दिल्ली में रामलीला और दूसरे धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मैदान आवंटित करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और सभी संस्थाओं को समान अवसर देने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने जोर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मैदान देने के लिए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की व्यवस्था उचित नहीं है, क्योंकि इससे उन संस्थाओं को नुकसान हो सकता है जिन्हें मैदान की उपलब्धता की जानकारी बाद में मिलती है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि कार्यक्रम शुरू होने से कम से कम 90 दिन पहले मैदानों के आवंटन से जुड़ा नोटिस जारी किया जाए।
यह टिप्पणी ‘रे ऑफ न्यू बिगिनिंग फाउंडेशन’ नाम की संस्था की याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। संस्था ने दिल्ली में रामलीला आयोजित करने के लिए मैदान मांगा था। मामले में मैदान आवंटन की प्रक्रिया और पुराने आयोजकों को प्राथमिकता देने के नियमों पर सवाल उठे। अदालत ने कहा कि धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए मैदान उपलब्ध कराने की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें सभी पात्र संस्थाओं को आवेदन करने का उचित अवसर मिले।
मैदान आवंटन के लिए हर साल तय हों नियम
हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में रामलीला सहित अन्य धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए मैदान आवंटित करने के नियम हर साल तय किए जाने चाहिए। अदालत की चिंता इस बात को लेकर थी कि यदि आवंटन का आधार केवल आवेदन करने का समय बनता है, तो मैदान की उपलब्धता की जानकारी पहले हासिल करने वाली संस्था को अनुचित लाभ मिल सकता है। ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर आवंटन होने से उन संस्थाओं के साथ भेदभाव की आशंका रहती है, जो समान रूप से आयोजन करना चाहती हैं, लेकिन उन्हें मैदान खाली होने की जानकारी बाद में मिलती है। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि आवंटन की प्रक्रिया पहले से घोषित हो और आवेदन करने वाली संस्थाओं को नियमों की स्पष्ट जानकारी दी जाए।
आयोजन से 90 दिन पहले जारी करना होगा नोटिस
अदालत ने मैदान आवंटन की प्रक्रिया के लिए समयसीमा तय करने पर जोर दिया। निर्देश के मुताबिक, संबंधित अधिकारियों को कार्यक्रम शुरू होने से कम से कम 90 दिन पहले नोटिस जारी करना होगा। इससे इच्छुक संस्थाओं को आवेदन करने और आवंटन की प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। नोटिस में यह भी स्पष्ट करना होगा कि कौन-कौन से मैदान उपलब्ध हैं, आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख क्या है और मैदान आवंटित करने के लिए किन नियमों और शर्तों का पालन किया जाएगा। इस तरह आवेदकों को पहले से पता होगा कि वे किस मैदान के लिए आवेदन कर सकते हैं और चयन किन आधारों पर किया जाएगा।
एक मैदान के लिए कई आवेदन आएं तो क्या होगा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी एक मैदान के लिए एक से अधिक संस्थाएं आवेदन करती हैं, तो अधिकारियों को सभी आवेदनों की तुलना निर्धारित नियमों के आधार पर करनी होगी। फैसला केवल इस आधार पर नहीं किया जाना चाहिए कि किस संस्था ने सबसे पहले आवेदन जमा किया था। अदालत के निर्देशों का उद्देश्य आवंटन प्रक्रिया में स्पष्ट मानदंड लागू करना है, ताकि अलग-अलग संस्थाओं के आवेदनों पर समान प्रक्रिया के तहत विचार किया जा सके। उपलब्ध मैदानों की सूची, आवेदन की समयसीमा और चयन के नियम पहले से सार्वजनिक करने पर भी जोर दिया गया है।
पुराने आयोजकों को प्राथमिकता मिल सकती है, लेकिन स्थायी अधिकार नहीं
अदालत ने पुराने आयोजकों को प्राथमिकता देने के मुद्दे पर भी स्थिति स्पष्ट की। कोर्ट के मुताबिक, जिस संस्था ने पहले रामलीला का आयोजन किया है, उसके पिछले आयोजन और नियमों के पालन के रिकॉर्ड को प्राथमिकता तय करते समय ध्यान में रखा जा सकता है। हालांकि, किसी संस्था को केवल पुराने आयोजक होने के आधार पर मैदान पर स्थायी अधिकार नहीं मिल जाता। यदि दूसरी योग्य संस्थाएं भी उसी मैदान के लिए आवेदन करती हैं, तो उनके दावों पर भी विचार करना होगा। अदालत ने यह भी कहा कि किसी एक संस्था को लगातार दो साल से अधिक प्राथमिकता नहीं दी जा सकती। इस व्यवस्था के तहत पुराने आयोजकों के अनुभव को महत्व दिया जा सकता है, लेकिन अन्य पात्र संस्थाओं के लिए अवसर भी बनाए रखना होगा।
2023 और 2024 में इसी मैदान पर रामलीला कर चुकी थी संस्था
मामले में याचिका दायर करने वाली ‘रे ऑफ न्यू बिगिनिंग फाउंडेशन’ ने वर्ष 2023 और 2024 में भी उसी मैदान पर रामलीला का आयोजन किया था। संस्था का कहना था कि दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की नीति के मुताबिक पुराने आयोजकों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी। याचिकाकर्ता संस्था के अनुसार, इसके बावजूद दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) ने मैदान पहले आवेदन करने वाली दूसरी संस्था को आवंटित कर दिया। इस फैसले को लेकर संस्था ने अदालत का रुख किया था। मामले में पुराने आयोजकों को प्राथमिकता देने की नीति और ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर मैदान देने की प्रक्रिया के बीच अंतर सामने आया।
2026 के आयोजन के लिए मौजूदा आवंटन रद्द नहीं किया
अदालत ने मैदान आवंटन से संबंधित शिकायतों को समय रहते सुलझाने की जरूरत पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि मैदान देने और उससे जुड़ी शिकायतों के निपटारे की प्रक्रिया कार्यक्रम शुरू होने से पहले पूरी कर ली जानी चाहिए, ताकि आयोजन के नजदीक आने पर विवाद की स्थिति न बने। हालांकि, वर्ष 2026 के आयोजन नजदीक होने के कारण हाई कोर्ट ने मौजूदा आवंटन को रद्द करने या मैदान याचिकाकर्ता संस्था को सौंपने का आदेश नहीं दिया। इस तरह अदालत ने मौजूदा मामले में आवंटन बदलने का निर्देश देने के बजाय आगे के लिए मैदान आवंटन की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और समान अवसर देने वाला बनाने पर जोर दिया।













