के लिए लाभकारी साबित हुआ।

उद्धव ठाकरे की भावनात्मक अपील—पद छोड़ने को तैयार

दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे ने शिवसेना स्थापना दिवस पर अपने समर्थकों के बीच भावनात्मक अंदाज में संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि उनका मन इस समय बेहद व्यथित है और अगर किसी को लगता है कि वे इस जिम्मेदारी के योग्य नहीं हैं, तो वह सीधे उनके सामने यह बात कह सकता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा, “अगर आपमें से किसी को भी लगता है कि मैं इस पद के लायक नहीं हूं, तो मुझे बता दीजिए। मैं तुरंत इस पद से हटने को तैयार हूं।” ठाकरे के इस बयान को पार्टी के भीतर चल रही हलचल और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।

‘चोर-गद्दारों को शिवसेना नहीं हथियाने दूंगा’—उद्धव ठाकरे का सख्त संदेश

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें सत्ता, पद या किसी प्रकार के राजनीतिक लाभ की कोई लालसा नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनका सबसे बड़ा उद्देश्य शिवसेना की मूल विचारधारा और पहचान की रक्षा करना है।

ठाकरे ने कहा, “मेरा सिर्फ एक ही दृढ़ संकल्प है, एक ही जिद है कि यह शिवसेना—जो सोने से भी अधिक कीमती है—कभी भी चोरों और गद्दारों के हाथों में पिछले दरवाजे से न जाने पाए।” उन्होंने आगे कहा कि अगर संगठन में कोई सच्चा शिवसैनिक नेतृत्व की क्षमता रखता है, तो वह आगे आए, और वह स्वयं उसका पूरे मन से समर्थन करेंगे।

उन्होंने यह भी दोहराया कि उन्हें किसी पद का लोभ नहीं है और न ही सत्ता की कोई भूख। ठाकरे ने कहा कि वे आज भी नेतृत्व छोड़ने के लिए तैयार हैं, बशर्ते पार्टी की जिम्मेदारी योग्य हाथों में जाए।

6 सांसदों की कथित बगावत के बीच बढ़ी राजनीतिक गर्मी

उद्धव ठाकरे के ये बयान उन रिपोर्ट्स के बाद उनकी पहली बड़ी प्रतिक्रिया मानी जा रही है, जिनमें दावा किया गया है कि शिवसेना (UBT) के छह सांसद पाला बदलने की तैयारी में हैं। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर चल रही हलचल और भी तेज कर दी है।

सूत्रों के अनुसार, जिन सांसदों के नाम इस संभावित असंतोष से जोड़े जा रहे हैं, उनमें संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल-अष्टिकर और ओमप्रकाश राजे निंबालकर शामिल हैं।

बताया जाता है कि ये सभी गुरुवार को दिल्ली में आयोजित शिवसेना (UBT) की संसदीय दल की बैठक में उपस्थित नहीं हुए, जिससे उनके रुख को लेकर अटकलें और अधिक मजबूत हो गई हैं। इस अनुपस्थिति ने पार्टी में संभावित विभाजन की चर्चाओं को नया राजनीतिक बल दे दिया है, और आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट होने की संभावना जताई जा रही है।

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