नई दिल्ली में गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम से जुड़े मामले की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई को लेकर न्यायिक प्रक्रिया और केस की लिस्टिंग पर सवाल उठाए गए हैं। ‘लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन’ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को ओपन लेटर लिखकर मामले की कथित आउट-ऑफ-टर्न लिस्टिंग और सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की आवाज म्यूट किए जाने पर चिंता जताई है।
एसोसिएशन ने अपने पत्र में कहा कि किसी मामले को सामान्य क्रम से हटकर सूचीबद्ध किए जाने और किसी खास बेंच के सामने उसकी सुनवाई होने से न्यायिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ सकते हैं। संगठन ने यह भी कहा कि संबंधित याचिकाकर्ता एक सरकारी अधिकारी हैं और वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। हालांकि, यह उल्लेख एसोसिएशन के पत्र में मामले की लिस्टिंग को लेकर उठाई गई चिंता के संदर्भ में किया गया है।
मामला मेधा रूपम की याचिका से जुड़ा है
यह पूरा विवाद दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत हुई हिरासत से जुड़ा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर के अपने फैसले में आकृति चौधरी की हिरासत रद्द कर दी थी। कोर्ट ने कहा था कि हिरासत के आधार पर्याप्त ठोस सामग्री पर आधारित नहीं थे और लगातार हिरासत में रखना उनके संविधान के अनुच्छेद 21 के अधिकार का उल्लंघन था।
हाई कोर्ट ने चौधरी को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था। यह रकम जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम और मामले की प्रक्रिया में शामिल अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूलने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट के आदेश में मेधा रूपम की भूमिका को लेकर कड़ी टिप्पणियां भी की गई थीं।
इसके बाद मेधा रूपम ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। 23 सितंबर को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने मामले पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों और मेधा रूपम के वेतन से 5 लाख रुपये की वसूली संबंधी निर्देश पर रोक लगा दी।
केस की लिस्टिंग को लेकर क्या सवाल उठे?
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, मेधा रूपम की याचिका जिस पीठ के सामने सूचीबद्ध हुई, उस समय लागू रोस्टर के तहत वह पीठ निवारक हिरासत से जुड़े मामलों की नियमित पीठ नहीं थी। इसी आधार पर केस की लिस्टिंग और मास्टर ऑफ रोस्टर की शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए। इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इसी श्रमिक प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामले जस्टिस बीवी नागरत्ना की अगुवाई वाली पीठ के सामने लंबित थे।
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने अपने ओपन लेटर में इसी तरह की चिंता जताते हुए कहा कि मामला मौजूदा रोस्टर के अनुसार जिस पीठ के सामने सूचीबद्ध हुआ, उसे लेकर कानूनी हलकों में सवाल उठ रहे हैं। संगठन ने इसे सामान्य क्रम से अलग लिस्टिंग बताते हुए न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और भरोसे का मुद्दा उठाया है।
एसोसिएशन ने यह भी कहा कि मामले की सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की आवाज म्यूट किए जाने से सार्वजनिक सुनवाई की पारदर्शिता को लेकर चिंता पैदा हुई। 23 सितंबर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने VC एक्सेस बंद कर दिया था और बाद में मामले में आदेश सुरक्षित रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मेधा रूपम की ओर से दलील दी गई कि हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ कड़ी टिप्पणियां करने से पहले उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की थी, जो SHO, DCP और पुलिस कमिश्नर के स्तर से होते हुए आगे बढ़ी थी। इसके बाद NSA एडवाइजरी बोर्ड ने भी मामले की समीक्षा की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस सवाल पर भी विचार किया कि जब हिरासत का फैसला कई स्तरों की प्रक्रिया से होकर गुजरा हो, तो केवल जिला मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत वित्तीय जिम्मेदारी के लिए अलग से कैसे देखा जा सकता है। कोर्ट ने मौखिक रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि क्या इस प्रक्रिया में मेधा रूपम को अलग करके 5 लाख रुपये की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
हाई कोर्ट के फैसले में क्या कहा गया था?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आकृति चौधरी की NSA के तहत हिरासत को रद्द करते हुए कहा था कि हिरासत के आदेश और उसके आधार पर्याप्त सामग्री पर आधारित नहीं थे। चौधरी को नोएडा में अप्रैल में हुए मजदूरों के प्रदर्शन के संदर्भ में हिरासत में लिया गया था। हाई कोर्ट के मुताबिक, उन्हें लंबे समय तक हिरासत में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ था।
हाई कोर्ट ने मुआवजे की रकम अधिकारियों के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ मेधा रूपम की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर को हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई। 24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतरिम आदेश को संशोधित करते हुए मेधा रूपम के खिलाफ हाई कोर्ट की टिप्पणियों और 5 लाख रुपये के वेतन से भुगतान संबंधी निर्देश पर रोक जारी रखी। हालांकि, आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने वाले हाई कोर्ट के निर्देश पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को सूचीबद्ध की गई है।
CEC ज्ञानेश कुमार की बेटी होने का भी पत्र में जिक्र
वकीलों के संगठन ने अपने पत्र में इस तथ्य का विशेष रूप से उल्लेख किया कि मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। इसी संदर्भ में संगठन ने मामले की लिस्टिंग और सुनवाई के तरीके पर सवाल उठाए हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि NSA के तहत हिरासत की प्रक्रिया में जिला मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत जिम्मेदारी किस सीमा तक तय की जा सकती है और हाई कोर्ट की टिप्पणियों तथा मुआवजे के आदेश का क्या प्रभाव रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाई कोर्ट के आदेश के संबंधित हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई है और मामले पर आगे सुनवाई जारी रहेगी।













