नई दिल्ली। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि मतदाता सूचियों में कथित बदलाव और ‘वोट चोरी’ का असर केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे चुनी हुई सरकार और कानून बनाने की पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसी चुनाव में मतदाताओं के अधिकार से छेड़छाड़ होती है तो उसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल ढांचे पर पड़ता है।
राहुल गांधी ने अपने आरोपों के समर्थन में चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का भी जिक्र किया। द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर क्या कहा?
राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका वाली चयन प्रक्रिया से हुई थी। उन्होंने दावा किया कि आयोग के दो अन्य आयुक्तों ने लिखित रूप से ऐसी प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई है, जिनसे उनके मुताबिक वोटिंग सिस्टम प्रभावित हो सकता है।
राहुल गांधी ने कहा कि मतदाता सूची में कथित तौर पर वोट हटाए या जोड़े जाने का मामला केवल मताधिकार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, अगर ऐसे बदलाव चुनाव के नतीजों को प्रभावित करते हैं तो संसद में पहुंचने वाले प्रतिनिधियों और उनके जरिए बनाए जाने वाले कानूनों पर भी सवाल उठ सकता है।
उन्होंने इसे संविधान और नागरिकों के अपने प्रतिनिधि चुनने के अधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया। ये बातें राहुल गांधी के राजनीतिक आरोप और उनकी ओर से रखी गई व्याख्या हैं।
एंटी-इनकंबेंसी पर भी उठाया सवाल
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राहुल गांधी ने भारतीय राजनीति में एंटी-इनकंबेंसी यानी लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद सरकार के खिलाफ बनने वाली मतदाताओं की नाराजगी का भी उल्लेख किया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और 1971 के बांग्लादेश युद्ध का संदर्भ देते हुए कहा कि बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद भी सरकारों को चुनाव में एंटी-इनकंबेंसी का सामना करना पड़ा है।
राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि मौजूदा दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा के खिलाफ वैसी एंटी-इनकंबेंसी क्यों दिखाई नहीं देती जैसी वह भारतीय राजनीति में पहले देखने को मिलती थी। उन्होंने इसका कारण कथित ‘वोट चोरी’ को बताया और दावा किया कि मतदाता सूचियों में योजनाबद्ध तरीके से नाम हटाने और जोड़ने से चुनावी जनादेश प्रभावित हो सकता है।
चुनाव आयोग में दो आयुक्तों की आपत्तियों की रिपोर्ट क्या कहती है?
राहुल गांधी के बयान की पृष्ठभूमि में द इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट है, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से आयोग के भीतर दर्ज की गई आपत्तियों का विवरण दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों आयुक्तों ने नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए Form-6 में किए गए बदलाव, मतदाता डेटाबेस को केंद्रीय स्तर पर संचालित किए जाने और मतदाता नामों को हटाने तथा बहाल करने की प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों आयुक्तों ने कुछ प्रक्रियाओं को ‘अनधिकृत’ और ‘अवैध’ बताते हुए आपत्ति दर्ज की थी। एक अन्य मुद्दा मतदाता डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच से जुड़ा था। रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने डेटाबेस के धीरे-धीरे केंद्रीयकरण को लेकर भी चिंता जताई थी।
गोवा और पश्चिम बंगाल के मामलों का भी जिक्र
रिपोर्ट में गोवा और पश्चिम बंगाल से जुड़े मामलों को भी आयोग के भीतर उठी आपत्तियों के उदाहरण के तौर पर बताया गया है। गोवा में कुछ मतदाताओं के मामलों में स्थानीय अधिकारियों के फैसले और सॉफ्टवेयर व्यवस्था के बीच तालमेल का मुद्दा सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक, 97 मतदाताओं को स्थानीय स्तर पर अंतिम मतदाता सूची के लिए योग्य पाया गया, लेकिन संबंधित सॉफ्टवेयर में उस निर्णय को दर्ज करने की सुविधा समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी।
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं से जुड़े मामलों और अपीलों को लेकर भी सवाल उठे। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से अधिक ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। कुल मिलाकर 38 लाख से अधिक अपीलें दायर की गई थीं, जिनमें कुछ नाम शामिल करने और कुछ नाम हटाने से संबंधित थीं।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
इन आरोपों और रिपोर्टों के बीच चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर मतभेदों को अलग तरीके से पेश किया है। आयोग ने कहा है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग सदस्यों की ओर से सुझाव, राय या टिप्पणियां आना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR से जुड़े अंतिम फैसलों को लेकर कहा कि ये फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची को सही रखने के लिए नियमों के तहत दोहरे, स्थानांतरित या मृत मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया की जाती है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में भी यह उल्लेख है कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निर्वाचन आयोग मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्तों वाला बहुसदस्यीय निकाय है। 2023 के संबंधित कानून के तहत आयोग के कामकाज को जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से संचालित करने और मतभेद होने पर बहुमत के आधार पर फैसला लेने का प्रावधान है।
विवाद अब चुनाव प्रक्रिया से आगे राजनीतिक मुद्दा बना
राहुल गांधी के बयान के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और निर्वाचन आयोग को लेकर विपक्ष की आलोचना और तेज हुई है। भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद विपक्षी दलों ने आयोग के भीतर कथित मतभेदों को आधार बनाकर CEC के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, विपक्षी दलों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग जैसी प्रक्रिया शुरू करने की बात भी कही है।
फिलहाल एक तरफ राहुल गांधी और विपक्षी दल मतदाता सूची और आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, वहीं निर्वाचन आयोग ने SIR से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मति से लिए जाने और मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया को नियमों के तहत किए जाने की बात कही है। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों और मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया को लेकर विवाद जारी है।













