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सांसदों की टूट से बदला सियासी समीकरण, NDA मजबूत, INDIA गठबंधन को बड़ा झटका

मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा का सियासी गणित बदलता नजर आ रहा है। सांसदों के दल-बदल से NDA की ताकत बढ़ी है, जबकि INDIA गठबंधन का संख्याबल घटा है। जानिए दो-तिहाई बहुमत का पूरा गणित और बदलते राजनीतिक समीकरण।

Posts by : Jhanvi Gupta | Updated on: Thu, 02 Jul 2026 8:57:32

सांसदों की टूट से बदला सियासी समीकरण, NDA मजबूत, INDIA गठबंधन को बड़ा झटका

नई दिल्ली। संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले लोकसभा का राजनीतिक समीकरण तेजी से बदलता नजर आ रहा है। हाल के दिनों में विभिन्न दलों में हुई टूट और सांसदों के पाला बदलने से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। दूसरी ओर, विपक्षी गठबंधन INDIA का संख्याबल घटने से उसके सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। हालांकि, मौजूदा स्थिति में एनडीए अभी भी लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से काफी दूर है, लेकिन यदि उसे कुछ और दलों का समर्थन मिल जाता है तो वह इस लक्ष्य के काफी करीब पहुंच सकता है।

दो-तिहाई बहुमत का गणित क्या कहता है?

वर्तमान में यदि लोकसभा के सभी 540 मौजूदा सदस्य सदन में उपस्थित रहकर मतदान करते हैं, तो संविधान संशोधन जैसे प्रस्तावों के लिए दो-तिहाई बहुमत हासिल करने हेतु 360 मतों की आवश्यकता होगी। हालांकि, यह आंकड़ा सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की संख्या के आधार पर बदल भी सकता है।

इसका उदाहरण अप्रैल में देखने को मिला था, जब संविधान संशोधन विधेयक पर मतदान के दौरान कुल 548 सांसदों ने हिस्सा लिया था। उस समय 298 सांसदों ने प्रस्ताव के पक्ष में और 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया था, जबकि 11 सदस्य अनुपस्थित रहे। ऐसे में प्रभावी दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा घटकर 352 वोट रह गया था।

दल-बदल के बाद NDA की स्थिति हुई मजबूत

हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में सबसे बड़ा असर लोकसभा के संख्या बल पर पड़ा है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसदों ने नेशनल सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर लिया, जिसने एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है। इस नए समूह ने लोकसभा में अलग बैठने की भी मांग की है।

इसी बीच शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसद भी एनडीए में शामिल शिवसेना के साथ आ गए। इन बदलावों के बाद लोकसभा में एनडीए का आंकड़ा बढ़कर 319 सांसदों तक पहुंच गया है। इसके बावजूद गठबंधन अभी भी दो-तिहाई बहुमत के लिए आवश्यक संख्या से काफी पीछे है।

INDIA गठबंधन की ताकत में आई कमी

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्षी INDIA गठबंधन के पास 225 सांसदों का समर्थन था। लेकिन हाल में विभिन्न दलों में हुई टूट के कारण गठबंधन को बड़ा झटका लगा है। कुल 26 सांसदों के अलग होने के बाद विपक्ष की संख्या घटकर 199 रह गई है।

इसके अलावा 22 सांसदों वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने भी स्वयं को INDIA गठबंधन से अलग कर लिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और डीएमके के बीच बढ़ी राजनीतिक दूरी का असर इस फैसले में दिखाई दे रहा है।

फिलहाल INDIA गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है, जिसके पास 98 सांसद हैं। उसके बाद समाजवादी पार्टी 37 सांसदों के साथ दूसरे स्थान पर है। पहले तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) भी गठबंधन के प्रमुख दलों में शामिल थीं, लेकिन हालिया घटनाक्रम के बाद विपक्ष का पूरा शक्ति संतुलन बदल गया है।

आगे कैसे बदल सकता है संख्या बल?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि आने वाले समय में कुछ छोटे दल या निर्दलीय सांसद अपना रुख बदलते हैं तो लोकसभा का गणित एक बार फिर बदल सकता है। ऐसे में पांच निर्दलीय सांसदों की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इनमें अमृतपाल सिंह और शेख अब्दुल रशीद फिलहाल जेल में हैं, जिससे संभावित मतदान की स्थिति में उनकी भूमिका अलग तरह से देखी जा रही है।

यदि एनडीए को चार सांसदों वाली वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) का समर्थन मिलता है और साथ ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) तथा डीएमके जैसे दलों की ओर से किसी प्रकार का सहयोग या रणनीतिक रुख देखने को मिलता है, तो सत्ता पक्ष का संख्या बल और मजबूत हो सकता है।

बहुमत के समीकरण को ऐसे समझिए

सरल शब्दों में देखें तो शरद पवार के नेतृत्व वाले एनसीपी (एसपी) गुट के पास आठ सांसद हैं, जबकि डीएमके के पास 22 सदस्य हैं। यदि ये दोनों दल किसी अहम मतदान के दौरान अनुपस्थित रहते हैं या मतदान में हिस्सा नहीं लेते, तो प्रभावी बहुमत का आंकड़ा घटकर लगभग 330 तक पहुंच सकता है।

इसके अलावा यदि एनडीए को निर्दलीय सांसदों और जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसीपी का समर्थन मिल जाता है, तो उसके खाते में करीब नौ अतिरिक्त वोट जुड़ सकते हैं। इसके बावजूद भी दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए गठबंधन को कुछ और सांसदों के समर्थन की आवश्यकता बनी रहेगी। ऐसे में संसद के मॉनसून सत्र से पहले और उसके दौरान होने वाले राजनीतिक घटनाक्रम लोकसभा के संख्या बल और भविष्य की रणनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकते हैं।

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